बिजनौर

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बिजनौर
—  शहर  —
समय मंडल: आईएसटी (यूटीसी+५:३०)
देश Flag of India.svg भारत
राज्य उत्तर प्रदेश
ज़िला बिजनौर
महापौर
सांसद
जनसंख्या
घनत्व
७९,३६८ (२००१ के अनुसार )
क्षेत्रफल
ऊँचाई (AMSL)
६५६१ कि.मी²
• २२५ मीटर

Erioll world.svgनिर्देशांक: 29°22′N 78°08′E / 29.37, 78.13

बिजनौर भारत के उत्तर प्रदेश का एक प्रमुख शहर एवं लोकसभा क्षेत्र है। हिमालय की उपत्यका मे स्थित बिजनौर को जहाँ एक ओर महाराजा दुष्यन्त, परमप्रतापी सम्राट भरत, परमसंत ऋषि कण्व और महात्मा विदुर की कर्मभूमि होने का गौरव प्राप्त है, वहीं आर्य जगत के प्रकाश स्तंभ स्वामी श्रद्धानन्द, अंतर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त वैज्ञानिक डॉ. आत्माराम, भारत के प्रथम इंजीनियर राजा ज्वालाप्रसाद आदि की जन्मभूमि होने का सौभाग्य भी प्राप्त है।

साहित्य के क्षेत्र में जनपद ने कई महत्त्वपूर्ण मानदंड स्थापित किए हैं। कालिदास का जन्म भले ही कहीं और हुआ हो, किंतु उन्होंने इस जनपद में बहने वाली मालिनी नदी को अपने प्रसिद्ध नाटक 'अभिज्ञान शाकुन्तलम्' का आधार बनाया। अकबर के नवरत्नों में अबुल फ़जल और फैज़ी का पालन-पोषण बास्टा के पास हुआ। उर्दू साहित्य में भी जनपद बिजनौर का गौरवशाली स्थान रहा है। क़ायम चाँदपुरी को मिर्ज़ा ग़ालिब ने भी उस्ताद शायरों में शामिल किया है। नूर बिजनौरी जैसे विश्वप्रसिद्ध शायर इसी मिट्टी से पैदा हुए। महारानी विक्टोरिया के उस्ताद नवाब शाहमत अली भी मंडावर के निवासी थे, जिन्होंने महारानी को फ़ारसी की तालीम दी। संपादकाचार्य पं. रुद्रदत्त शर्मा, बिहारी सतसई की तुलनात्मक समीक्षा लिखने वाले पं. पद्मसिंह शर्मा और हिंदी-ग़ज़लों के शहंशाह दुष्यंत कुमार भी बिजनौर की धरती की देन हैं।

इतिहास[संपादित करें]

बिजनौर जनपद के प्राचीन इतिहास को स्पष्ट करने के लिए प्रमाणों का अभाव है। बुद्धकालीन भारत में भी चीनी यात्री ह्वेनसांग ने छह महीने मतिपुरा (मंडावर) में व्यतीत किए। हर्षवर्धन के बाद राजपूत राजाओं ने इस पर अपना अधिकार किया। पृथ्वीराज और जयचंद की पराजय के बाद भारत में तुर्क साम्राज्य की स्थापना हुई। उस समय यह क्षेत्र दिल्ली सल्तनत का एक हिस्सा रहा। तब इसका नाम 'कटेहर क्षेत्र' था। कहा जाता है कि सुल्तान इल्तुतमिश स्वयं साम्राज्य-विरोधियों को दंडित करने के लिए यहाँ आया था। मंडावर में उसके द्वारा बनाई गई मस्ज़िद आज तक भी है। औरंगजेब के शासनकाल में जनपद पर अफ़गानों का अधिकार था। ये अफ़गानिस्तान के 'रोह' कस्बे से संबंधित थे अत: ये अफ़गान रोहेले कहलाए और उनका शासित क्षेत्र रुहेलखंड कहलाया। नजीबुद्दौला प्रसिद्ध रोहेला शासक था, जिसने 'पत्थरगढ़ का किला' को अपनी राजधानी बनाया। बाद में इसके आसपास की आबादी इसी शासक के नाम पर नजीबाबाद कहलाई। रोहेलों से यह क्षेत्र अवध के नवाब के पास आया, जिसे सन् 1801 में ईस्ट इंडिया कंपनी ने ले लिया। आज़ादी की प्रथम लड़ाई में जनपद ने अविस्मरणीय योग दिया। आज़ादी की लड़ाई के समय सर सैय्यद अहमद खाँ यहीं पर कार्यरत थे। उनकी प्रसिद्ध पुस्तक 'तारीक सरकशी-ए-बिजनौर' उस समय के इतिहास पर लिखा गया महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ है। प्रसिद्ध क्रांतिकारियों चंद्रशेखर आज़ाद, पं. रामप्रसाद बिस्मिल, अशफ़ाक़ उल्लाह खाँ, रोशनसिंह ने पैजनिया में शरण लेकर बि्रटिश सरकार की आँखों में धूल झोकी। कांग्रेस द्वारा लड़ी गई आज़ादी की लड़ाई में भी जनपद का महत्त्वपूर्ण योगदान है। युवा शायर निखिल कुमार राजपूत जी की प्रथम ग़ज़ल भी इसी भूमि की देन है !

