जज़िया

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जज़िया एक प्रकार का धार्मिक कर है। इसे मुस्लिम राज्य में रहने वाली गैर मुस्लिम जनता से बसूल किया जाता है। इस्लामी राज्य में केवल मुसलमानों को ही रहने की अनुमति थी और यदि कोई गैर-मुसलमान उस राज्य में रहना चाहे तो उसे जज़िया देना होगा। इसे देने के बाद गैर मुस्लिम लोग इस्लामिक राज्य में अपने धर्म का पालन कर सकते थे।

भारत में जजिया कर[संपादित करें]

भारत में जजिया कर लगाने का प्रथम साक्ष्य मुहम्मद बिन कासिम के आक्रमण के बाद देखने को मिलता है। सर्वप्रथम उसने ही भारत में सिंध प्रान्त के देवल में जजिया कर लगाया था। इसके बाद जजिया कर लगाने वाला दिल्ली सल्तनत का प्रथम सुल्तान फिरोज तुगलक था। इसने जजिया को खराज (भूराजस्व) से निकालकर पृथक कर के रूप में बसूला। इससे पूर्व ब्राह्मणों को इस कर से मुक्त रखा गया था। यह पहला सुल्तान था जिसने ब्राह्मणों पर भी जजिया कर लगा दिया।[1][2] फिरोज तुगलक के ऐसा करने के विरोध में दिल्ली के ब्राह्मणों ने भूख हड़ताल कर दी। फिर भी फिरोज तुगलक तुगलक ने इसे समाप्त करने की ओर कोई ध्यान नहीं दिया। अन्त में दिल्ली की जनता ने ब्राह्मणों के बदले स्वयं जजिया देने का निर्णय लिया। इसके बाद लोदी वंश के शासक सिकंदर लोदी ने जज़िया कर लगाया।

दिल्ली सल्तनत के फैलने के साथ जजिया कर का क्षेत्र भी बढ़ा। अलाउद्दीन खिलजी ने जजिया और खरज न दे पाने वालों को गुलाम बनाने का कानून बनाया। उसके कर्मचारी ऐसे लोगों को गुलाम बनाकर सल्तनत के शहरों में बेचते थे जहाँ गुलाम श्रमिकों की भारी मांग रहती थी। [3]मुस्लिम दरबारी इतिहासकार जियाउद्दीन बरनी ने लिखा है कि बयानह के काजी मुघिसुद्दीन ने अलाउद्दीन को सलाह दी थी कि इस्लाम की जरूरत है कि हिन्दुओं पर जजिया लगाया जाय ताकि हिन्दुओं के प्रति निरादर दिखाया जा सके और उन्हें अपमानित किया जा सके। उसने यह भी सलाह दी थी कि जजिया लगाना सुल्तान का मजहबी फर्ज है। [4]

सल्तनत के बाहर के मुसलमान शासकों ने भी हिन्दुओं पर जजिया कर लगाया। कश्मीर में सर्वप्रथम जजिया कर सिकंदर शाह द्वारा लगाया गया।[5] यह एक धर्मान्ध शासक था और उसने हिन्दुओं पर भारी अत्याचार किये। उसके बाद इसका पुत्र जैनुल आबदीन (1420-70 ईo) शासक बना और सिकन्दर द्वारा लगाए गए जजिया को समाप्त कर दिया। जजिया कर को समाप्त करने वाला यह पहला शासक था। गुजरात में जजिया सर्वप्रथम अहमदशाह (1411-42 ईo) के समय लगाया गया। उसने इतनी कड़ाई से जजिया वसूला कि बहुत से हिन्दू मजबूर होकर मुसलमान बन गए। [6][7]

शेरशाह के समय जजिया को 'नगर-कर' की संज्ञा दी गयी।

जजिया कर को समाप्त करने वाला पहला मुगल शासक अकबर था। अकबर ने 1564 ईo में जज़िया कर समाप्त किया, लेकिन 1575 ईo में पुनः लगा दिया। इसके बाद 1579-80 ईo में पुनः समाप्त कर दिया। औरंगजेब ने 1679 ईo में जजिया कर लगाया। उसके राज्य में जजिया कर के विरुद्ध हिन्दुओं ने विद्रोह भी किया जिससे बीच-बीच में कुछ स्थानों पर जजिया हटा लिया गया।[8] 1712 ईo में जहाँदारशाह ने अपने मंत्री जुल्फिकार खां व असद खां के कहने पर जजिया को विधिवत रूप से समाप्त कर दिया। इसके बाद फर्रूखशियर ने 1713 ईo में जज़िया कर को हटा दिया किन्तु 1717 ईo में इसने जजिया पुनः लगा दिया। अन्त में 1720 ईo में मुहम्मद शाह रंगीला ने जयसिंह के अनुरोध पर जजिया कर को सदा के लिए समाप्त कर दिया।

