ज्वालामुखी

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तवुर्वुर का एक सक्रिय ज्वालामुखी फटते हुए, राबाउल, पापुआ न्यू गिनिया

ज्वालामुखी पृथ्वी की सतह पर उपस्थित ऐसी दरार या मुख होता है जिससे पृथ्वी के भीतर का गर्म लावा, गैस, राख आदि बाहर आते हैं।[1] वस्तुतः यह पृथ्वी की ऊपरी परत में एक विभंग (rupture) होता है जिसके द्वारा अन्दर के पदार्थ बाहर निकलते हैं। ज्वालामुखी द्वारा निःसृत इन पदार्थों के जमा हो जाने से निर्मित शंक्वाकार स्थलरूप को ज्वालामुखी पर्वत कहा जाता है।

ज्वालामुखी का संबंध प्लेट विवर्तनिकी से है क्योंकि यह पाया गया है कि बहुधा ये प्लेटों की सीमाओं के सहारे पाए जाते हैं क्योंकि प्लेट सीमाएँ पृथ्वी की ऊपरी परत में विभंग उत्पन्न होने हेतु कमजोर स्थल उपलब्ध करा देती हैं। इसके अलावा कुछ अन्य स्थलों पर भी ज्वालामुखी पाए जाते हैं जिनकी उत्पत्ति मैंटल प्लूम से मानी जाती है और ऐसे स्थलों को हॉटस्पॉट की संज्ञा दी जाती है।

भू-आकृति विज्ञान में ज्वालामुखी को आकस्मिक घटना के रूप में देखा जाता है और पृथ्वी की सतह पर परिवर्तन लाने वाले बलों में इसे रचनात्मक बल के रूप में वर्गीकृत किया जाता है क्योंकि इनसे कई स्थलरूपों का निर्माण होता है। वहीं, दूसरी ओर पर्यावरण भूगोल इनका अध्ययन एक प्राकृतिक आपदा के रूप में करता है क्योंकि इससे पारितंत्र और जान-माल का नुकसान होता है।

ज्वालामुखी के प्रकार[संपादित करें]

सक्रियता के आधार पर[संपादित करें]

सक्रिय या जाग्रत ज्वालामुखी[संपादित करें]

भूवैज्ञानिकों में सक्रियता को लेकर मतैक्य नहीं है लेकिन अगर कोई ज्वालामुखी वर्तमान में फट रहा हो, या उसके जल्द ही फटने की आशंका हो, या फिर उसमें गैस रिसने, धुआँ या लावा उगलने, या भूकम्प आने जैसे सक्रियता के चिह्न हों तो उसे सक्रिय माना जाता है।

मृत ज्वालामुखी[संपादित करें]

यह वे ज्वालामुखी होते हैं जिनके बारे में वैज्ञानिकों की अपेक्षा है कि वे फटेंगे नहीं। इनके बारे में यह अनुमान लगाया जाता है कि इनमें अन्दर लावा व माग्मा ख़त्म हो चुका है और अब इनमें उगलने की गरमी व सामग्री बची ही नहीं है। अगर किसी ज्वालामुखी के कभी भी विस्प्फोट होने या किसी भी अन्य प्रकार की सक्रियता की कोई भी घटना होने की स्मृति नहीं न हो तो अक्सर उसे मृत समझा जाता है।

प्रसुप्त या सुप्त ज्वालामुखी[संपादित करें]

वैज्ञानिकों में मृत (extinct) और सुप्त (dormant) ज्वालामुखियों में अंतर बता पाना कठिन है, लेकिन अगर मानवीय स्मृति में कोई ज्वालामुखी कभी भी इतिहास में बहुत पहले फटा हो तो उसे सुप्त ही माना जाता है लेकिन मृत नहीं। बहुत से ऐसे ज्वालामुखी हैं जिन्हें फटने के बाद एक औरे विस्फोट के लिये दबाव बनाने में लाखों साल गुज़र जाते हैं - इन्हें उस दौरान सुप्त माना जाता है। मसलन तोबा ज्वालामुखी, जिसके विस्फोट में आज से लगभग ७०,००० वर्ष पूर्व भारतीय उपमहाद्वीप के सभी मानव मर गये थे और पूरी मनुष्यजाति ही विलुप्ति की कगार पर आ पहुँची थी, हर ३,८०,००० वर्षों में पुनर्विस्फोट के लिये तौयार होता है।

