चारभुजा मन्दिर, राजसमंद

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चारभुजा
धर्म संबंधी जानकारी
सम्बद्धताहिंदू धर्म
अवस्थिति जानकारी
अवस्थितिगड़बोर् [कुम्भलगढ़ दुर्ग
ज़िलाराजसमंद
राज्यराजस्थान
देशभारत
वास्तु विवरण
निर्मातापांडव
अवस्थिति ऊँचाई[convert: invalid number]

चारभुजा एक ऐतिहासिक एवं प्राचीन हिन्दू मन्दिर है जो भारतीय राज्य राजस्थान के राजसमंद ज़िले की कुम्भलगढ़ तहसील के गढब़ोर गांव में स्थित है।


उदयपुर से 112 और कुम्भलगढ़ से 32 कि.मी. की दूरी के लिए मेवाड़ का जाना – माना तीर्थ स्थल हैं, जहां चारभुजा जी की बड़ी ही पौराणिक चमत्कारी प्रतिमा हैं। मेवाड़ के सांवलियाजी मंदिर, केशरियानाथ मंदिर, एकलिंगनाथ मंदिर, श्रीनाथजी मंदिर, द्वारिकाधीश मंदिर व चारभुजानाथ मंदिर सुप्रसिद्ध है।

🚩चारभुजा मन्दिर, गढबोर (राजसमंद ) 🚩

चारभुजा एक ऐतिहासिक एवं प्राचीन हिन्दू मन्दिर है जो भारत के राजस्थान राज्य में राजसमंद ज़िले की कुम्भलगढ़ तहसील के गढब़ोर गांव में स्थित है। उदयपुर से 112 और कुम्भलगढ़ से 32 कि.मी. की दूरी के लिए मेवाड़ का जाना – माना तीर्थ स्थल हैं, जहां चारभुजा जी की बड़ी ही पौराणिक चमत्कारी प्रतिमा हैं। मेवाड़ के एकलिंगनाथ मंदिर, श्रीनाथजी मंदिर, द्धारिकाधीश मंदिर व चारभुजानाथ मंदिर सुप्रसिद्ध है।

पौराणिक कथा के अनुसार श्रीकृष्ण भगवान ने उद्धव को हिमालय में तपस्या कर सद्गति प्राप्त करने का आदेश देते हुए स्वयं गौलोक जाने की इच्छा जाहिर की, तब उद्धव ने कहाकि मेरा तो उद्धार हो जाएगा पंरतु आपके परमभक्त पांडव व सुदामा तो आपके गौलोक जाने की खबर सुनकर प्राण त्याग देंगे। ऐसे में श्रीकृष्ण ने विश्वकर्मा से स्वयं व बलराम की मूर्तियां बनवाई, जिसे राजा इन्द्र को देकर कहा कि ये मूर्तियां पांडव युधिष्ठिर व सुदामा को सुपुर्द करके उन्हें कहना कि ये दोनों मूर्तियां मेरी है और मैं ही इनमें हूं। प्रेम से इन मूर्तियों का पूजन करते रहें, कलयुग में मेरे दर्शन व पूजा करते रहने से मैं मनुष्यों की इच्छा पूर्ण करूंगा। इन्द्र देवता ने श्रीकृष्ण की मूर्ति सुदामा को प्रदान की और पांडव व सुदामा इन मूर्तियों की पूजा करने लगे। वर्तमान में गढ़बोर में चारभुजा जी के नाम से स्थित प्रतिमा पांडवो द्वारा पूजी जाने वाली मूर्ति और सुदामा द्वारा पूजी जाने वाली मूर्ति रूपनारायाण जी के नाम से सेवंत्री गांव में स्थित है। कहा जाता है कि पांडवो ने हिमालय जाने से पूर्व मूर्ति को जलमग्न करके गए थे ताकि इसकी पवित्रता को कोई खंडित न कर सके।

गढ़बोर के तत्कालीन राजपूत शासक गंगदेव को चारभुजानाथ ने सपने में आकर आदेश दिया कि पानी में से निकालकर मूर्ति मंदिर बनाकर स्थापित करो। राजा ने ऐसा ही किया, उसने जल से प्राप्त मूर्ति को मंदिर में स्थापित करवा दी। कहा जाता है कि मुगलों के अत्याचारों को देखते हुए मूर्ति को कई बार जलमग्न रखा गया है। महाराणा मेवाड़ ने चारभुजानाथ के मंदिर रखरखाव में बहुत ही बड़ा योगदान दिया हुआ है मुख्य मंदिर के अंदर मेवाड़ के राजा महाराजाओं की तस्वीरें भी लगी हुई है पुराने समय में मंदिर का सेवा पूजा का खर्चा भी राजा महाराजा की ओर से आता था _ इसके पश्चात औरंगजेब में जब पूरे भारत में मंदिरों की मूर्तियां खंडित की सोमनाथ मंदिर चित्तौड़ के और पूरे भारतवर्ष में हिंदू मंदिर को खंडित किया गया उस समय खंडित करने के डर से प्रभु श्री चारभुजा नाथ की मूर्ति को पुनह जल प्रवेश कर दिया गया उसके पश्चात अरावली की पहाड़ियों घने जंगल में गाय चराने आए गोपवंश के सूराजी महाराज जो अपनी गाय चराते थे इस पहाड़ियों में उस समय गोरी नाम की जो गाय जो गोधूलि वेला मे पहाड़ी के पिछ़ेखड़ी रहती और उस थन से पूरा दूध अपने आप जमीन पर गिरता और फिर गाय वापिस अपने झुंड में आ जाती थी शाम को गाय का बछड़ा दूध के टाइम पर बिलकता फिर सूराजी ने देखा की गाय का रोज दूध कहां जाता है तो फिर अगले दिन पूर्ण ध्यान से गाय का पीछा किया तो गाय एक पहाड़ी के पीछे जाकर खड़ी हुई उसके थन से अपने आप दूध निकलने लगा और जमीन में खींचा जा रहा था फिर सूराजी ने सोचा हे भगवान यह क्या हो रहा है इस गाय का बछड़ा भूख से बिलख रहा है यह क्या माया है प्रभु या कोई गलती हुई है मुझसे भगवान आप ही बताएं फिर रात को प्रभु श्री चतुर्भुज नाथ चारभुजा जी सपने में आए और कहा भक्त तुझे मेरी सेवा करनी पड़ेगी जहां गाय दूध पिलाती है वहां नीचे मेरी मूर्ति है स्थापना करवा कर मेरी पूजा करना इतनी बात सुनकर सूराजी की आंख खुली तो बालस्वरूप प्रभु सामने प्रकट हुए इतना देख सूराजी जी घबरा गए और बोला प्रभु आपकी सेवा में कैसे कर सकता हूं मैं जाति का गुर्जर हु घर में गाय भैंस पालने वाला रोज मेरे घर में सूतक रहता है गाय भैंस बच्चे को जन्म दे तो मैं यह कैसे कर सकता हूं यह सुन प्रभु ने कहा भक्त तेरी सेवामें अगर भाव है तो उल्टा करोगे तो भी सीधा मानूंगा और गाय भैंस का सूतक नहीं मानूंगा पर भेड़ बकरी मत रखना आज भी चारभुजा जी के पुजारी भेड़ बकरी नहीं रखते

