देवनारायण

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
Jump to navigation Jump to search

श्रीदेवनारायण भगवान विष्णु के अवतार हैं। इनकी पूजा पुरे भारतवर्ष में होती है।

देवनारायण
संबंध देव
अस्त्र तलवार, भाला
जीवनसाथी पीपल दे
माता-पिता
  • सवाई भोज (father)
  • सेढू खटाणी (mother)
Region राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश ,हरियाणा
त्यौहार देवनारायण जयन्ती, मकर संक्रांति, देव एकादशी


अवतार[संपादित करें]

देवनारायण बगड़ावत वंश के थे । वे नाग वंशीय गुर्जर थे जिनका मूल स्थान वर्तमान में अजमेर के निकट नाग पहाड़ था । गुर्जर जाति एक संगठित , सुसंस्कृत वीर जातियों में गिनी जाती है जिसका आदिकाल से गौरवशाली इतिहास रहा है । समाज में प्रचलित लोक कथाओं के माध्यम से गुर्जर जाति के शौर्य - पुरूष देवनारायण के सम्बन्ध में विस्तृत रूप से जानकारी मिलती है । देवनारायण महागाथा में इनको चौहान वंश से सम्बन्धित बताया है । देवनारायण की फड़ के अनुसार माण्डलजी के हीराराम , हीराराम के बाघसिंह और बाघसिंह के 24 पुत्र हुए जो बगड़ावत कहलाये । इन्हीं में से बड़े भाई सवाई भोज और माता साडू ( सेढू ) के पुत्र के रूप में वि . सं . 968 ( 911 ई . ) में माघ शुक्ला सप्तमी को आलौकिक पुरूष देवनारायण का जन्म मालासेरी में हुआ ।

बगडावत भारत[संपादित करें]

राणी जयमती (जैमति) को लेकर राण के राजा दुर्जनसाल से बगड़ावतों की जंग हुई। युद्ध से पूर्व बगडावतों तथा दुर्जनसाल की मित्रता थी तथा वे धर्म के भाई थे। ये युद्ध खारी नदी के किनारे हुआ था। बगड़ावतों ने अपना वचन रखते हुए राणी जैमति को सिर दान में दिये थे। बगड़ावतों के वीरगति प्राप्त होने के बाद देवनारायण का अवतार हुआ तथा उन्होंने राजा दुर्जनसाल का वध किया।

परिचय[संपादित करें]

देवनारायण पराक्रमी योद्धा थे जिन्होंने अत्याचारी शासकों के विरूद्ध कई संघर्ष एवं युद्ध किये । वे शासक भी रहे । उन्होंने अनेक सिद्धियाँ प्राप्त की । चमत्कारों के आधार पर धीरे - धीरे वे गुर्जरों के देव स्वरूप बनते गये एवं अपने इष्टदेव के रूप में पूजे जाने लगे । देवनारायण को विष्णु के अवतार के रूप में गुर्जर समाज द्वारा राजस्थान व दक्षिण - पश्चिमी मध्य प्रदेश में अपने लोकदेवता के रूप में पूजा की जाती है । उन्होंने लोगों के दुःख व कष्टों का निवारण किया । देवनारायण महागाथा में बगडावतों और राण भिणाय के शासक के बीच युद्ध का रोचक वर्णन है ।

देवनारायणजी का अन्तिम समय ब्यावर तहसील के मसूदा से 6 कि . मी . दूरी पर स्थित देहमाली ( देमाली ) स्थान पर गुजरा । भाद्रपद शुक्ला सप्तमी को उनका वहीं देहावसान हुआ । देवनारायण से पीपलदे द्वारा सन्तान विहीन छोड़कर न जाने के आग्रह पर बैकुण्ठ जाने पूर्व पीपलदे से एक पुत्र बीला व पुत्री बीली उत्पन्न हुई । उनका पुत्र ही उनका प्रथम पुजारी हुआ ।

कृष्ण की तरह देवनारायण भी गायों के रक्षक थे । उन्होंने बगड़ावतों की पांच गायें खोजी , जिनमें सामान्य गायों से अलग विशिष्ट लक्षण थे । देवनारायण प्रातःकाल उठते ही सरेमाता गाय के दर्शन करते थे । यह गाय बगड़ावतों के गुरू रूपनाथ ने सवाई भोज को दी थी । देवनारायण के पास 98000 पशु धन था । जब देवनारायण की गायें राण भिणाय का राणा घेर कर ले जाता तो देवनारायण गायों की रक्षार्थ राणा से युद्ध करते हैं और गायों को छुड़ाकर लाते थे । देवनारायण की सेना में ग्वाले अधिक थे । 1444 ग्वालों का होना बताया गया है , जिनका काम गायों को चराना और गायों की रक्षा करना था । देवनारायण ने अपने अनुयायियों को गायों की रक्षा का संदेश दिया ।

