प्लेट विवर्तनिकी

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पृथ्वी के गर्भ का मैंटल भाग

प्लेट विवर्तनिकी में विवर्तनिकी (tectonicus) यूनानी शब्द (Greek: τεκτονικός) से बना है जिसका अर्थ 'निर्माण से सम्बंधित' है। प्लेट विवर्तनिकी एक वैज्ञानिक थ्योरी है जो पृथ्वी के स्थलमण्डल के बड़े पैमाने पर होने वाली गतियों की व्याख्या प्रस्तुत करता है। यह सिद्धान्त बीसवीं शताब्दी के प्रथम दशक में विकसित महाद्वीपीय विस्थापन (कान्टिनेन्टल ड्रिफ्ट) नामक संकल्पना से विकसित हुई है। इसके अनुसार सारी पृथ्वी कुछ भौगोलिक प्लेटों में बंटी हुई है। ये प्लेटें नीचे एस्थेनोस्फीयर की अर्धपिघलित परत पर "तैर" रहीं हैं। प्रायः भूकंप इन प्लेटों की सीमाओं पर ही आते हैं और ज्वालामुखी भी इन प्लेट सीमाओं के सहारे पाए जाते हैं।

प्रमुख योगदानकर्ता[संपादित करें]

  • जैक ओलिवर(Jack Oliver) (जन्म – 1923; मृत्यु-2011) अमेरिका के प्रमुख वैज्ञानिक थे। जिन्होंने कोलंबिया विश्वविद्यालय से पी॰एच॰डी॰ की उपाधि प्राप्त की। इन्होने भूकम्पों का गहन अध्ययन किया और प्लेट विवर्तनिकी सिंद्धांत कि पुष्टि के लिए भूकंपीय साक्ष्य उपलब्ध कराये।
  • विलियम जोसन मॉर्गन(William Jason Margon) (जन्म-1935;) अमेरिका के प्रमुख भूभौतिकविद है, जो प्रिस्टन विश्वविद्यालय में प्रोफेसर भी है। इन्होने प्लेट विवर्तनिकी सिंद्धांत में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इनके जीवनपर्यन्त महत्वपूर्ण कार्यो के लिए अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति डब्ल्यू जार्ज बुश ने नेशनल मैडल ऑफ़ साइंस से 2003 में सम्मानित किया।
  • जॉन टूजो विल्सन(John Tuzo Wilson) (जन्म-1908; मृत्यु-1993;) कनाडा के प्रमुख भूभौतिकविद और भूवैज्ञानिक है। जिन्होंने सर्वप्रथम 1965 में प्लेट शब्द का प्रयोग किया।

प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत के अन्य प्रमुख प्रणेता हैं: वी॰ आईजक, एल॰ आर॰ साईंकीन्स, ए॰ हालम, एक्स॰ के॰ पिशान, जे॰ आर॰ हेर्टजलर, हैरी हेस इत्यादि।

उत्पत्ति[संपादित करें]

भूमण्डल पर अनेक क्षेत्रो में ऐसे प्रमाण मिले है जिनके आधार पर ज्ञात होता है कि एक ही स्थान पर जलवायु में समय-समय पर अनेक परविर्तन हुए है। इन परिवर्तनों को दो रूपों में स्पष्ठ किया जा सकता है –

  • यदि स्थल भाग एक जगह पर स्थिर रहे हो तो जलवायु रहे हो तो जलवायु कटिबंधो का क्रमशः स्थानांतरण हुआ होगा, जिस कारण कभी शीत, कभी उष्ण तथा शुष्क एवं कभी उष्णार्ध जलवायु का आगमन हुआ होगा, परन्तु ऐसे स्थानान्तरण के प्रत्यक्ष प्रमाण नही मिलते है।
  • यदि जलवायु कटिबंध स्थिर रहे हो, तो स्थल भागो का स्थानान्तरण हुआ होगा। स्थल के स्थायित्व को नही स्वीकारा जा सकता है। उसके स्थानांतरण एवं प्रवाह में विश्वास किया जाता है।

