उत्तराखण्ड संस्कृत विश्वविद्यालय

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अधिसूचना संख्या 486/विधायी एवं संसदीय कार्य/2005 द्वारा उत्तराखण्ड शासन ने हरिद्वार में उत्तराखण्ड संस्कृत विश्वविद्यालय की स्थापना की। उत्तराखंड के वे समस्त महाविद्यालय जो पूर्व में सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय से सम्बद्ध थे, उाराखण्ड संस्कृत विश्वविद्यालय से सम्बद्ध हो गए। आज इनकी संख्या बावन (52) है। ज्ञातव्य है कि उत्तराखण्ड राज्य में देवभाषा संस्कृत को द्वितीय राजभाषा का स्थान प्रदान किया गया है।

उाराखण्ड संस्कृत विश्वविद्यालय की स्थापना के प्रमुख उद्देश्य[संपादित करें]

1.राज्य गठन के उपरान्त सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय से सम्बद्ध महाविद्यालयों को राज्य के क्षेत्राधिकार के अन्तर्गत अधिनियमों/परिनियमों के प्राविधानानुसार व्यवस्थित करना।

2.प्राचीन परम्पराओं के साथ–साथ प्राच्य एवं पाश्चात्य ज्ञान–विज्ञान का समन्वय।

3.भारतीय संस्कृति के साथ–साथ अन्य संस्कृतियों का तुलनात्मक अध्ययन अनुसंधान। मानव संस्कृति और भारत की राष्ट्रीय एकता की सर्वातिशय सशक्त सूत्र संस्कृत के अनुसंधान, तुलनात्मक भाषा विज्ञान, नृवंश विज्ञान के अध्ययन की धारणाओं में परिष्कार एवं नवीन उद्भावनाएं प्रस्तुति।

4.प्राच्य भाषाओं एवं उनसे सम्बन्धित विभिन्न विषयों के अध्ययन अध्यापन की परम्परा कायम रखना।

5.संस्कृत साहित्य में निहित चिंतन पद्धति से आधुनिक समकालीन समाज के जीवन की चुनौतियों, समस्याओं के समाधान खोजने के प्रयास हेतु अनुसंधान।

6.वेदोपनिषदों सहित संस्कृत के उत्कृष्टतम ग्रंथों में निहित वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक विचारों का समेकन, विशेषकर गणित, नक्षत्र विज्ञान, कृषि विज्ञान, नृतत्व शास्त्र, प्रबन्धन, लोक प्रशासन, राजनय आदि विविध क्षेत्रों की आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकी रूपों में प्रस्तुति, ताकि वैदिक एवं प्राचीन सांस्कृतिक धरोहर के समन्वय के माध्यम से वैज्ञानिक ज्ञान का समादर एवं समावेश किया जा सके। विज्ञान के ‘रूद्र’ और साहित्य के ‘शिव’ तत्व का समष्टिगत कल्याण की दृष्टि से अंकन किया जाय।

7.वैदिक साहित्य और संस्कृत के श्रेष्ठ लौकिक साहित्य, पालि एवं प्राकृत के महत्वपूर्ण ग्रन्थों का समस्त भारतीय भाषाओं की लिपियों में प्रकाशन एवं अनुवाद।

8.संस्कृत के श्रेष्ठ साहित्य, पाम्परिक अनुष्ठानों, सांस्कृतिक पक्षों की दृश्य-श्रव्य माध्यम से प्रस्तुति।

9.संस्कृत को रोजगारपरक पाठ्यक्रमों के माध्यम से अधिकाधिक सम्बद्ध करने के प्रयास।

10.राष्ट्रीय, अन्तर्राष्ट्रीय गोष्ठियों/कार्यशालाओं/पुनश्चर्या पाठ्यक्रमों के माध्यम से संस्कृत के अधुनातन ज्ञान–विज्ञान से विश्वविद्यालय के छात्राध्यापकों को परिचित कराना।

11.भारत सरकार/विश्वविद्यालय अनुदान आयोग/अन्य प्रदेशों की सरकारों के सहयोग से सृजन पीठ / शोध पीठ / अध्ययन पीठों की स्थापना।

12.उाराखण्ड की संस्कृति का व्यापक अध्ययन और शोध।

13.विश्वविद्यालय द्वारा प्रदत्त प्रमाणपत्रों/उपाधियों का भारतीय विश्वविद्यालयों एवं विदेशी विश्वविद्यालयों के साथ विश्वस्तरीय प्रत्यायन।