दक्षिणी इटली में जजिया कर[संपादित करें]

दक्षिणी इटली के मुसलमान शासकों ने सिसिली और बारी के गैर-मुसलमानों पर जजिया कर लगाया था। उसके बाद नॉर्मन विजय के बाद यह कर मुसलमान अल्पसंख्यकों पर लगाया गया और इसे भी जजिया (स्थानीय वर्तनी 'gisia') ही कहा गया। [9]

ऑटोमान साम्राज्य में जजिया[संपादित करें]

ईसाइयों और यहूदियों से वसूला गया जजिया, ऑटोमान के राजकोष को भरने का मुख्य स्रोत था।[10]

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. Vincent A Smith, The Oxford History of India: From the Earliest Times to the End of 1911 Archived 7 मई 2016 at the वेबैक मशीन. at Google Books, Chapter 2, pp. 249–51, Oxford University Press.
  2. Futuhat-i Firoz Shahi Archived 19 अक्टूबर 2016 at the वेबैक मशीन. Autobiography of Firoz Shah Tughlaq, Translated y Elliot and Dawson, Volume 3 - The History of India, Cornell University, pp 374–83
  3. Fouzia Ahmed (2009), The Delhi Sultanate: A Slave Society or A Society with Slaves?, Pakistan Journal of History and Culture, 30(1): 8-9
  4. Elliot, H. M. (Henry Miers), Sir; John Dowson. "15. Táríkh-i Fíroz Sháhí, of Ziauddin Barani" Archived 19 अक्टूबर 2016 at the वेबैक मशीन.. The History of India, as Told by Its Own Historians. The Muhammadan Period (Vol 3.). London, Trübner & Co. p. 184. "Quote - The Sultan then asked, "How are Hindus designated in the law, as payers of tributes or givers of tribute? The Kazi replied, "They are called payers of tribute, and when the revenue officer demands silver from them, they should tender gold. If the officer throws dirt into their mouths, they must without reluctance open their mouths to receive it. The due subordination of the zimmi is exhibited in this humble payment and by this throwing of dirt in their mouths. The glorification of Islam is a duty. God holds them in contempt, for he says, "keep them under in subjection". To keep the Hindus in abasement is especially a religious duty, because they are the most inveterate enemies of the Prophet, and because the Prophet has commanded us to slay them, plunder them, enslave them and spoil their wealth and property. No doctor but the great doctor (Hanafi), to whose school we belong, has assented to the imposition of the jizya (poll tax) on Hindus. Doctors of other schools allow no other alternative but Death or Islam."
  5. Kingship in Kaśmīr (AD 1148‒1459); From the Pen of Jonarāja, Court Paṇḍit to Sulṭān Zayn al-‛Ābidīn. Edited by Walter Slaje. With an Annotated Translation, Indexes and Maps. [Studia Indologica Universitatis Halensis. 7.] Halle 2014. ISBN 978-3-86977-088-8
  6. Satish C. Misra, The Rise of Muslim Power in Gujarat (Bombay, 1963), p.175.
  7. K. S. Lal. "Proselytization in Provincial Muslim Kingdoms". Indian Muslims: Who Are They. New Delhi. "The kingdom of Gujarat was established in 1396 and its rulers were descended from Wajih-ul-Mulk, a converted Rajput. This dynasty made great efforts to spread Islam. One of its famous rulers, Ahmad Shah (1411-1442), was responsible for many conversions. In 1414 he introduced the Jiziyah, and collected it with such strictness, that it brought a number of converts to Islam."
  8. Markovits, C. (Ed.). (2002). A History of Modern India: 1480–1950, Anthem Press. pp. 109-12.
  9. Shlomo Simonsohn, Between Scylla and Charybdis: The Jews in Sicily, Brill, ISBN 978-9004192454, pp 24, 163
  10. Peri, Oded (1990). "The Muslim waqf and the collection of jizya in late eighteenth-century Jerusalem". In Gilbar, Gad (ed.). Ottoman Palestine, 1800-1914 : Studies in economic and social history. Leiden: E.J. Brill. p. 287. ISBN 978-90-04-07785-0. "the jizya was one of the main sources of revenue accruing to the Ottoman state treasury as a whole."

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]