स्थलखंड कभी स्थिर नही रहे है, वे जुड़ते तथा टूटते रहे है। प्रारंभ में सम्पूर्ण स्थलखंड एक-दूसरे से जुड़े हुए थे, जिसे पैंजिया नाम दिया गया। 'इस पैंजिया का कई बार विखंडन तथा जुड़ाव हुआ होगा' इस कथन कि पुष्टि के लिये निम्नलिखित तर्क दिये जा सकते है –

  • आन्ध्र महासागर के दोनों तटो पर भौगोलिक एकरूपता पायी जाती है। दोनों तट एक दूसरे से मिलाए जा सकते है। जिस तरह किसी वस्तु को दो टुकड़ो में तोड़ कर पुनः मिलाया जा सकता है (jig-saw-fit) , उसी प्रकार उत्तरी अमेरिका के पूर्वी तट को यूरोप के पश्चिमी तट से तथा दक्षिणी अमेरिका के पूर्वी तट को अफ्रीका के पश्चिमी तट से मिलाया जा सकता है।
  • भूगर्भिक प्रमाणों के आधार पर आंध्र महासागर के दोनों तटो के कैलिडोनियन तथा हर्शीयन पर्वत क्रमों में समानता पायी जाती है।
  • यदि दोनों तटो कि भूवैज्ञानिक सरचना का विचार किया जाय तो पुनः समय दिखता है।
  • आंध्र महासागर के दोनों तटो पर चट्टानों में पाए जाने वाले जीवावशेषो (फसिल) तथा वनस्पतियों के अवशेषो में पर्याप्त समानता पायी जाती है।
  • भूगणितीय प्रमाणों के आधार पर यह बताया जाता है कि ग्रीनलैंड निरंतर २० मीटर प्रतिवर्ष कि गति से पश्चिम कि और सरक रहा है। 1930 के बाद इसके पश्चिम की ओर सरकने का कोई प्रमाण नहीं मिला है।
  • स्कान्दिवेनिया के उत्तरी भाग में पाए जाने वाले लेमिंग नामक छोटे-छोटे जंतु अधिक संख्या होने पर पश्चिम कि और भागते है परन्तु आगे स्थल न मिलने के कारण सागर में जलमग्न हो जाते है। इससे यह प्रमाणित होता है कि अतीतकाल में जब स्थलभाग में मिले थे तो जंतु पश्चिम कि और जाया करते थे।
  • ग्लोसोप्तरिस वनस्पति का भारत, दक्षिण अफ्रीका, फाकलैंड, ऑस्ट्रेलिया तथा अण्टारकटीका में पाया जाना यह प्रमाणित करता है कि कभी ये स्थलभाग एक में मिले थे।
  • कार्बनिफेरस युग के हिमानिकरण के प्रभाव का ब्राजील, फाकलैंड, द० अफ्रीका, प्रायद्वीपीय भारत तथा ऑस्ट्रेलिया में पाया जाना तभी संभव हो सकता है, जबकि सभी स्थलभाग कभी एक रहे हो।
  • दक्षिणी ध्रुव के पास कोयला तथा भारत में पूर्ववर्ती महाद्वीपीय हिमचादर के चिन्ह पाए गए है। ये दोनों क्षेत्र उनके वर्तमान निर्माण हेतु अशंभव या विपिरित जलवायिक दशाओ को रखते है। क्योकि कोयला का निर्माण गर्म उपोष्ण कटिबंधीय जलवायु कि दशा में होती है। जबकि हिमचादर उच्च अक्षांशो में सिमित होती है। अत: दक्षिणी धुर्व के पास कोयला तथा भारत में पुर्व निर्मित हिमाचादरो का पाया जाना इस तथ्य कि और संकेत करता है कि महाद्वीप विभिन्न समयों में भिन्न अक्षांशो में स्थिर रहे हो अर्थात स्थलखंड स्थानान्तरित होते रहे हो।

उक्त विभिन्न कारणों के अध्ययन से पता चलता है कि स्थलखंडो का प्रवाह होता रहा है अर्थात स्थलखंड स्थान्तरित होते रहे है। अब सवाल उठता है कि किस बल के कारण स्थलखंडो में प्रवाह होता रहा है या स्थलखंड स्थानान्तरित होते रहे है?

