भ्रष्टाचार (आचरण)

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सार्वजनिक जीवन में स्वीकृत मूल्यों के विरुद्ध आचरण को भ्रष्ट आचरण समझा जाता है। आम जन जीवन में इसे आर्थिक अपराधों से जोड़ा जाता है।

भ्रष्टाचार की हानियाँ[संपादित करें]

  • भ्रष्टाचार, विकास व सुशासन का शत्रु है।
  • भ्रष्टाचार गरीबों के हक को छीनता है, संसाधन आवंटन को विकृत करता है, लोगों के विश्वास को खत्म करता है और नियमों की अनदेखी करता है।
  • भ्रष्टाचार से लोगों के मन में निराशा जन्म लेती है। उनकी काम करने की उर्जा मारी जाती है।
  • भ्रष्टाचार के कारण लोग नये कार्य हाथ में लेने से डरते हैं जिससे नवाचार के मार्ग में बाधा आती है।
  • भ्रष्टाचार के कारण देश की सुरक्षा खतरे में पड़ जाती है। इससे आतंकवाद, अराजकता और जंगलराज की स्थिति निर्मित होती है।
  • बहुत सी महान सभ्यताओं के पतन का मुख्य कारण भ्रष्टाचार ही रहा है।
  • निकम्मी, अयोग्य तथा भ्रष्ट सरकारें जनता को योजनापूर्वक भ्रष्ट बनाकर अपना शासन बचाये रख पाती हैं। इसे 'भ्रष्ट बनाओ और राज करो' की नीति कहते हैं।

विभिन्न प्रकार के भ्रष्टाचार[संपादित करें]

  • घूस (रिश्वत)
  • चुनाव में धांधली
  • सेक्स के बदले पक्षपात
  • हफ्ता वसूली
  • जबरन चन्दा लेना
  • अपने विरोधियों को दबाने के लिये सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग
  • न्यायाधीशों द्वारा गलत या पक्षपातपूर्ण निर्णय
  • विविध : वंशवाद, ब्लैकमेल करना, टैक्स चोरी, झूठी गवाही, झूठा मुकदमा, परीक्षा में नकल, परीक्षाथी का गलत मूल्यांकन - सही उत्तर पर अंक न देना और गलत/अलिखित उत्तरों पर भी अंक दे देना, पैसे लेकर संसद में प्रश्न पूछना, पैसे लेकर वोट देना, वोट के लिये पैसा और शराब आदि बाँटना, पैसे लेकर रिपोर्ट छापना, विभिन्न पुरस्कारों के लिये चयनित लोगों में पक्षपात करना, आदि।

परिचय[संपादित करें]

आम तौर पर सरकारी सत्ता और संसाधनों के निजी फ़ायदे के लिए किये जाने वाले बेजा इस्तेमाल को भ्रष्टाचार की संज्ञा दी जाती है। एक दूसरी और अधिक व्यापक परिभाषा यह है कि निजी या सार्वजनिक जीवन के किसी भी स्थापित और स्वीकार्य मानक का चोरी-छिपे उल्लंघन भ्रष्टाचार है। लेकिन भ्रष्टाचार की परिभाषा इतनी सीधी, सरल और एकांगी नहीं है। सरकारी दायरा निजी जीवन, सामाजिक-सामुदायिक प्रक्रियाओं और उद्योग-व्यापार जगत के साथ घुला-मिला रहता है जिसके कारण यह परिभाषा नाकाफ़ी हो जाती है। स्थापित और स्वीकार्य समझे जाने वाले मानकों पर प्रश्न-चिह्न लगते रहते हैं। यह पूछा जाता रहता है कि क्या केवल रिश्वत लेना या अवैध कमीशन ख़ाना ही भ्रष्टाचार है, जातिगत, नस्लगत, लैंगिक और सेक्शुअल भेदभाव करना भ्रष्टाचार की श्रेणी में नहीं आता? विभिन्न मानकों और देशकाल के हिसाब से भी इसमें तब्दीलियाँ होती रहती हैं। मसलन, भारत में रक्षा सौदों में कमीशन ख़ाना अवैध है इसलिए इसे भ्रष्टाचार और राष्ट्र- विरोधी कृत्य मान कर घोटाले की संज्ञा दी जाती है। लेकिन दुनिया के कई विकसित देशों में यह एक जायज़ व्यापारिक कार्रवाई है। संस्कृतियों के बीच अंतर ने भी भ्रष्टाचार के प्रश्न को पेचीदा बनाया है। उन्नीसवीं सदी के दौरान भारत पर औपनिवेशिक शासन थोपने वाले अंग्रेज़ अपनी विक्टोरियाई नैतिकता के आईने में भारतीय यौन-व्यवहार को दुराचरण के रूप में देखते थे। जबकि बीसवीं सदी के उत्तरार्ध का भारत किसी भी युरोपवासी की निगाह में यौनिक-शुद्धतावाद का शिकार माना जा सकता है।