भूगोल तथा जलवायु[संपादित करें]

बिजनौर का भौगोलिक क्षेत्रफल ६५६१ वर्ग कि.मी. है। उत्तर से दक्षिण इसकी लंबाई लगभग ९९.२ किलोमीटर तथा पूर्व से पश्चिम चौड़ाई ८९.६ किलोमीटर है। संपूर्ण जिला ११ तहसीलों में बँटा हुआ है- नजीबाबाद, किरतपुर, मोहम्मद पुरदेवमल, हल्दौर, जलीलपुर, नेहतपुर, धामपुर, अफ़जलगढ़, कोतवाली, स्योहारा और नूरपुरगंगा, रवासन, पीली, छोइया, मालन, गाँगन, बान, ईकड़ा-कडूला, रामगंगा, खो, पनीली, धारा, फीका, पाँधोई आदि नदियाँ हैं। उत्तर में शिवालिक पहाडि़याँ हैं, जिन्हें चंडी की पहाडि़याँ नाम से भी अभिहित किया जाता है। यह पहाड़ी क्षेत्र २९१ वर्ग कि.मी. अब हरिद्वार जनपद में है। बिजनौर को भौगोलिक आधार पर ५ भागों में बाँटा जा सकता है-

  • पर्वतीय भाग : उत्तरी भाग पहाड़ी है तथा भूमि पथरीली है।
  • तराई का भाग : पर्वतीय भाग के दक्षिण में पूर्व से पश्चिम तक फैला हुआ वन- भाग तराई के नाम से जाना जाता है। यह पहाड़ की तलहटी भी कहलाता है।
  • खादर का भाग : गंगा तथा रामगंगा आदि बड़ी-बड़ी नदियों का तटीय भाग 'खादर' कहलाता है। यह आर्द्र भाग है।
  • बाँगर भाग : यह जनपद का चौरस या खुला मैदानी भाग है, इसे बाँगर भी कहते हैं। इसमें गेंहूँ, चावल, गन्ना, कपास की अच्छी खेती होती है।
  • भूड़ भाग : जनपद का दक्षिणी भाग रेतीला है। इसमें भूड़ और सवाई भूड़ दो प्रकार की मिट्टी पाई जाती है।

जलवायु यहाँ की जलवायु मानसूनी और स्वास्थ्यप्रद है। वर्षा, शीत तथा ग्रीष्म तीन ऋतुएँ होती हैं।

यातायात और परिवहन[संपादित करें]

गंगा नदी के समीप स्थित बिजनौर सड़क और रेलमार्गों से जुड़ा हुआ है।

कृषि और खनिज[संपादित करें]

बिजनौर में कृषि प्रमुख है। यहाँ पर रबी, ख़रीफ़, ज़ायद आदि की प्रमुख फ़सलें होती हैं, जिनमें गन्ना, गेहूँ, चावल, मूँगफली की मुख्य उपज होती हैं।

संस्कृति[संपादित करें]