उपरोक्त लिखित तथ्य एक सिद्धांत है जिसका प्रतिपादन वेगेनर ने किया जिसे महाद्वीपीय प्रवाह सिद्धांत (Continental Drift Theory of Wegener) कहते है।


वेगेनेर के अनुसार जब पैंजिया में विभाजन हुआ तो उसमे दो दिशा में प्रवाह हुए –

  • उत्तर कि ओर या भूमध्य रेखा कि ओर तथा
  • पश्चिम की ओर


ये प्रवाह दो प्रकार के बलों द्वारा संभव हुए होगे

  • भूमध्य रेखा की ओर का प्रवाह गुरुत्व बल तथा प्लवनशीलता के बल (force of buoyancy) के कारण हुआ। महाद्वीप सियाल का बना है तथा सीमा से काम घनत्व वाला है, अत: सियाल सीमा पर बिना रुकावट के तैर रहा है।
  • महाद्वीपों का पश्चिम दिशा कि ओर प्रवाह सूर्य तथा चंद्रमा के ज्वारीय बल के कारण हुआ मन गया है। पृथ्वी पश्चिम से पुर्व दिशा की ओर घूमती है। ज्वारीय रगड़ पृथ्वी के भ्रमण पर रोक (ब्रेक) का काम करते है | इस कारण महाद्वीपीय भाग पीछे छुट जाते है तथा स्थलभाग पश्चिम कि ओर प्रवाहित होने लगते है |

1912 में अल्फ्रेड वेगेनेर द्वारा प्रतिपादित महाद्वीपीय प्रवाह सिद्धांत का परिक्षण करने पर निम्लिखित त्रुटीया मिलिती है।

  • वेगेनर द्वारा बताये गए प्रवाह के बल महाद्वीपों के प्रवाह के लिए सर्वथा अनुपयुक्त है। चन्द्रमा तथा सूर्य के ज्वारीय बल से महाद्वीप में पश्चिम कि ओर प्रवाह तभी हो सकता है, जब वह वर्तमान ज्वारीय बल से 90 अरब गुना अधिक हो | यदि इतना बल महाद्वीपों के प्रवाह के समय रहा होता तो पृथ्वी का परिभ्रमण एक ही वर्ष में बंद हो गया होता |इसी तरह गुरुत्व बल के कारण महाद्वीपों में प्रवाह नहीं हो सकता, बल्कि इसके प्रभाव से स्थल भाग आपस में मिल गए होते।
  • वेगेनर ने कई परस्पर विरोधी बाते बताई है। प्रारम्भ में बताया कि सीमा से सियाल में रुकावट के बिना तैर रहा है। बाद में बताया कि सीमा से सियाल में रुकावट आयी | यदि इसे मान भी लिया जय तो यदि सियाल से सीमा कठोर है तो सियाल उस पर तैर कैसे सकता है?

उपर्युक्त त्रुटियों के समाधान के लिए ही प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत की उत्पत्ति हुई।[1][2]

प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत[संपादित करें]

प्लेट विवर्तनिकी सिंद्धांत को पूरा महत्व 1960 के बाद मिला क्योकि उस समय तक अनेक भू भौतिक परिक्षण इसके समर्थन में आ चुके थे। पृथ्वी के अन्दर पदरथ संकेन्द्रीय परतो (concetric shells) में वितरित है। पहली (ऊपरी ) परत को स्थालमंडल कहा जाता है। यह मण्डल महाद्वीप और महासागरीय पपड़ी को समाहित करता है |इस मण्डल कि मोटाई 100 किमी है। इसके अंतर्गत मजबूत एवं ठोस पदार्थ सम्मलित है। यह मण्डल कमजोर तथा आंशिक रूप से पिघले एस्थेनोस्फीयर (Asthenosphere) के ऊपर स्थित है। एस्थेनोस्फीयर कि मोटाई धरातल के नीचे 100 से 250 किमी के बीच निहित है अर्थात इसकी वास्तविक मोटाई 150 किमी है।

