कोसला

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कोसला 
भालचंद्र नेमाडे द्वारा उपन्यास
शैली
मूल देश
लेखक
काम या नाम की भाषा
प्रकाशन की तिथि
  • सितंबर 1963
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कोसला यह भारतीय लेखक भालचंद्र नेमाडे द्वारा १९६३ में प्रकाशित एक मराठी भाषा का उपन्यास है। इसे नेमाडे की सर्वोत्तम रचना के रूप में माना जाता है, और मराठी साहित्य के एक आधुनिक क्लासिक साहित्य के रूप में स्वीकार किया जाता है। उपन्यास की कथा एक युवक, पांडुरंग संगविकर और उसके दोस्तों के महाविद्यालय के वर्षों से आगे की यात्रा को बयान करता है। इस उपन्यास में लेखक ने आत्मकथा के रूप का उपयोग किया है।

कोसला को मराठी साहित्य में पहला अस्तित्ववादी उपन्यास माना जाता है।[1] प्रकाशन के बाद से, इसके खुले अंत और विभिन्न विवेचनों के लिए इस उपन्यास को अनेक रूप में देखा गया है। यह उपन्यास १९६० के बाद के मराठी उपन्यासों का एक आधुनिक क्लासिक बन गया है, और इसका आठ दक्षिण एशियाई भाषाओं में और अंग्रेजी में अनुवाद किया गया है।

इसके प्रकाशन के साथ नेमाडे तेजी से अपनी पीढ़ी के प्रतिनिधि लेखक माने जाने लगे। [2] कोसला पर आधारित नाटक मी, पांडुरंग संगविकर , का निर्देशन मंदार देशपांडे ने किया हैं। [3]

प्रकाशन[संपादित करें]

लेखक भालचंद्र नेमाडे

कोसला यह भालचंद्र नेमाडे का पहला उपन्यास है और इसकी कल्पना और लेखन उन्होंने अपने जीवन के मुम्बई के चरण के दौरान किया था।[2] २१ साल की उम्र में, नेमाडे अपनी पत्रकारिता आकांक्षाओं में विफल हो गयें, और अपने गांव लौट आए। उन्हे अपने पिता द्वारा वहाँ पर झिड़क दिया गया था, क्योंकि वें निराश थे कि उनके बेटे ने एक महंगी शिक्षा को खत्म करने का जोखिम उठाया और डरपोक की तरह पिछे मुड़ गए।

सन् १९६३ में, नेमाडे २५ वर्ष के थे और अपने गाँव में रह रहें थे। खुद को वे हिंदू राजा त्रिशंकु की तुलना में देखते थें, क्योंकि उन्हें भी न तो शहर और न ही उनके गांव के परिवार द्वारा स्वीकारा गया। उन्होंने घर के एक कमरे में खुद को बंद कर दिया और तीन सप्ताह की अवधि में अपना उपन्यास लिखा। कोसला को उसी साल सितम्बर में जे. जे. देशमुख द्वारा प्रकाशित किया गया, जो नेमाडे को मुम्बई से जानते थे और उन्हे लिखने के लिए प्रोत्साहित किया करते थे।[2]

कथा[संपादित करें]

कोसला पांडुरंग संगविकर के जीवन के पहले पच्चीस वर्षों को दिखाने के लिए प्रथम-व्यक्ति कथा तकनीक का उपयोग करता है।[2] यह एक ग्रामीण परवरिश का युवक है जो अपनी उच्च शिक्षा के लिए पुणे जाता है। वह अपनी नई सामाजिक स्थिती में अलग महसूस करता है, और निरंतरता की यह भावना उसे घर लौटने के लिए प्रेरित करती है। वहाँ, वह अपनी बहन की मृत्यु, उसके पिता के प्रभुत्व और अपनी स्वयं की वित्तीय निर्भरता के साथ आगे के मोहभंग का सामना करता है।[1] उपन्यास का उद्देश्य पांडुरंग, एक युवा लड़के के दृष्टिकोण से समाज को चित्रित करने का है।

पात्र[संपादित करें]

उपन्यास के मुख्य पात्र है: [4]

  • पांडुरंग संगविकर - उपन्यास के नायक, और एक गाँव के अमीर किसान का इकलौता बेटा। उनके हॉस्टल के साथी छात्र उन्हें उनके उपनाम पांडु से बुलाते हैं।
  • पांडुरंग के पिता - एक संयुक्त परिवार के मुखिया और उनके गाँव के एक अमीर और सम्मानित व्यक्ति।
  • मणी - पांडुरंग की छोटी बहन।
  • गिरिधर - पांडुरंग का ग्राम मित्र।
  • सुरेश बापट - पुणे में पांडुरंग का कॉलेज मित्र।