बिजनौर जनपद में हिंदू, इस्लाम, ईसाई, जैन, बौद्ध, सिक्ख आदि धर्मावलंबी रहते हैं। हिंदुओं में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र अनेक जाति-उपजातियाँ हैं। प्रमुख रूप से भुइयार (हिन्दु जुलाहा),ब्राह्मण, जाट, गुर्जर, अहीर, त्यागी, चौहान, बनिया (वैश्य), चमार, कायस्थ, खत्री आदि उपजातियाँ हैं। कार्य एवं व्यवसाय के आधार पर भी अनेक उपजातियों का अस्तित्व स्वीकार किया गया है। भुइयार (हिन्दु जुलाहा),बढ़ई, कुम्हार, लुहार, सुनार, रंगरेज (छीपी), तेली, गडरिया, धींवर, नाई, धोबी, माली, बागवान, भड़भूजा, खुमरा, धुना, सिंगाडि़या, कंजर, मनिहार आदि प्रमुख हैं। मुसलमानों में शेख, सैयद, मुग़ल, पठान, अंसारी, सक्का, रांघड़, कज्जाड़ आदि उपजातियाँ हैं। सिक्खों व जैनियों में भी इसी प्रकार की उपजातियाँ हैं। भारत-विभाजन से अनेक पंजाबी, पाकिस्तानी और बंगाली भी यहाँ आ बसे हैं। संपूर्ण क्षेत्र में हिंदू तथा मुसलमानों का बाहुल्य है। यहाँ की भाषा हिन्दी है किंतु बोलचाल में हिन्दी की अनेक बोलियों के शब्द मिलते हैं।

प्रसिद्ध व्यक्ति - बिजनौर जनपद का साहित्यिक इतिहास बहुत संपन्न है। साहित्य के क्षेत्र में जनपद को मान्यता प्रदान करने में जिन साहित्यकारों ने मुख्य भूमिका निभाई है, उनमें प्रमुख हैं संपादकाचार्य पं. रुद्रदत्त शर्मा, समीक्षक एवं संस्मरण लेखक पं. पद्मसिंह शर्मा, ग़ज़लकार दुष्यंत कुमार, कुर्रत उल ऐन हैदर, निश्तर ख़ानक़ाही, रामगोपाल विद्यालंकार, हरिदत्त शर्मा, फतहचंद शर्मा आराधक, पत्रकार बाबूसिंह चौहान, शायर चंद्रप्रकाश जौहर, व्यंग्यकार रवींद्रनाथ त्यागी, कथाकार एवं 00000पत्रकार डॉ. महावीर अधिकारी, डॉ. गिरिराजशरण अग्रवाल, इसके अतिरिक्त फ़िल्म निर्माता प्रकाश मेहरा, राजनीतिज्ञ चरन सिंह, अभिनेता विशाल भारद्वाज, फुटबॉल खिलाड़ी हरपाल सिंह और स्वतंत्रता सेनानी बख़्तखान रुहेला मुशी सिंह Dhali Aheer का जन्म भी बिजनौर में हुआ था।

शिक्षा संस्थान - प्रमुख स्कूल व इंटर कालेज हैं- मॉडर्न इरा पब्लिक स्कूल,ए.एन.इंटरनेशनल पब्लिक स्कूल, के.पी.एस. बालिका इंटर कॉलेज, गवर्नमेंट इंटर कॉलेज, बिजनौर इंटर कालेज, राजा ज्वाला प्रसाद आर्य इंटर कॉलेज और सेंट मेरी कॉन्वेंट। इसके अतिरिक्त दो स्नातकोत्तर महाविद्यालय वर्धमान कॉलेज और आर.बी.डी. स्नातकोत्तर कन्या विद्यालय, एक इंजीनियरिंग कॉलेज वीरा इंजीनियरिंग कॉलेज, एक फ़ारमेसी कॉलेज विवेक कॉलेज ऑफ़ टेकनिकल एजुकेशन, दो कानून विद्यालय विवेक कॉलेज ऑफ़ लॉ और कृष्णा कॉलेज ऑफ़ लॉ यहाँ की प्रमुख शिक्षा संस्थाएँ हैं।

अर्थ व्यवस्था[संपादित करें]