जे. टी. विल्सन महोदय जो कनाडियन भूगर्भ वेत्ता थे सर्वप्रथम प्लेट शब्द का प्रयोग किया। इनके अनुसार पपड़ी और उपरी मेंटल के भाग प्लेट कहे जाते है। “ प्लेट विवर्तनिकी का तात्पर्य उस प्रक्रिया से है जिसमे प्लेट निर्माण, प्लेट प्रकृति, प्लेट गति तथा उनकी परिणामी प्रक्रियाएं सम्मिलित है।”

प्लेट विवर्तनिकी का मुख्य तथ्य यह है कि पृथ्वी का स्थालमंडल अनेक वास्तविक महाद्वीपीय खंडो या प्लेटो से निर्मित है। इसमें से कुछ प्लेटे सिर्फ महाद्वीप का निर्माण करती है, इसलिए इनको महाद्वीपीय प्लेट कहा जाता है।

वृहद् प्लेटे[संपादित करें]

मध्यम प्लेट[संपादित करें]

सभी प्लेट एक दूसरे के संदर्भ में एक स्वंतत्र इकाई के रूप में निरंतर गतिशील रहते है। वृहद् महाद्वीपीय प्लेट का सापेक्षिक वेग 10 सेमी/वर्ष है। इनकी गतिशीलता इनके धुर्णन ध्रुव के चतुर्दिक होती है। इनमे क्षैतिज तथा चक्रीय (वृत्ताकार) दोनों प्रकार का भ्रमण गहरे एस्थेनोस्फीयर ( मैन्टिल का पिघला परत) के धरातल पर पृथ्वी के अन्दर से उत्पन्न तापीय संवहन धाराओ (thermal convention current) के प्रभाव में आकर हटा है। ए. हालम के अनुसार (1977) प्लेट विवर्तनिकी पर्थिवी के अन्दर तापीय सवाहन का धरातलीय परिणामी मुखाकृति (surface expression) है। इन धाराओ को ऊष्मा युरेनियम, थोरियम तथा पोटैशियम के रेडियोधर्मी क्षरण से प्राप्त होता है।

ऊष्मा उत्पत्ति का यह श्रोत संचालन (cunduction) द्वारा होने वाले ऊष्मा ह्रास से तीव्र है। इसी के परिणामस्वरुप उष्ण प्रदार्थ धरातल पर आते है; वहाँ शीतल होते है तथा जल्दी से मैन्टिल को पुन: वापस लौट जाते है। प्लेटो में गति से पृथ्वी सतह: का क्षेत्रफल घटता अथवा बढ़ता नहीं है | वरन यथावत बना रहता है। यदि एक नए पदार्थ का निर्माण होता है तो दूसरी तरफ पदर्थो का क्षेपण (subduction) भी होता है। इस प्रकार संतुलन बना रहता है।

प्लेट भ्रमण निरंतर जारी रहने वाली प्रक्रिया के रूप में होता है। इस भ्रमण के कभी सुपर महाद्वीप पैंजिया का निर्माण होता है तो कभी वर्तमान के सामान कई सृजन होता है। उदाहरण के लिए 700 मिलियन वर्ष पूर्व ( कैंब्रियन के पूर्व) पैंजिया था जो प्लेटो के भ्रमण के कारण 500-600 मिलियन वर्ष पूर्व विखंडित हो गया। लगभग 460 मिलियन वर्ष पूर्व अटलांटिक मह्सागर पूर्णत: बंद हो गया। इस दौरान चूकी दोनों प्लेटे आमने सामने आकर टकराई इसलिए अमेरिका में कैलेडोनियन पर्वत ( आप्लेशीयन ) तथा यूरोप में हर्सियन पर्वत का निर्माण हुआ। इस प्रकार पुराने पर्वतो कि उत्पत्ति को इस सिद्धांत द्वारा समझाया जा सकता है। पुन: 200 मिलियन वर्ष पूर्व सभी महाद्वीप जुड़ने लगे तथा इससे द्वितीय पैंजिया का निर्माण हुआ। इस प्रकार पुराने पर्वतो कि उत्पत्ति को इस सिद्धांत द्वारा समझाया जा सकता है | लगभग 150 मिलियन वर्ष पूर्व पैंजिया में पुन: विखंडन शुरू हुआ। अटलान्टिक दुबारा खुला। इसके प्लेटो कि गति शीलता से नए पर्वतो का निर्माण हुआ। जैसे तर्सिअरी (Tertiary) युग में अल्पाइन पर्वत का निर्माण हुआ। प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत द्वारा पर्वत निर्माण के साथ ज्वालामुखी उद्गार, भूकंप, गहरे सागरीय खाईयो , महासागरीय कटको तथा सागर नितल के प्रसरण को समझाया जा सकता है। ये घटनाये प्लेटो के किनारे संपन्न होती है। प्लेट के किनारों को तीन प्रकारों में बता जाता है।


