राष्ट्रवाद

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज
राष्ट्रवादी कला का एक नमूना : लोगों का नेतृत्व करती हुई लिबर्टी (Eugène Delacroix, 1830)

राष्ट्रवाद एक विश्वास, पन्थ या राजनीतिक विचारधारा है जिसके द्वारा व्यक्ति अपने गृह राष्ट्र के साथ अपनी पहचान बनाता या लगाव व्यक्त करता है। यह एक ऐसी अवधारणा है जिसमें राष्ट्र को सबसे अधिक प्राथमिकता दी जाती है।

परिचय[संपादित करें]

राष्ट्रवाद लोगों के किसी समूह की उस आस्था का नाम है जिसके तहत वे ख़ुद को साझा इतिहास, परम्परा, भाषा, जातीयता और संस्कृति के आधार पर एकजुट मानते हैं। इन्हीं बंधनों के कारण वे इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि उन्हें आत्म- निर्णय के आधार पर अपने सम्प्रभु राजनीतिक समुदाय अर्थात् ‘राष्ट्र’ की स्थापना करने का आधार है। राष्ट्रवाद के आधार पर बना राष्ट्र उस समय तक कल्पनाओं में ही रहता है जब तक उसे एक राष्ट्र-राज्य का रूप नहीं दे दिया जाता। हालाँकि दुनिया में ऐसा कोई राष्ट्र नहीं है जो इन कसौटियों पर पूरी तरह से फिट बैठता हो, इसके बावजूद अगर विश्व की एटलस उठा कर देखी जाए तो धरती की एक-एक इंच ज़मीन राष्ट्रों की सीमाओं के बीच बँटी हुई मिलेगी। राष्ट्रवाद का उदय अट्ठारहवीं और उन्नीसवीं सदी के युरोप में हुआ था, लेकिन अपने सिर्फ़ दो-ढाई सौ साल पुराने ज्ञात इतिहास के बाद भी यह विचार बेहद शक्तिशाली और टिकाऊ साबित हुआ है। राष्ट्रीय सीमाओं के भीतर रहने वाले लोगों को अपने-अपने राष्ट्र का अस्तित्व स्वाभाविक, प्राचीन, चिरंतन और स्थिर लगता है। इस विचार की ताकत का अंदाज़ा इस हकीकत से भी लगाया जा सकता है कि इसके आधार पर बने राष्ट्रीय समुदाय वर्गीय, जातिगत और धार्मिक विभाजनों को भी लाँघ जाते हैं। राष्ट्रवाद के आधार पर बने कार्यक्रम और राजनीतिक परियोजना के हिसाब से जब किसी राष्ट्र-राज्य की स्थापना हो जाती है तो उसकी सीमाओं में रहने वालों से अपेक्षा की जाती है कि वे अपनी विभिन्न अस्मिताओं के ऊपर राष्ट्र के प्रति निष्ठा को ही अहमियत देंगे। वे राष्ट्र के कानून का पालन करेंगे और उसकी आंतरिक और बाह्य सुरक्षा के लिए अपने प्राणों का बलिदान भी दे देंगे। यहाँ यह स्पष्ट कर देना ज़रूरी है कि आपस में कई समानताएँ होने के बावजूद राष्ट्रवाद और देशभक्ति में अंतर है। राष्ट्रवाद अनिवार्य तौर पर किसी न किसी कार्यक्रम और परियोजना का वाहक होता है, जबकि देशभक्ति की भावना ऐसी किसी शर्त की मोहताज नहीं है।