भ्रष्टाचार का मुद्दा एक ऐसा राजनीतिक प्रश्न है जिसके कारण कई बार न केवल सरकारें बदल जाती हैं। बल्कि यह बहुत बड़े-बड़े ऐतिहासिक परिवर्तनों का वाहक भी रहा है। रोमन कैथलिक चर्च द्वारा अनुग्रह के बदले शुल्क लेने की प्रथा को मार्टिन लूथर द्वारा भ्रष्टाचार की संज्ञा दी गयी थी। इसके ख़िलाफ़ किये गये धार्मिक संघर्ष से ईसाई धर्म- सुधार निकले। परिणामस्वरूप प्रोटेस्टेंट मत का जन्म हुआ। इस ऐतिहासिक परिवर्तन से सेकुलरवाद के सूत्रीकरण का आधार तैयार हुआ।

समाज-वैज्ञानिक विमर्श में भ्रष्टाचार से संबंधित समझ के बारे में कोई एकता नहीं है। पूँजीवाद विरोधी नज़रिया रखने वाले विद्वानों की मान्यता है कि बाज़ार आधारित व्यवस्थाएँ ‘ग्रीड इज़ गुड’ के उसूल पर चलती हैं, इसलिए उनके तहत भ्रष्टाचार में बढ़ोतरी होनी लाज़मी है। दूसरी तरफ़  खुले समाज की वकालत करने वाले और मार्क्सवाद विरोधी बुद्धिजीवी सर्वहारा की तानाशाही वाली व्यवस्थाओं में कम्युनिस्ट पार्टी के अधिकारियों द्वारा बड़े पैमाने पर राज्य के संसाधनों के दुरुपयोग और आम जनता के साधारण जीवन की कीमत पर ख़ुद के लिए आरामतलब ज़िंदगी की गारंटी करने की तरफ़ इशारा करते हैं। भ्रष्टाचार की दूसरी समझ राज्य की संस्था द्वारा लोगों की आर्थिक गतिविधियों में हस्तक्षेप की मात्रा और दायरे पर निर्भर करती है। बहुत अधिक टैक्स वसूलने वाले निज़ाम के तहत कर-चोरी को सामाजिक जीवन की एक मजबूरी की तरह लिया जाता है। इससे एक सिद्धांत यह निकलता है कि जितने कम कानून और नियंत्रण  होंगे, भ्रष्टाचार की ज़रूरत उतनी ही कम होगी। इस दृष्टिकोण के पक्ष पूर्व सोवियत संघ और चीन समते समाजवादी देशों का उदाहरण दिया जाता है जहाँ राज्य की संस्था के सर्वव्यापी होने के बावजूद बहुत बड़ी मात्रा में भ्रष्टाचार की मौजूदगी रहती है।  ‘ज़्यादा नियंत्रण- ज़्यादा भ्रष्टाचार’ के समीकरण को सही ठहराने के लिए तीस के दशक के अमेरिका में की गयी शराब-बंदी का उदाहरण भी दिया जाता है जिसके कारण संगठित और आर्थिक भ्रष्टाचार में अभूतपूर्व उछाल आ गया था।

साठ  और सत्तर के दशक में कुछ विद्वानों ने अविकिसित देशों के आर्थिक विकास के लिए एक सीमा तक भ्रष्टाचार और काले धन की मौजूदगी को उचित करार दिया था। अर्नोल्ड जे. हीदनहाइमर जैसे सिद्धांतकारों का कहना था कि परम्पराबद्ध और सामाजिक रूप से स्थिर समाजों को भ्रष्टाचार की समस्या का कम ही सामना करना पड़ता है। लेकिन तेज़ रक्रतार से होने वाले उद्योगीकरण और आबादी की आवाज़ाही के कारण समाज स्थापित मानकों और मूल्यों को छोड़ते चले जाते हैं। परिणामस्वरूप बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार की परिघटना पैदा होती है। सत्तर के दशक में हीदनहाइमर की यह सिद्धांत ख़ासा प्रचलित था। भ्रष्टाचार विरोधी नीतियों और कार्यक्रमों की वकालत करने के बजाय हीदनहाइमर ने निष्कर्ष निकाला था कि जैसे-जैसे समाज में समृद्धि बढ़ती जाएगी, मध्यवर्ग की प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी और शहरी सभ्यता व जीवन-शैली का विकास होगा, इस समस्या पर अपने आप काबू होता चला जाएगा। लेकिन सत्तर के दशक में ही युरोप और अमेरिका में बड़े-बड़े राजनीतिक और आर्थिक घोटालों का पर्दाफ़ाश  हुआ। इनमें अमेरिका का वाटरगेट स्केंडल और ब्रिटेन का पौलसन एफ़ेयर प्रमुख था। इन घोटालों ने मध्यवर्गीय नागरिक गुणों के विकास में यकीन रखने वाले हीदनहाइमर के इस सिद्धांत के अतिआशावाद की हवा निकाल दी।