उद्गार की प्रकृति के अनुसार[संपादित करें]

केन्द्रीय उद्भेदन वाले ज्वालामुखी[संपादित करें]

इस उद्गार में लावा के साथ अधिक मात्रा में गैस (प्रायः एक संकरी नली या छिद्र के सहारे) बाहर निकलती है। और लावा का जमाव शंकु की तरह तथा कभी-कभी गुम्बद या टीले के रूप में होता है।

अर्थात वे ज्वालामुखी जिनके विवर या मुख का व्यास कुछ 100 फीट से अधिक नहीं होता है और इसका आकार गोल या करीब-करीब गोल होता है। तथा जिनसे गैस लावा तथा विखण्डित पदार्थ अधिक मात्रा में विस्फोटक उद्भेदन के साथ आकार में काफी ऊंचाई तक प्रकट होते हैं। केन्द्रीय उद्गार वाले ज्वालामुखी कहलाते है। ये अत्यधिक विनाशकारी होते है। उद्गार से भयंकर भूकम्प आते हैं।

इन्हें विस्फोट की तीव्रता के आधार पर पुनः कई प्रकारों में वर्गीकृत किया जाता है[2]:

  • 1 हवायन या हवाई तुल्य
  • 2 स्ट्राम्बोलियन या स्ट्राम्बोली तुल्य
  • भूपदार्थ तीव्रता से बाहर आता है।
  • इसमें तरल लावा के साथ विखण्डित पदार्थ जैसे ज्वालामुखी बम उद्गार के समय निकलते है। जो अधिक ऊंचाई पर जाकर पुनः ज्वालामुखी क्रेटर में गिर पड़तेहै। जैसे-भूमध्य सागर में सिसली द्वीप के उत्तर में स्थिति लिपारी द्वीप के पास स्ट्रोम्बोली ज्वालामुखी में पाया जाता है।
  • 3 वल्कैनियन या वलकैनैनो तुल्य ज्वालामुखी
  • इस प्रकार के ज्वालामुखी प्रायः विस्फोट एवं भयंकर उद्गार के साथ होता है।
  • इससे विस्तृत लावा इतना चिपचिपा एवं लसदार होता है कि दो उद्गारों के बीच यह ज्वालामुखी छिद्र पर जमकर उसे ढक लेता है। इस तरह गैसों के मार्ग में अवरोध हो जाता है।
  • इसके बाद जब गैसें अधिक मात्रा में एकत्र हो जाती है तो ये गैंसे तीव्रता से इस अवरोधक को हटा देती है।
  • इससे ज्वालामुखी मेघी काफी दूरी तक छा जाते हैं और आकार फूलगोभी जैसा हो जाता है। जैसे-लिपारी द्वीप पर वलकैनो ज्वालामुखी
  • 4 विसुवियन
  • 5 प्लिनियन
  • 6 पीलियन या पीली तुल्य ज्वालामुखी
  • इस प्रकार के ज्वालामुखी सबसे अधिक विनाशकारी होते है तथा इनका उद्गार सर्वाधिक विस्फोटक तथा भयंकर होता है।
  • इससे निकला लावा सर्वाधिक चिपचिपा एवं लसदार होता है।
  • उद्गार के समय ज्वालामुखी नली में लावा की कठोर पट्टी जमा हो जाती है। जब अगला उद्गार होता है तब भयंकर गैसे इन्हें तीव्रता से तोड़कर आवाज करती हुई धरातल पर प्रकट होती है।
  • इसमें निस्तृत लावा एवं विखण्डित पदार्थ सर्वाधक होते हैं तथा प्रज्वलित गैसों के कारण ज्वालामुखी मेघ प्रकाशमान हो जाते है। जैसे-8 मई 1902 को मार्टिनिक द्वीप (द. अमेरिका) पर पीली ज्वालामुखी का भयंकर उद्भेदन हुआ था। इसलिए इसे पीलियन तुल्य ज्वालामुखी कहते है।
  • जावा एवं सुमात्रा के मध्य सुण्डा जलडमरू मध्य में 1883 में क्राकाटोआ में-इसमें पुराने शंकु का एक तिहाई भाग हवा में उड गया। भयंकर गैस एवं वाष्प के कारण 17 मील तक ऊंचाई तक बादल घिर गये थे। इसके विस्फोट के बाद (यानि 1 दिन बाद ही) ज्वालामुखी धूल एवं राख तथा वाष्प के बादल 50 मील (80 किमी) की ऊंचाई तक आकाश में पहुंच गया। और क्राक्राटोआ द्वीप की दो तिहाई भाग सागर में निमज्जित हो गया। और उद्गार की आवाज 3000 किमी दूर पूर्वी आस्ट्रेलिया तक सुनाई दी गई। और भूकम्प से 120 फीट ऊंचाई लहर उठी जिससे जावा एवं सुमात्रा के तटीय भागों में 36000 व्यक्ति मारे गये। इसी प्रकार 1911 में फिलीपाइन द्वीप में हिवक-हिवक का भयंकर उद्भेदन हुआ था।
  • 7 कैटामाइयन