राष्ट्रवाद के आलोचकों की कमी नहीं है और न ही उसे ख़ारिज करने वालों के तर्क कम प्रभावशाली हैं। एक महाख्यान के तौर पर राष्ट्रवाद छोटी पहचानों को दबा कर पृष्ठभूमि में धकेल देता है। अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ चले राष्ट्रवादी आंदोलन के दौरान रवींद्रनाथ ठाकुर जैसी हस्तियाँ इस विचार को संदेह की निगाह से देखती थीं। पर दिलचस्पी का विषय तो यह है कि राष्ट्रवाद के ज़्यादातर आलोचक राष्ट्र की सीमा में रहने के लिए ही विवश नहीं हैं, पर उनमें से कई हस्तियाँ किसी न किसी राष्ट्र की स्थापना में योगदान करते हुए नज़र आती हैं। राष्ट्रवाद विभिन्न विचारधाराओं को भी अपने आगोश में समेट लेता है। भारत के उदाहरण पर ग़ौर करने से साफ़ हो जाता है कि किस प्रकार आधुनिकतावादी जवाहरलाल नेहरू, मार्क्सवादी कृष्ण मेनन, उद्योगवादविरोधी महात्मा गाँधी और इसी तरह कई तरह की विचारधाराओं के पैरोकारों ने मिल कर भारतीय राष्ट्रवाद का निर्माण किया है। राष्ट्रवाद के प्रश्न के साथ कई सैद्धांतिक उलझनें जुड़ी हुई हैं।  मसलन, राष्ट्रवाद और आधुनिक संस्कृति व पूँजीवाद का आपसी संबंध क्या है? पश्चिमी और पूर्वी राष्ट्रवाद के बीच क्या फ़र्क है? एक राजनीतिक परिघटना के तौर पर राष्ट्रवाद प्रगतिशील है या प्रतिगामी? हालाँकि धर्म को राष्ट्र के बुनियादी आधार के तौर पर मान्यता प्राप्त नहीं है, फिर भी भाषा के साथ-साथ धर्म के आधार पर भी राष्ट्रों की रचना होती है। सवाल यह है कि ये कारक राष्ट्रों को एकजुट रखने में नाकाम क्यों हो जाते हैं? सांस्कृतिक और राजनीतिक राष्ट्रवाद को अलग-अलग कैसे समझा जा सकता है? इन सवालों का जवाब देना आसान नहीं है, क्योंकि राजनीति विज्ञान में एक सिद्धांत के तौर पर राष्ट्रवाद का सुव्यवस्थित और गहन अध्ययन मौजूद नहीं है। विभिन्न राष्ट्रवादों का परिस्थितिजन्य चरित्र भी इन जटिलताओं को बढ़ाता है। यह कहा जा सकता है कि ऊपर वर्णित समझ के अलावा राष्ट्रवाद की कोई एक ऐसी सार्वभौम थियरी उपलब्ध नहीं है जिसे सभी पक्षों द्वारा मान्यता दी जाती हो।

मार्क्सवाद भी राष्ट्रवाद से संबंधित सिद्धांत मुहैया कराने में नाकाम रहा है। दुनिया भर के मज़दूरों को एक होने का नारा देने वाले मार्क्स और एंगेल्स मानते थे कि मज़दूरों का कोई देश नहीं होता। अपने लेखन में उन्होंने वर्ग- विभाजन के परे जा कर राजनीतिक-सामाजिक और सांस्कृतिक एकता करने वाली किसी परिघटना को तरजीह नहीं दी। अपने युग के कुछ राष्ट्रीय संघर्षों के बारे में तो उनकी तिरस्कारपूर्ण धारणा यह थी कि वे नष्ट हो जाने के लिए अभिशप्त हैं। राष्ट्रवाद का कोई मुकम्मल सिद्धांत देने के बजाय उनकी रचनाएँ अपने युग की व्यावहारिक राजनीति के तहत राष्ट्रीय प्रश्न पर विचार करती हैं। दूसरे और तीसरे इंटरनैशनल में राष्ट्रवाद पर काफ़ी बहस हुई। लेनिन ने एक विशाल बहुजातीय साम्राज्य में क्रांति करने की समस्याओं से जूझते हुए राजनीतिक लोकतंत्र की आवश्यकता को अपने राष्ट्रवाद संबंधी विश्लेषण के केंद्र में रखा। उनका निष्कर्ष था कि राष्ट्रों को आत्म-निर्णय  का अधिकार मिलना चाहिए। इसके बाद स्तालिन की विख्यात रचना मार्क्सिज़म ऐंड नैशनल क्वेश्चन सामने आयी जिसमें उन्होंने राष्ट्रवाद की थियरी देने की कोशिश की। स्तालिन ने राष्ट्र के पाँच मुख्य तत्त्व बताये : एक स्थिर और नैरंतर्य से युक्त समुदाय, एक अलग भू-क्षेत्र, समान भाषा, आर्थिक सुसंगति और सामूहिक चरित्र। चूँकि स्तालिन राष्ट्रों के उभार को उद्योगीकरण की ज़रूरतों से जोड़ कर देख रहे थे इसलिए उनका सिद्धांत राष्ट्रवाद की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और उससे उभरने वाले बहुत से प्रश्नों की उपेक्षा कर देता था। कुल मिला कर मार्क्सवादी मानते रहे कि राष्ट्रवाद पूँजीवाद के विकास में उसका सहयोगी बन कर उभरा है। इस लिहाज़ से उसे एक बूर्ज़्वा विचारधारा की श्रेणी में रखा जाना चाहिए। राष्ट्रवाद प्रभुत्वशाली वर्गों को एकजुट करके राजनीतिक समुदाय की एक भ्रांत अनुभूति पैदा करता है ताकि पूँजीपतियों द्वारा किये जाने वाले अहर्निश शोषण और दरिद्रीकरण के बावजूद आम लोग धनी वर्ग के साथ एकता का एहसास करते रहें। मार्क्सवादी विमर्श का एक विरोधाभास यह है कि राष्ट्रवाद को पूँजीवादी वर्ग की विचारधारा मानने के बाद भी क्रांतिकारी राजनीति के धरातल पर कई कम्युनिस्ट पार्टियों ने राष्ट्रवाद को अपनी गोलबंदी का आधार बनाया है। क्रांति के पश्चात् समाजवादी समाज की रचना के लिए भी राष्ट्रवादी भावनाओं का इस्तेमाल किया गया है।