प्लेटों के किनारे[संपादित करें]

रचनात्मक किनारा[संपादित करें]

जब दो प्लेटे विपरीत दिशा में गतिशील होती है तो ऐसे में बने रिक्त स्थान से नया पदार्थ (मैग्मा) ऊपर आता है। इसके कारण नए पदार्थ का सृजन होता है। इसलिए इसे रचनात्मक किनारा नाम दिया गया है। यह प्रक्रिया मध्य महासागरीय कटक के सहारे घटित होती है।

विनाशात्मक किनारा[संपादित करें]

जब दो प्लेटे आमने- सामने अभिसरित होती है तो भारी पदार्थ से निर्मित प्लेट का किनारा मुड़कर हल्की प्लेट के नीचे चला जाता है तथा व्ययित (consumed) होकर या खपकर नष्ट हो जाता है। इसलिए इसे विनाशात्मक किनारा कहते है।

संरक्षी किनारा[संपादित करें]

जब दो प्लेट एक दूसरे के अगल बगल खिसकती है तो वहा रूपांतर भ्रंश (Transform Fault) का निर्माण होता है। इस प्रक्रिया में न तो नए पदार्थ का सृजन होता है और न ही पदार्थ का विनाश होता है। ऐसी स्थिति मध्य महासागरीय कटक के पास होती है। प्रशान्त और अमेरिकन प्लेटो के मध्य सान एंड्रीयास भ्रंश का निर्माण हुआ है।

ये स्थालमंडलीय प्लेट विभिन्न प्रारूपो में गतिशील तथा प्रवाहित होते है। स्मरणीय है कि ये प्लेट अपने ऊपर स्थित महाद्वीप तथा महा सागरीय भागो को अपने प्रवाह के साथ ही स्थानान्तरित करते है। उपर्युक्त तथ्यों के आधार पर हेस(Hess) ने महाद्वीपों के प्रवाह के पक्ष में प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत का प्रतिपादन किया (1960)।

जब ये प्लेट प्रवाहित होते है तो उनके साथ महाद्वीप तथा महासागर तली भी विस्थापित हो जाते है। कार्बनिफेरस युग से पैंजिया के विभिन्न प्लेटो के स्थानान्तरण तथा प्रवाह के कारण ही वर्तमान महाद्वीपों तथा महासागरो को रूप प्राप्त हुआ। इनके प्रारूप में भविष्य में भी परिवर्तन हो सकता है क्योकि इस प्लेटो में प्रवाह अब भी जारी है।


प्लेट विवर्तनिकी और सागर नितल का प्रसरण[संपादित करें]