मंगल वेला में फिर सुराजी

ने प्रभु की मूर्ति जो गंगदेव जी का वांगा से मूर्ति को निकालकर मंदिर में स्थापित कर दिया इसके पश्चात चारभुजा नाथ की सेवा पूजा गोपवंश गुर्जर सुराजी बगड़वाल परिवार करता आ रहा है परिवार में तीन गोत्र है

1 बगड़वाल 2 चौहान 

3 पन्चौली मेवाड़ मारवाड़ और मालवा के आराध्य चारभुजानाथ (गढ़बोर) मंदिर की परंपराएं और सेवा-पूजा की मर्यादाएं भी अनूठी हैं। करीब 5285 साल पहले पांडवों के हाथों स्थापित इस मंदिर में कृष्ण का चतुर्भुज स्वरूप विराजित है। यहां के पुजारी गुर्जर समाज के 500 परिवार हैं।इनमें सेवा-पूजा ओसरे के अनुसार बंटी हुई है।

ओसरे की परंपरा ऐसी है कि कुछ परिवारों का ओसरा जीवन में सिर्फ एक बार (48 से 50 साल में) तो किसी को चार साल के अंतराल मेंआता है।हर अमावस्या कोओसरा बदलता है और अगला परिवार मुख्य पुजारी बनता है। ओसरे का निर्धारण बरसों पहले गोत्र और परिवारों की संख्या के अनुसार हुआ था, जो अब भी चल रहा है। मंदिर के गर्भगृह में पुजारी परिवार के अलावा किसी को जाने को अनुमति नहीं होती ।

ओसरा चलने तक मंदिर में ही रहते हैं पुजारी, परिवार में मौत हो तब भी नहीं जा सकते ।ओसरे के दौरान पाट पर बैठ चुके पुजारी को एक महीने के कठिन तप, मर्यादाओं में रहना पड़ता है। ओसरा चलने तक पुजारी घर नहीं जा सकते हैं, उन्हें मंदिर में ही रहना पड़ता है। परिवार या सगे-संबंधियों में मौत होने पर भी पूजा का दायित्व निभाना होता है। पूजा के ओसरे में एक महीने हर प्रकार के व्यसन से दूर रहने, बदन पर साबुन नहीं लगाने, ब्रह्मचर्य पालन की मर्यादाएं निभाते हैं। भगवान की रसोई में ओसरा निभाने वाले परिवार द्वारा चांदी के कलश में लाया जल ही काम में लिया जाता है। फागोत्सव में पंद्रह दिन और जलझूलनी पर सात दिन सोने के कलश में जल लाया जाता है। चारभुजानाथ में दिनभर में पांच दर्शन होते हैं। मंगला में मक्खन, राजभोग में केसरिया भात, लापसी, सादा चावल, शाम को कसार, दूध का प्रसाद और गोला मिश्री चढ़ता है।मंदिर के बारे में ये भी रोचक शंख, चक्र, गदा, ढाल-तलवार, भाला ठाकुरजी को धराए जाते हैं।मान्यता है कि प्रतिमा स्थापना के बाद पांडवों ने बद्रीनाथ में जाकर तन त्यागा था ।शृंगार में मोर मुकुट, बंशी सहित रत्नजड़ित मालाओं का आभूषण धराया जाता है सुबह 8 बजे से शाम 7.30 बजे तक खुले रहते हैं दर्शन।जन्माष्टमी पर भगवान के पोतड़े धोने की परंपरा निभाई जाती है। गढ़बोर में चारभुजानाथ का प्रतिवर्ष भाद्रपद मास की एकादशी (जलझुलनी एकादशी) को विशाल मेला लगता है। चारभुजा गढ़बोर में हर वर्ष लाखो श्रद्धालु दर्शन करने आते है। यहां पर आने वाले भक्तों की मनोकामना पूरी होती है। 🙏 जय श्री चारभुजा जी 🙏 श्री चारभुजा नाथ जी पुजारी मन्दिर मण्डल

       @bheru_gurjar_charbhuja

सन्दर्भ[संपादित करें]

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