सत्तर के दशक में होरेस बी. डेविस ने मार्क्सवादी तर्कों का सार-संकलन करते हुए राष्ट्रवाद के एक रूप को ज्ञानोदय से जोड़ कर बुद्धिसंगत करार दिया, और दूसरे रूप को संस्कृति और परम्परा से जोड़ कर भावनात्मक बताया। लेकिन, डेविस ने भी राष्ट्रवाद को एक औज़ार से ज़्यादा अहमियत नहीं दी और कहा कि हथौड़े से हत्या भी की जा सकती है और निर्माण भी। राष्ट्रवाद के ज़रिये जब उत्पीड़ित समुदाय अपनी आज़ादी के लिए संघर्ष करते हैं तो वह एक सकारात्मक नैतिक शक्ति बन जाता है, और जब राष्ट्र के नाम पर आक्रमण की कार्रवाई की जाती है तो उसका नैतिक बचाव नहीं किया जा सकता।  राष्ट्रवाद की सभी मार्क्सवादी व्याख्याओं में सर्वाधिक चमकदार थियरी बेनेडिक्ट ऐंडरसन द्वारा प्रतिपादित ‘कल्पित समुदाय’ (इमैजिन्ड कम्युनिटीज़) की मानी जाती है। ऐंडरसन का मुख्य सरोकार यह है कि एक-दूसरे से कभी न मिलने वाले और एक-दूसरे से पूरी तरह अपरिचित लोग राष्ट्रीय एकता में किस तरह बँधे रहते हैं।

दरअसल, राष्ट्रवाद से संबंधित सभी व्याख्याएँ थोड़ी दूर चलने के बाद पेचीदा हो जाती हैं। इनमें एक प्रमुख व्याख्या यह है कि आधुनिकीकरण की प्रक्रिया राष्ट्रवाद के ज़रिये ख़ुद को ज़मीन पर उतारती है। इस तरह राष्ट्रवाद ‘आधुनिकीकरण के धर्म’ के तौर पर उभरता है। आधुनिकता के कारण सामाजिक जीवन में आयी ज़बरदस्त आर्थिक और राजनीतिक उथल-पुथल के बीच राष्ट्रवाद के ज़रिये ही व्यक्ति एक अस्मिता और संसक्ति के सूत्र हासिल कर पाया। दूसरी तरफ़ यह भी एक हकीकत है कि राष्ट्रवाद कई बार आधुनिकीकरण को रोकने या सीमित करने वाली ताकत भी साबित हुआ है। राष्ट्रवादी दलीलों के आधार पर ही ऐसे कई व्यापार समझौतों का विरोध किया जाता है जिनसे राष्ट्रीय उद्योगीकरण और आर्थिक समृद्धि की प्रक्रिया को गति मिल सकती है। राष्ट्रवाद के धार्मिक संस्करण (जैसे, ईरान का इस्लामिक राष्ट्रवाद या भारतीय राजनीति के धार्मिक पहलू) सेकुलरीकरण की प्रक्रिया को अगर पूरी तरह ठप नहीं कर पाते तो धीमा अवश्य कर देते हैं। दूसरे, तीसरी दुनिया के अधिकतर देशों में राष्ट्रवाद करीब आधी सदी बीत जाने के बाद भी उद्योगीकरण और खेतिहर अर्थव्यवस्था की जद्दोजहद में फँसा हुआ है।