जब दो प्लेटे एक दूसरे से दूर हटती है तो इन दोनों के मध्य की सीमा को अपसरण जंक्शन(Divergent Junction) या प्रसरण मेखला(spreading zone) कहा जाता है. इस सीमा को रचनात्मक किनारा कहते है क्योकि इन दोनों के मध्य नै प्लेट बनती है. इसी मेखला के सहारे भूकंप क्रिया, ज्वालामुखी क्रिया, पृथ्वी कि पपड़ी कि ऊष्मा का प्रवाह, मध्य सागरीय कटक का निर्माण तथा सागर नितल का प्रसरण पाया जाता है . सागर नितल का प्रसरण रूपांतर भ्रंश के सहारे भ्रंश मेखला के समकोण पर सम्पन्न होता है . ये रूपांतरित भ्रंश विस्तृत महासागरीय प्लेट को अनेक खंडो में विभाजित करते है जो एक दूसरे कि तुलना में भिन्न भिन्न अंश तक फिसलती है.
जब दो प्लेटे दूर हटती है तो उनके बीच रिक्त स्थान का सृजन हो जाता है. यही रिक्त स्थान एस्थेनोस्फेयर से आये पिघले पदार्थ द्वारा भरा जाता है . ऊपर आते पदार्थ रिक्त स्थान में शीतल होकर ठोश रूप धारण करते है. इसी से नए सागरीय नितल का निर्माण होता है. फलत: सागरीय नितल में प्रसार पाया जाता है. यह अनुमान लगाया गया है कि 150 मिलियन वर्ष पूर्व अटलान्टिक महासागर नहीं था. उस समय पुनर्निर्मित पैंजिया था जिससे अमेरिका, अफ्रीका तथा यूरेशिया जुड़े हुए थे. बाद में पैंजिया में विखंडन हुआ तथा अटलांटिक का खुलना प्रारंभ हुआ. अटलांटिक महासागर में तीन बार अधिकतम प्रसार कृटेसियस, इयोसीन तथा मायोसीन अवधियो में पाया गया था. प्रत्येक प्रसार लगभग 10 से 70 मिलियन वर्ष तक जारी रहा . इसी तरह तीन बार न्यूनतम प्रसार पैलिओसिन, ओलिगोसिन तथा मायोसीन के बाद वाले अवधि में मिला था . प्रत्येक न्यूनतम प्रसार 10 से 20 मिलियन वर्ष तक जारी रहा . यद्यपि औसत सागरीय नितल का प्रसार 2 से 14 सेमी प्रतिवर्ष कि दर से हुआ था. परन्तु अटलांटिक का प्रसार 2 सेमी प्रतिवर्ष से भी काम था.
[3]

प्लेट विवर्तनिकी और महासागरीय कटक[संपादित करें]

मध्य महासागरीय कटको का निर्माण उस समय होता है जब दो प्लेटें एक दूसरे से दूर हटती है तथा पिघला पदार्थ पर्याप्त उचाई तक ऊपर आता है . महासागरीय कटक 40,000 किमी की लम्बाई में पाए जाते है . अधिकांश कटको में रिफ्त घाटियाँ मिलाती है जो दो से तीन किमी कि घहराई तथा 60 किमी तक चौड़ी भी है. सभी महासागरीय कटक महासागरो को सामान भागो में विभाजित नहीं करते . सभी कटको के शीर्ष पर रिफ्त घटिया नहीं पायी जाती है. प्लेटो के उपरोक्त प्रकार से दूर हटने के कारण कुछ अन्य सम्पादित होने वाली घटनाये निम्न है ---

  • अन्तरामहाद्वीपीय रिफ्टिंग(Intra Continental Rifting)

दो महाद्वीपीय प्लेटो के दूर हटने के फलस्वरूप रिफ्त घटियो का निर्माण होता है. पूर्वी अफ्रीकन रिफ्त क्रम, राइन रिफ्त तथा विकल झील रिफ्त इसके उदाहरण है.

  • अंतरप्लेट पतलीकरण(Inter Plate Thinning)

प्लेट विवर्तनिकी में कुछ प्लेट पतली भी होती है. जब प्लेटे पतली होती है तो भूधरातलीय भाग नीचे धसते है. लाल सागर ऐसा ही उदाहरण है.

  • सागरीय उभार(Oceanic Rises)

जब प्लेटो के हटने से ऊपर आता पदार्थ पर्याप्त उचाई तक नहीं उठ पता है तो सागरीय कटक के जगह सागरीय उभार का निर्माण हो जाता है. हिन्द महासागर में स्थित कार्ल्सबर्ग कटक सागरीय उभार का एक नमूना है.