साठ के दशक के दौरान ही कुछ अन्य विद्वानों ने भी हीदनहाइमर की तर्ज़ पर तर्क दिया था कि भ्रष्टाचार की समस्या की नैतिक व्याख्याएँ करने से कुछ हासिल होने वाला नहीं है। इनमें सेमुअल हंटिंग्टन प्रमुख थे। इन समाज-वैज्ञानिकों की मान्यता थी कि भ्रष्टाचार हर परिस्थिति में नुकसानदेह नहीं होता। विकासशील देशों में वह मशीन में तेल की भूमिका निभाता है और लोगों के हाथ में ख़र्च करने लायक पैसा आने से उपभोक्ता क्रांति को गति मिलती है। लेकिन अफ़्रीका में भ्रष्टाचार के ऊपर विश्व बैंक द्वारा 1969 में जारी रपट ने इस धारणा को धक्का पहुँचाया। इस रपट के बाद भ्रष्टाचार को एक अनिवार्य बुराई और आर्थिक विकास में बाधक के तौर पर देखा जाने लगा। विश्व बैंक भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ मुहिम चलाने में जुट गया। इस विमर्श का एक परिणाम यह भी निकला कि समाज-वैज्ञानिक अपेक्षाकृत कम विकसित देशों में भ्रष्टाचार की समस्या के प्रति ज़्यादा दिलचस्पी दिखाने लगे। विकसित देशों में भ्रष्टाचार की समस्या काफ़ी-कुछ नज़रअंदाज़ की जाने लगी।

यह दृष्टिकोण भूमण्डलीकरण के दौर में और प्रबल हुआ। उधार देने वाली अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं, उन पर हावी विकसित देशों और बड़े-बड़े कॉरपोरेशनों ने यह गारंटी करने की कोशिश की कि उनके द्वारा दी जाने वाली मदद का सही-सही इस्तेमाल हो। इसका परिणाम 1993 में ट्रांसपेरेंसी इंटरनैशनल की स्थापना में निकला जिसमें विश्व बैंक के कई पूर्व अधिकारी सक्रिय थे। इसके बाद सर्वेक्षण और आँकड़ों के ज़रिये भ्रष्टाचार का तुलनात्मक अध्ययन शुरू हो गया। लेकिन इन प्रयासों के परिणाम किसी भी तरह से संतोषजनक नहीं माने जा सकते। 2007 में डेनियल ट्रीज़मैन ने ‘व्हाट हैव वी लर्न्ड अबाउट द काज़िज़ ऑफ़ करप्शन फ़्रॉम टेन इयर्स ऑफ़ क्रॉस नैशनल इम्पिरिकल रिसर्च?’ लिख कर नतीजा निकला है कि परिपक्व उदारतावादी लोकतंत्र और बाज़ारोन्मुख समाज अपेक्षाकृत कम भ्रष्ट हैं। उनके उलट तेल निर्यात करने वाले देश, अधिक नियंत्रणकारी कानून बनाने वाले और मुद्रास्फीति को काबू में न करने वाले देश कहीं अधिक भ्रष्ट हैं।

ज़ाहिर है कि ये निष्कर्ष किसी भी कोण से नये नहीं हैं। हाल ही में जिन देशों में आर्थिक घोटालों का पर्दाफ़ाश हुआ है उनमें छोटे-बड़े और विकसित-अविकसित यानी हर तरह के देश (चीन, जापान, स्पेन, मैक्सिको, भारत, चीन, ब्रिटेन, ब्राज़ील, सूरीनाम, दक्षिण  कोरिया, वेनेज़ुएला, पाकिस्तान, एंटीगा, बरमूडा, क्रोएशिया, इक्वेडोर, चेक गणराज्य, वग़ैरह)  हैं। भ्रष्टाचार को सुविधाजनक और हानिकारक मानने के इन परस्पर विरोधी नज़रियों से परे हट कर अगर देखा जाए तो अभी तक आर्थिक वृद्धि के साथ उसके किसी सीधे संबंध का सूत्रीकरण नहीं हो पाया है। उदाहरणार्थ, एशिया के दो देशों, दक्षिण  कोरिया और फ़िलीपींस, में भ्रष्टाचार के सूचकांक बहुत ऊँचे हैं। लेकिन, कोरिया में आर्थिक वृद्धि की दर ख़ासी है, जबकि फ़िलीपींस में नीची।