पश्चिमी और पूर्वी राष्ट्रवादों की तुलना करने के दौरान कुछ विद्वानों ने पूर्वी राष्ट्रवाद को पश्चिमी राष्ट्रवाद के स्वस्थ मूल्यों की कमी का शिकार बताया है। कुछ विद्वान पश्चिमी राष्ट्रवाद को राजनीतिक और पूर्वी राष्ट्रवाद को सांस्कृतिक की श्रेणी में रखते हैं। इन धारणाओं के विपरीत कुछ अन्य विद्वान उल्टी मान्यता पेश करते करते हैं : युरोपियन राष्ट्रवाद एक देशज ऐतिहासिक प्रक्रिया से निकलने के कारण कहीं अधिक सांस्कृतिक है, जबकि पूर्वी राष्ट्रवाद उपनिवेशवाद विरोधी राजनीतिक आंदोलनों के हाथों गढ़े जाने के कारण मूलतः राजनीतिक है।  दूसरे, अगर तीसरी दुनिया के देशों के राष्ट्रवाद पर प्रजातीय, जातीय और सांस्कृतिक पहलू हावी हैं तो उनके पीछे उपनिवेशवाद की भूमिका है जिसकी ज़िम्मेदारी पश्चिम पर ही डाली जानी चाहिए। उपनिवेशवादियों ने मनमाने ढंग से स्थानीय जातीयताओं की उपेक्षा की जिसके कारण अफ़्रीका में कई कबीलाई और जातायी समुदाय दो परस्पर संघर्षरत राष्ट्रों में विभाजित हो गये हैं। तीसरे, भारत समेत ऐसे कई समाज हैं जो पारम्परिक रूप से सांस्कृतिक, धार्मिक और भाषाई विविधता से सम्पन्न हैं। ऐसे समाजों में राष्ट्रवाद का अनुभव पश्चिमी अनुभव से भिन्न होना लाज़मी है। ऐसी परिस्थितियों में कभी तो राष्ट्रवाद बहुलताओं के बीच परस्पर संसक्ति के सूत्र का काम करता है, और कभी उपराष्ट्रीयताओं के बीच हिंसक संघर्ष और प्रतियोगिता में फँस जाता है।

पश्चिमी राष्ट्रवाद के प्रशंसक पूर्वी राष्ट्रवाद के कई कुछ पहलुओं को तर्कबुद्धि से परे बता कर उसके महत्त्व को ख़ारिज करते हैं। लेकिन कुछ विद्वानों ने ध्यान दिलाया है कि इस तरह के तत्त्व पश्चिमी राष्ट्रवाद में भी निर्णायक रूप से मौजूद हैं। मसलन, अगर भारतीय राष्ट्रवादी किसी ज़माने में काली देवी की आराधना करके प्रेरणा प्राप्त करते थे, तो युरोप के रोमानी राष्ट्रवादी भी इसी प्रकार के सामूहिकतावादी, हिंसक और आध्यात्मिक आयामों से प्रेरित होते रहे हैं। पश्चिम के राष्ट्रवाद को उदार, समझदार और सार्वदेशिक साबित करना एक व्याख्यात्मक आदर्श की उपलब्धि तो करा सकता है, पर व्यावहारिक रूप से ऐसा नहीं है।  पश्चिमी राष्ट्रवाद हो या पूर्वी राष्ट्रवाद, दोनों ही परिस्थितियों में सांस्कृतिक और राजनीतिक राष्ट्रवाद एक-दूसरे से प्रतियोगिता करते हुए एक-दूसरे को पुष्ट करते चलते हैं।