जिले में कृषि उद्योग प्रमुख उद्योग है। ३३ प्रतिशत जनसंख्या इसी में कार्यरत है। रबी, ख़रीफ़, ज़ायद आदि प्रमुख फ़सलें होती हैं, जिनमें गन्ना, गेहूँ, चावल, मूँगफली की मुख्य उपज हैं। २५ प्रतिशत खेतिहर मजदूर हैं। इस प्रकार ५८ प्रतिशत जनसंख्या कृषि उद्योग से संबंधित है। अन्य कर्मकार ३७ प्रतिशत तथा पारिवारिक उद्योग में ५ प्रतिशत हैं। जिले का उत्तरी क्षेत्र सघन वनों से आच्छादित होने के कारण काष्ठ उद्योग विकसित अवस्था में मिलता है। नजीबाबाद, नहटौर, माहेश्वरी, धामपुर आदि स्थानों पर काष्ठ मंडिया हैं। करघा उद्योग यहाँ का तीसरा महत्त्वपूर्ण ग्रामोद्योग है। हथकरघे से बुने हुए कपड़े नहटौर के बाज़ार में बिकते हैं। यहाँ के बने कपड़े अन्यत्र भी निर्यात किए जाते हैं। पशुओं की अधिकता के कारण चर्म उद्योग में भी बहुत से लोग लगे हुए हैं। चमड़े एवं उससे निर्मित वस्तुओं के क्रय-विक्रय से अनेक व्यक्ति जीविकोपार्जन करते हैं। बिजनौर क्षेत्र की ११४८ हेक्टेयर भूमि स्थायी चरागाह के लिए है। इसलिए पशुपालन-उद्योग विकसित अवस्था में है। इसके अतिरिक्त मिट्टी के बर्तन बनाने का उद्योग जिसे कुम्हारगीरी का व्यवसाय भी कहते हैं, यहाँ एक प्रचलित व्यवसाय है।। लगभग सभी ग्राम-नगरों में मिट्टी के बर्तन बनानेवाले रहते हैं। अनेक लोग तेल उद्योग में लगे हुए हैं। तेली उपजाति के व्यक्तियों के अतिरिक्त भी इस उद्योग को करनेवाले पाए जाते हैं। नगरों में एक्सपेलर तथा ग्रामों में परंपरागत तेल कोल्हू से तेल निकालने का कार्य किया जाता है। इसके अतिरिक्त बाग़वानी जिसमें माली, कुँजड़े और बाग़बान (सानी) आदि उपजातियों के लोग कार्यरत हैं तथा मत्स्योद्योग अर्थात मछली पकड़ने का कार्य-व्यवसाय करनेवाले हैं जिसमें धींवर तुरकिये आदि उपजातियों के लोग हैं। इन्हें मछियारा तथा माहेगीर भी कहते हैं। अन्य प्रमुख लघु उद्योग हैं- बढ़ईगीरी, लुहारगीरी, सुनारगीरी, रँगाई-छपाई, राजगीरी, मल्लाहगीरी, ठठेरे का व्यवसाय, वस्त्र सिलाई का काम, हलवाईगीरी, दुकानदारी, बाँस की लकड़ी से संबंधित उद्योग, गुड़-खाँडसारी उद्योग, बटाई, बुनाई का काम, वनौषधि-संग्रह आदि।

दर्शनीय स्थल[संपादित करें]

कण्व आश्रम बिजनौर जनपद में अनेक ऐसे ऐतिहासिक और सांस्कृतिक स्थल हैं जो इस जनपद की महत्ता को प्रतिपादित करते हैं। इनमें महत्त्वपूर्ण स्थल है 'कण्व आश्रम'। अर्वाचीन काल में यह क्षेत्र वनों से आच्छादित था। मालिनी और गंगा के संधिस्थल पर रावली के समीप कण्व मुनि का आश्रम था, जहाँ शिकार के लिए आए राजा दुष्यंत ने शकंुतला के साथ गांधर्व विवाह किया था। रावली के पास अब भी कण्व आश्रम के स्मृति-चिह्न शेष हैं।

विदुरकुटी महाभारत काल का एक प्रसिद्ध स्थल है 'विदुरकुटी'। ऐसी मान्यता है कि भगवान कृष्ण जब हस्तिनापुर में कौरवों को समझाने-बुझाने में असफल रहे थे तो वे कौरवों के छप्पन भोगों को ठुकराकर गंगा पार करके महात्मा विदुर के आश्रम में आए थे और उन्होंने यहाँ बथुए का साग खाया था। आज भी मंदिर के समीप बथुए का साग हर ऋतु में उपलब्ध हो जाता है।

दारानगर महाभारत का युद्ध आरंभ होनेवाला था, तभी कौरव और पांडवों के सेनापतियों ने महात्मा विदुर से प्रार्थना की कि वे उनकी पत्नियों और बच्चों को अपने आश्रम में शरण प्रदान करें। अपने आश्रम में स्थान के अभाव के कारण विदुर जी ने अपने आश्रम के निकट उन सबके लिए आवास की व्यवस्था की। आज यह स्थल 'दारानगर' के नाम से जाना जाता है। संभवत: महिलाओं की बस्ती होने के कारण इसका नाम दारानगर पड़ गया।