भ्रष्टाचार की समस्या से निबटने के लिए आम तौर पर जिन उपायों की तजवीज़ की जाती है, उन्हें इस तरह देखा जा सकता है : भ्रष्टाचार विरोधी कड़े कानून बनाने और संस्थागत उपाय (जैसे, भारत में लोकपाल और लोकायुक्त बनाने के लिए चलाई जाने वाली मुहिम, अमेरिका में फ़ॉरेन करप्ट प्रेक्टिसिस एक्ट बना कर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर रिश्वतखोरी को ग़ैरकानूनी करार देना, हांगकांग में इंडिपेंडेंट कमीशन अगेंस्ट करप्शन), अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भ्रष्टाचार विरोधी नियम-कानून और संस्थाओं का निर्माण, ट्रांसपेरेंसी इंटरनैशनल जैसी ग़ैर-सरकारी संस्थाओं द्वारा चलाई जाने वाली मुहिमें, एकाउंटिंग विधियों में सुधार, सरकारी ठेके देने आबंटित करने की प्रक्रियाओं को उत्तरोत्तर पारदर्शी बनाना, संगठित अपराध का मुकाबला करने के लिए राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बेहतर प्रयास, अधिकारियों को बेहतर वेतन देना ताकि उन्हें भ्रष्टाचार करने की ज़रूरत ही महसूस हो, नियंत्रणकारी कानूनों को कम से कम करते चले जाना और बाज़ार को हर सम्भव तरीके से खोलना, कानून लागू करने वाले और प्रवर्तनकारी अधिकारियों को बेहतर प्रशिक्षण देना, अधिकारियों के नैतिक और नीतिगत संस्कारों को स्पर्श देना, मानहानि और अन्य प्रेस संबंधी कानूनों को सुधारना ताकि पत्रकार भ्रष्टाचार का ज़्यादा से ज़्यादा पर्दाफ़ाश कर सकें, भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ उचित कदम न उठा पाने वाली सरकारों को आर्थिक सहायता रोक देने की धमकी देना और काले धन के अंतर्राष्ट्रीय लेन-देन और हवाला इत्यादि पर रोक लगाने के उपाय। इनके अलावा राजनीतिक दलों के संचालन और चुनाव लड़ने के लिए वैध कोष  और अनुदान की व्यवस्था करने को भी एक महत्त्वपूर्ण उपाय की तरह चिह्नित किया गया है ताकि अवैध स्रोतों से धन उगाहने की प्रवृत्ति को हतोत्साहित किया जा सके।

संदर्भ[संपादित करें]

1. प्रणव वर्धन (1997), ‘करप्शन ऐंड डिवेलपमेंट : अ रिव्यू ऑफ़ इशूज़’, जरनल ऑफ़ इकॉनॉमिक लिटरेचर 35 .

2. एम. रोबिंसन (सम्पा.) (1998), करप्शन ऐंड डिवेलपमेंट, फ्रैंक कैस, एबिंग्डन, यूके.

3. ए.जे. हीदनहाइमर (सम्पा.) (1970), पॉलिटिकल करप्शन : रीडिंग्ज़ इन कम्परेटिव एनालैसिस, ट्रांज़ेक्शन, न्यू ब्रंसविक, एनजे.

4. माइकल जांस्टन (2005), सिड्रॉम्स ऑफ़ करप्शन : वेल्थ, पॉवर, ऐंड डेमोक्रैसी, केम्ब्रिज युनिवर्सिटी प्रेस, केम्ब्रिज.

5. डैनियल ट्रीज़मान (2007), ‘व्हाट हैव वी लर्न्ड अबाउट द काज़िज़ ऑफ़ करप्शन फ़्रॉम टेन इयर्स ऑफ़ क्रॉस-नैशनल इम्पिरिकल रिसर्च?’, एनुअल रिव्यू ऑफ़ पॉलिटिकल साइंस 10 .

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

वाह्य सूत्र[संपादित करें]