दरारी उद्भेदन वाले ज्वालामुखी[संपादित करें]

इस प्रकार के उद्भेदन में लावा के साथ गैस की मात्रा कम होती है जिससे लावा दरारों में होकर ध्ररातल पर जमने लगता है। कभी-कभी अधिक मात्रा में लावा के जमा होने से मोटी परत बन जाती है जिसके फलस्वरूप लावा मैदान या लावा पठार बनते है। जैसे-1783 में आइसलैण्ड में एक 17 मील लम्बे दरार से होकर लावा का उदगार हुआ है। जिसका विस्तार 218 मील तक था। इसे आइसलैण्ड की जनसंख्या का 5वां भाग नष्ट हो गया। इस तरह के उदगार क्रिटैशियस युग में बड़े पैमाने पर हुए थे।

भारत में दक्कन का पठारी हिस्सा क्रीटेशस युग के एक दरारी उद्भेदन द्वारा निर्मित है और इस पर बेसाल्ट की चट्टानों के अपक्षय से काली रेगुर मिट्टी का निर्माण हुआ है।

ज्वालामुखी शंकु के अंग[संपादित करें]

एक मिश्रित ज्वालामुखी के विभिन्न भाग (ऊर्ध्वाधर पैमाना बढ़ाया गया है):
1. विशाल मैग्मा कोष्ठ
2. आधारशैल
3. नाली (पाइप)
4. आधार
5. सिल
6. भित्ति (डाइक)
7. ज्वालामुखी द्वारा उत्सर्जित राख की परतें
8. पार्श्व
9. ज्वालामुखी द्वारा उत्सर्जित लावा की परतें
10. गला
11. परजीवी शंकु
12. लावा प्रवाह
13. निकास
14. विवर (क्रेटर)
15. राख के बादल

जब निःसृत पदार्थ ज्वालामुखी छिद्र के चारों ओर जमा होने लगता है तो ज्वालामुखी शंकु का निर्माण होता है। जब अधिक जमा हो जाता है तब शंकु काफी बड़ा हो जाता है तथा पर्वत का रूप धारण कर लेता है। इसे ज्वालामुखी पर्वत कहते है। इस पर्वत के मध्य में जो छिद्र होता है उसे ज्वालामुखी छिद्र, मुख अथवा विवर कहते है। यह छिद्र नीचे से एक नली द्वारा जुड़ा रहता है जिसे ज्वालामुखी नली कहते है।

ज्वालामुखी निर्मित चट्टानें और स्थलरूप[संपादित करें]

प्लेट विवर्तनिकी और ज्वालामुखी[संपादित करें]

ज्वालामुखी और जलवायु परिवर्तन[संपादित करें]

हाल ही में एक शोध में यह पाया गया है कि छोटे-छोटे ज्वालामुखी विस्फोटों के द्वारा वर्तमान जलवायु परिवर्तन की गति धीमी हो सकती है।[3]

विश्व के कुछ प्रमुख ज्वालामुखी[संपादित करें]

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. माजिद हुसैन, ज्वालामुखी, संक्षिप्त भूगोल, गूगल पुस्तक, अभिगमन तिथि २४-११-२०१४
  2. माजिद हुसैन, ज्वालामुखी, संक्षिप्त भूगोल, गूगल पुस्तक, अभिगमन तिथि २४-११-२०१४
  3. छोटे ज्वालामुखी से जलवायु परिवर्तन धीमा, डायचे विले, अभिगमन तिथि २४-११-२०१४

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]