सेंदवार चाँदपुर के निकट स्थित गाँव 'सेंदवार' का संबंध भी महाभारतकाल से जोड़ा जाता है, जिसका अर्थ है सेना का द्वार। जनश्रुति है कि महाभारत के समय पांडवों ने अपनी छावनी यही बनाई थी। गाँव में इस समय भी द्रोणाचार्य का मंदिर विद्यमान है।

पारसनाथ का किला बढ़ापुर से लगभग चार किलोमीटर पूर्व में लगभग पच्चीस एकड़ क्षेत्र में 'पारसनाथ का किला' के खंडहर विद्यमान हैं। टीलों पर उगे वृक्षों और झाड़ों के बीच आज भी सुंदर नक़्क़ाशीदार शिलाएँ उपलब्ध होती हैं। इस स्थान को देखने से ऐसा प्रतीत होता है कि इसके चारों ओर द्वार रहे होंगे। चारो ओर बनी हुई खाई कुछ स्थानों पर अब भी दिखाई देती है।

आजमपुर की पाठशाला चाँदपुर के पास बास्टा से लगभग चार किलोमीटर दूर आजमपुर गाँव में अकबर के नवरत्नों में से दो अबुल फ़जल और फैज़ी का जन्म हुआ था। उन्होंने इसी गाँव की पाठशाला में शिक्षा प्राप्त की थी। अबुल फ़जल और फैज़ी की बुद्धिमत्ता के कारण लोग आज भी पाठशाला के भवन की मिट्टी को अपने साथ ले जाते हैं। ऐसा विश्वास है कि इस स्कूल की मिट्टी चाटने से मंदबुद्धि बालक भी बुद्धिमान हो जाते हैं।

मयूर ध्वज दुर्ग चीनी यात्री ह्वेनसांग के अनुसार जनपद में बौद्ध धर्म का भी प्रभाव था। इसका प्रमाण 'मयूर ध्वज दुर्ग' की खुदाई से मिला है। ये दुर्ग भगवान कृष्ण के समकालीन सम्राट मयूर ध्वज ने नजीबाबाद तहसील के अंतर्गत जाफरा गाँव के पास बनवाया था। गढ़वाल विश्वविद्यालय के पुरातत्त्व विभाग ने भी इस दुर्ग की खुदाई की थी।

संदर्भ[संपादित करें]

संदर्भ ग्रंथ[संपादित करें]

  1. बिजनौर गजेटियर, पृ. 179, वर्धमान पत्रिका 1995-96 में प्रकाशित डा. शिवसेवक अवस्थी का लेख।
  2. बिजनौर जनपद-ऐतिहासिक विवरण-डा. चंद्रपाल शर्मा 'मधु' का लेख।
  3. आगरा विश्वविद्यालय, शोध-पत्र जुलाई 1972, डॉ. बीना त्यागी।
  4. शोध-पत्र जनवरी 1973, डॉ. बीना त्यागी
  5. बिजनौर गजेटियर, पृ. 183
  6. डा. धीरेंद्र वर्मा, मध्यदेश, पृ. 16 प्रथम संस्करण
  7. वर्धमान पत्रिका, संपादक डा गिरिराजशरण अग्रवाल, 1975-76, पृ. 37
  8. बिजनौर जनपद-ऐतिहासिक विवरण, डा. चंद्रपाल शर्मा 'मधु' का लेख
  9. भारत का भाषा सर्वेक्षण भाग-9, सर जार्ज अब्राहम गि्रर्यसन, पृ. 145
  10. डा. धीरेंद्र वर्मा, हिंदी भाषा का इतिहास, 1949, पृ. 60
  11. डा. अंबाप्रसाद 'सुमन', हिंदी भाषा : अतीत और वर्तमान, पृ. 1
  12. डा. अंबाप्रसाद 'सुमन', हिंदी भाषा, पृ. 2
  13. हिंदी भाषा का उद्भव और विकास, पृ. 179
  14. वही, पृ. 28
  15. नागरी प्रचारिणी पत्रिका, भाग 18, सन् 1944, पृ. 283
  16. डा. धीरंेद्र वर्मा, हिंदी भाषा का इतिहास 1949, पृ. 60
  17. हिंदी शब्दानुशासन (सं. 2014, वि.), पृ. 15
  18. ग्रामीण हिंदी बोलियाँ (सन् 1966), पृ. 40-41
  19. छोटे-छोटे सवाल, श्री दुष्यंत कुमार, पृ. 15

बाह्य सूत्र[संपादित करें]