अनुवाद[संपादित करें]

कोसला का आठ भारतीय भाषाओं में और अंग्रेजी में अनुवाद किया गया है। उपन्यास के उपलब्ध अनुवाद इस प्रकार हैं:

शीर्षक भाषा अनुवादक साल प्रकाशक संदर्भ
ककून अंग्रेज़ी सुधाकर मराठे १९९७ मैकमिलन पब्लिशर्स इंडिया, चेन्नई [5]
कोसला हिन्दी भगवानदास वर्मा १९९२ नेशनल बुक ट्रस्ट, नई दिल्ली [6]
कोशेतो गुजराती उषा शेठ १९९५ नेशनल बुक ट्रस्ट, नई दिल्ली [7]
कोशला कन्नड़ वामन दत्तात्रेय बेंद्रे १९९५ नेशनल बुक ट्रस्ट, नई दिल्ली [8]
पलूर वाह असमिया किशोरीमोहन शर्मा १९९६ नेशनल बुक ट्रस्ट, नई दिल्ली [9]
कोशल पंजाबी अजित सिंह १९९६ नेशनल बुक ट्रस्ट, नई दिल्ली [10]
नीड बंगाली वंदना अलसे हजरा २००१ साहित्य अकादमी, नई दिल्ली [11]
कोसला उर्दू मुशर्रफ आलम जौकी २००२ नेशनल बुक ट्रस्ट, नई दिल्ली [12]
कोशापोक Odia चेरश्री इंद्रसिंह २००५ नेशनल बुक ट्रस्ट, नई दिल्ली [13]

संदर्भ[संपादित करें]

  1. Nalini Natarajan; Emmanuel Sampath Nelson (1996). Handbook of Twentieth-century Literatures of India. Westport: Greenwood Publishing Group. पृ॰ 233. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-0-313-28778-7. मूल से 13 फ़रवरी 2020 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 5 मई 2020.
  2. Chitre, Dilip (1969). "Alienation in Four Marathi Novels". Humanist Review. Bombay: Modern Education Foundation. 1 (2): 161–175. OCLC 1752400.
  3. Banerjee, Kaushani (31 July 2016). "Pratibimb Marathi Natya Utsav: A mix of commercial and experimental plays – art and culture". Hindustan Times. मूल से 8 जुलाई 2018 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 8 July 2018.
  4. George, K. M., संपा॰ (1997). Masterpieces of Indian Literature. New Delhi: National Book Trust. पपृ॰ 875–877. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-81-237-1978-8. मूल से 21 दिसंबर 2016 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 5 मई 2020.
  5. The Book Review. C. Chari for Perspective Publications. 2000. पृ॰ 31.
  6. Nemade, Bhalchandra (1992). Kosalā. Verma, Bhagwandas द्वारा अनूदित. New Delhi: National Book Trust. OCLC 614973397.
  7. Nemade, Bhalchandra (1995). Kośeṭo (गुजराती में). Sheth, Usha द्वारा अनूदित. New Delhi: National Book Trust. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 8123713584.
  8. Kartik Chandra Dutt (1999). Who's who of Indian Writers, 1999: A-M. New Delhi: Sahitya Akademi. पृ॰ 127. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-81-260-0873-5. मूल से 5 मई 2016 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 5 मई 2020.
  9. Nemade, Bhalchandra (1996). Palur Vaah (असमिया में). Sharma, Kishorimohan द्वारा अनूदित. New Delhi: National Book Trust.
  10. Nemade, Bhalchandra (1996). Kosalā (पंजाबी में). Singh, Ajeet द्वारा अनूदित. New Delhi: National Book Trust. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 8123717652.
  11. Rao, D. S. (2004). Five Decades: The National Academy of Letters, India : a Short History of Sahitya Akademi. New Delhi: Sahitya Akademi. पृ॰ 11. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-81-260-2060-7.
  12. Nemade, Bhalchandra (2002). Kosala (उर्दू में). Jauki, Musharraf Alam द्वारा अनूदित. New Delhi: National Book Trust.
  13. Nemade, Bhalchandra (2005). Koshapok (उड़िया में). Indrasingh, Cheershree द्वारा अनूदित. New Delhi: National Book Trust.