इन्होंने जीवन में बुराइयों से लड़कर अच्छाइयों को जन्म दिया । आतंकवाद से संघर्ष कर सच्चाई की रक्षा की एवं शान्ति स्थापित की । हर असहाय की सहायता की । राजस्थान में जगह - जगह इनके अनुयायियों ने देवालय अलग - अलग स्थानों पर बनवाये हैं जिनको देवरा भी कहा जाता है । ये देवरे अजमेर , चित्तौड़ , भीलवाड़ा , व टोंक में काफी संख्या में है । देवनारायण का प्रमुख मन्दिर भीलवाड़ा जिले में आसीन्द कस्बे के निकट खारी नदी के तट पर मालासेरी डूंगरी है,जो मालासेरी गांव के पास है।देवनारायण का अन्य प्रसिद्ध मंदिर गोठा दड़ावत गांव में है जो खारी नदी और नेकाडी नदी के संगम पर स्थित है। गोठा दडावट बगड़ावत राजधानी भी रही है। देवनारायण का एक प्रमुख देवालय निवाई तहसील के जोधपुरिया गाँव में वनस्थली से 9 कि . मी . दूरी पर है । सम्पूर्ण भारत में गुर्जर समाज का यह सर्वाधिक पौराणिक तीर्थ स्थल है । देवनारायण की पूजा भोपाओं द्वारा की जाती है । ये भोपा विभिन्न स्थानों पर जाकर गुर्जर समुदाय के मध्य फड़ ( लपेटे हुये कपड़े पर देवनारायण जी की चित्रित कथा ) के माध्यम से देवनारायण की गाथा गा कर सुनाते हैं ।

देवनारायण की फड़ में 335 गीत हैं । जिनका लगभग | 1200 पृष्ठों में संग्रह किया गया है एवं लगभग 15000 पंक्तियाँ हैं । ये गीत परम्परागत भोपाओं को कण्ठस्थ याद रहते हैं । देवनारायण की फड़ राजस्थान की फड़ों में सर्वाधिक लोकप्रिय एवं सबसे बड़ी है ।

देवनारायण के अन्य नाम[संपादित करें]

  • ११वी कला का असवार
  • लीला घोडा का असवार
  • त्रिलोकी का नाथ
  • देवजी
  • देव महाराज
  • देव धणी
  • साडू माता का लाल
  • उदा जी
  • देवनारायण
  • नारायण
  • उदल
  • देव दरबार
  • ईटा का श्याम

मंदिर[संपादित करें]

देवजी के चार प्रमुख देवरे चार धाम कहलाते हैं

  1. गोठां दड़ावता ( आसीन्द , भीलवाड़ा
  2. देवधाम जोधपुरिया ( निवाई , टोक )
  3. देवमाली ( अजमेर )
  4. देवडूंगरी ( चित्तौड़गढ़ )
  5. देव महाराज मंदिर ( पांचू डाला, जयपुर )
  6. देवनारायण जी मंदिर ( तालुकाबास उर्फ रघुनाथपुरा, जयपुर )

देवनारायणजी जन्म - गोठांदड़ावता भीलवाड़ा : इनका भव्य मंदिर मालासेरी डूंगरी, तहसील आसीन्द जिला भीलवाड़ा राजस्थान में है। अवतार मालासेरी डूंगरी पर माता साडू की अखंड तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु देवनारायण के रूप में शंक सवंत 968 माघ महीने की छठ-सातम की शामी रात शनिवार को चट्टान फाड़कर कमल फूल की नाभि से अवतार लिया। उसी क्षण मालासेरी डूंगरी कुछ पलों के लिए पूरी सोने की हुई राजा इंद्र ने नन्हीं बूंदों से बरसात की और 33 करोड़ देवी देवताओं ने पुष्प वर्षा की। स्वर्ग से पांच कामधेनु गाय उत्तरी। देव जी के अवतार से 6 माह पूर्व भादवी छठ पर इसी डूंगरी पर एक अन्य सुरंग से देव जी के घोड़े लीलाधर का अवतार हुआ और इसी के पास एक और सुरंग से नाग वासक राजा का अवतार हुआ। जिस जगह कमल का फूल निकला उस जगह अनन्त सुरंग हे जो वर्तमान में उस सुरंग पर देवजीकी मूर्ति विराजमान हे ।

समाधि - देवमाली : अजमेर के देवमाली गांव में स्थित देवमाली मंदिर काफी प्रसिद्ध है। यह गुर्जर समाज के आराध्य देव भगवान देवनारायण की कर्म स्थली के रूप में जाना जाता है। इस मंदिर के प्रति गुर्जर समाज की एक अनोखी आस्था है। यहां पर इंसानों के साथ इंसानों के साथ ही चट्टानें भी भगवान को नमन करती हैं। माना जाता है कि उसके किनारे मौजूद ऊंची-ऊंची चट्टाने मंदिर की वजह से ही आज झुकी हुई हैं। पहाड़ी के पास स्थित इस मंदिर की स्थापना को लेकर कहा जाता है कि जब भगवान देवनारायण स्वर्ग से धरती पर आए थे इस जगह को उन्होंने सर्वप्रथम स्पर्श किया था।भगवान देवनारायण को प्रकृति से प्रेम होने की वजह से आज भी लोग यहां पर कच्चे घरों में रहना पसंद करते हैं। इतना ही नहीं यहां के लोग आधुनिकता से परहेज करते हैं। लोगों का मानना है कि इससे उन्हें एहसास होता है कि वह भगवान के घर में रह रहे हैं। लोगों का मानना है कि भगवान देवनारायण उनकी हर एक इच्छा को पूरा करते हैं।


विशेष[संपादित करें]

  • देवजी के देवरों में इनकी प्रतिमा की जगह बड़ी ईंट की पूजा होती है ।
  • देवनारायणजी को आयुर्वेदिक के ज्ञाता भी कहा जाता है।
  • देवनारायणजी की फड़ सबसे प्राचीन सबसे लम्बी चित्रित फड़ है ।
  • 1992 में इस फड़ पर डाक टिकट जारी हुआ।

आरती समय

  1. मंगल आरती प्रात : 4:00 बजे
  2. सूर्योदय आरती प्रात : 8:00 बजे
  3. श्रृंगार आरती दोपहर : 1:00 बजे
  4. गौधूलि आरती सांय : 7:00 बजे

सन्दर्भ[संपादित करें]