14.अखिल भारतीय एवं राज्याधीन सेवाओं की प्रतियोगिता परीक्षाओं हेेतु संस्कृत को लोकप्रिय बनाना।

15.भारतीय संस्कृति की मूल चेतना ‘संस्कृत’ के महत्व से युवा पीढ़ी को अधिकाधिक जोड़ने की दिशा में प्रभावी एवं सार्थक प्रयास जिससे अति भौतिक वाद की अंधी दौड़ की चकाचौंध में युवा वर्ग भारतीय सांस्कृतिक विरासत से बिल्कुल विमुख न हो जाय।

16.कार्यपरिषद के विनिश्चय के अनुसार राष्ट्रीय अभियोग्यता परीक्षा (नेट) की तैयारी हेतु संस्कृत छात्रों के लिए प्रावधान निर्धारित किये गये है।

पाठ्यक्रम एवं पाठ्यविषय[संपादित करें]

विश्वविद्यालय परिसर में शैक्षिक सत्र 2007–08 से साहित्य, दर्शन, नव्यव्याकरण आदि परम्परागत विषयों में अध्ययन–अध्यापन कार्य प्रारम्भ हो गया है। वर्तमान समय की प्रासंगिकता को देखते हुए विश्वविद्यालय द्वारा समानान्तर रोजगार परक पाठ्यक्रम भी प्रारम्भ किए गए है। जिसमें योग पाठ्यक्रम हेतु छात्र–छात्राओं ने काफी रुचि दिखाई है। विश्वविद्यालय अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए परम्परागत स्नातक/स्नातकोत्तर स्तरीय पाठ्यक्रमों का संचालन करता है। इन पाठ्यक्रमों का अध्ययन–अध्यापन सम्बद्ध विद्यालयों/महाविद्यालयों में होता है और विश्वविद्यालय द्वारा परीक्षाओं का आयोजन किया जाता है। इसमें अनिवार्य विषय के रूप में संस्कृत–भाषा और व्याकरण, हिन्दी तथा वैकल्पिक विषय के रूप में ‘क’ वर्ग में शास्त्रीय विषय तथा ‘ख’ वर्ग में आधुनिक विषयों का समावेश है। साथ ही अतिरिक्त विषय के रूप में अंग्रेजी है।

स्नातक पाठ्यक्रम[संपादित करें]

शास्त्री – यह स्नातक पाठ्यक्रम तीन वर्ष का है, जिसमें प्रथम तथा द्वितीय वर्ष में संस्कृत भाषा–साहित्य और सामान्य दर्शन तथा हिन्दी अनिवार्य विषय है। वैकल्पिक विषयों के दो वर्ग है। ‘क’ तथा ‘ख’ प्रत्येक वर्ग से एक विषय का अध्ययन अपेक्षित है। ‘क’ वर्ग– ऋग्वेद, शुक्लयजुर्वेद, कृष्णयजुर्वेद, सामवेद, अथर्वेद, धर्मशास्त्र, प्राचीन एवं नव्यव्याकरण, ज्योतिष (सिद्धान्त, गणित एवं फलित), साहित्य, पुराणेतिहास, वेदान्त, दर्शन, सांख्य योग, भाषा विज्ञान। ‘ख’ वर्ग– इतिहास, राजशास्त्र, अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र, भूगोल, विज्ञान, गृहविज्ञान, नेपाली, राजनीति विज्ञान।

अतिरिक्त विषय– अंगे्रजी।

स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम[संपादित करें]

आचार्य– यह पाठ्यक्रम परम्परागत आधार पर द्विवर्षीय है। जिसमें स्नातक पाठ्यक्रम के सभी ‘क’ वर्गीय विषयों का अध्ययन–अध्यापन होता है।

व्यावसायिक पाठ्यक्रम[संपादित करें]

वर्तमान में पी0जी0 डिप्लोमा इन योग, ज्योतिष, वास्तुशास्त्र, कर्मकाण्ड एवं पौरोहित्य पत्रकारिता एवं जनसंचार, पाण्डुलिपि एवं पुरालिपि विज्ञान, ग्रन्थालय विज्ञान (बी0लिब्0, एम0लिब्0) पी0जी0 डिप्लोमा संगणक (सभी एक वर्षीय अर्थात् दो सेमेस्टर) तथा योगाचार्य (द्विवर्षीय अर्थात् चार सेमेस्टर) का संचालन विश्वविद्यालय परिसर में किया जा रहा है।