भूमण्डलीकरण की प्रक्रिया ने राष्ट्रवाद को ज़बरदस्त चुनौती दी है। बीसवीं सदी के आख़िरी दो दशकों और इक्कीसवीं सदी के पहले दशक के बाद कहा जा सकता है कि कम से कम दुनिया का प्रभु वर्ग एक सी भाषा बोलता है, एक सी यात्राएँ करता है, एक सा ख़ाना खाता है। उसके लिए राष्ट्रीय सीमाओं के कोई ख़ास मायने नहीं रह गये हैं। इसके अलावा आर्थिक भूमण्डलीकरण, बड़े पैमाने पर होने वाली लोगों की आवाजाही, इंटरनेट और मोबाइल फ़ोन जैसी प्रौद्योगिकीय प्रगति ने दुनिया में फ़ासलों को बहुत कम कर दिया है। ऐसे लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है जो अपने देश और सांस्कृतिक माहौल से दूर काम और जीवन की सार्थकता की तलाश में जाना चाहते हैं। युरोप की धरती ने राष्ट्रवाद को जन्म दिया था, और वहीं अब युरोपीय संघ का उदय राष्ट्रवाद का महत्त्व कम कर रहा है। इस नयी परिस्थिति में कुछ विद्वान कहने लगे हैं कि जिन ताकतों ने कभी राष्ट्रवाद को मज़बूत किया था, वे ही उसके पतन का कारण बनने वाली हैं। राष्ट्रीय संरचनाओं के बजाय राष्ट्रों से परे जाने वाले आर्थिक और राजनीतिक गठजोड़ आने वाली सदियों पर हावी रहेंगे।

इन दावों में सच्चाई तो है, लेकिन केवल आंशिक किस्म की। एक राजनीतिक ताकत के रूप में राष्ट्रवाद आज भी निर्णायक बना हुआ है। पूर्व में चल रहे सांस्कृतिक पुनरुत्थानवादी आंदोलन, दुनिया भर में हो रही नस्ल और आव्रजन संबंधी बहस और पश्चिम का बीपीओ (बिजनेस प्रोसेस आउटसोॄसग) संबंधी विवाद इसका प्रमाण है। आज भी फ़िलिस्तीनियों द्वारा राष्ट्रीय आत्म-निर्णय का आंदोलन जारी है। ईस्ट तिमूर इण्डोनेशिया से हाल ही में आज़ाद हो कर अलग राष्ट्र बना है।

भूमण्डलीकरण की प्रक्रिया ने राष्ट्रवाद के बोलबाले को कुछ संदिग्ध अवश्य कर दिया है, पर इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि उदारतावादी और लोकतांत्रिक राज्य से गठजोड़ करके ग़रीबी और पिछड़ेपन के शिकार समाजों को आगे ले जाने में राष्ट्रवाद की ऐतिहासिक भूमिका को नकारा नहीं जा सकता। सभी उत्तर-औपनिवेशिक समाजों ने अपने वैकासिक लक्ष्यों को वेधने के लिए राष्ट्रवाद का सहारा लिया है। ख़ास तौर से भारत जैसे बहुलतामूलक समाजों को एक राजनीतिक समुदाय में विकसित करने में राष्ट्रवाद एक प्रमुख कारक रहा है।

संदर्भ[संपादित करें]

1. ई.जे. हॉब्सबॉम (1089), नेशंस ऐंड नैशनलिज़म सिंस 1789, केम्ब्रिज युनिवर्सिटी प्रेस, केम्ब्रिज.

2. एस. सेठ (1995), मार्क्सिस्ट थियरी ऐंड नैशनलिस्ट पॉलिटिक्स, सेज, नयी दिल्ली.

3. ए. स्मिथ (1994), नैशनलिज़म : अ रीडर, खण्ड 1, ऑक्सफ़र्ड युनिवर्सिटी प्रेस, ऑक्सफ़र्ड.

4. सुनलिनी कुमार (2008), ‘नैशनलिज़म’, राजीव भार्गव और अशोक आचार्य (सम्पा.), पॉलिटिकल थियरी : ऐन इंट्रोडक्शन, पियर्सन लोंगमेन, नयी दिल्ली.

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]