प्लेट विवर्तनिकी और पर्वत निर्माण[संपादित करें]

जब दो प्लेटे आमने-सामने खिसकती है तो वे एक सीमा रेखा के सहारे टकराती है. इस सीमा रेखा को अभिसरण जंक्शन या क्षेपण मेखला (Convergent Junction or Subduction Zone) कहा जाता है. उपरोक्त सीमा को विनाशात्मक किनारा भी कहते है. क्योकि इस स्थल मण्डल का कुछ भाग खपकर(consumed) नष्ट हो जाता है. क्षेपण शब्द का तात्पर्य सागरीय पपड़ी का महासागरीय पपड़ी के नीचे डूबना होता है.

प्लेट विवर्तनिकी में जब दो प्लेटे एक दूसरे से टकराती है तो भारी प्लेट(अधिक घनत्व वाली प्लेट) नीचे जाती है. अर्थात हलके प्लेट के नीचे क्षेपित होती है तथा कुछ गहराई तक जाकर समाप्त हो जाती है. क्षेपित प्लेट अधिकतम 700 किमी कि गहराई तक जा सकती है. परन्तु कुछ प्लेटे सिर्फ 300 किमी कि गहराई तक जाती है. क्षेपण मेखला को बेनियाफ़ मेखला(Benioff Zone) भी कहा जाता है. प्रस्तुत क्रिया में प्लेट का नीचे जाना संवहन धाराओ, गुरुत्व, निम्नवर्ती उत्क्रमण(Under Thrusting) तथा रूपांतरण के कारण संभव हटा है.
इस प्रक्रिया में जब प्लेट नीचे जाएगी तथा महाद्वीपीय प्लेट इसके ऊपर चढ़ेगी. टकराहट एवं भारी प्लेट के नीचे जाने के कारण हल्के महाद्वीपीय प्लेट में दरार तथा मोड़(वलन) आ जाता है. साथ ही क्षैतिज संपीडनात्मक बल के कारण महाद्वीपीय प्लेट का भाग ऊपर उठता जाता है. इससे वलित पर्वत का निर्माण होता है. नीचे कि तरफ क्षेपित प्लेट का भाग जब 100 किमी या अधिक गहराई तक पहुचता है तो मैन्टिल में पहुच कर तरलावस्था में बदल जाता है. तरलावस्था में आने के कारण इसका आयतन बढ़ जाता है. पिघले पदार्थ के फैलने के कारण पर्वत में पुनः उत्थान होने लगता है. एंडीज पर्वत का निर्माण नजका प्लेट(Nazca Plate) एक अमेरिकी प्लेट के टकराहट से संभव हुआ है. इसी तरह राकी पर्वत तथा क्यूराइल- कमचटका- अल्युशीयन चाप का निर्माण क्रमशः प्रशान्त प्लेट तथा उत्तरी अमेरिकी प्लेट और प्रशान्त प्लेट तथा यूरेशियन प्लेट के कारण हुआ है. प्लेट विवर्तनिकी में जब दो महाद्वीपीय प्लेटे मिलती है तो भी पर्वत का निर्माण होता है. अफ्रीकन एवं यूरोपियन प्लेट तथा एशिया भारतीय प्लेट के टकराने से क्रमशः अल्पाइन एवं हिमालय पर्वत का निर्माण संभव हुआ है. क्षैतिज संपीडन के कारण संकुचन और मोड़ उत्पन्न हो जाता है. केन्द्रीय यूराल पर्वत का निर्माण भी इसी क्रिया के कारण संभव हो पाया है. कई परिकल्पनाओ के अनुसार भारतीय प्रायद्वीपीय खंड मेसोजोइक अवधि में हिन्द महासागर के मध्य स्थित था. जब यह उत्तर कि तरफ बढ़ा तथ दूसरे खंड से टकराया तो हिमालय पर्वत का निर्माण हुआ.

प्लेट विवर्तनिकी और भूकम्पो का आना[संपादित करें]

  • प्लेट विवर्तनिकी में जब दो प्लेट टकराती है तो कई प्रकार का असंतुलन उत्पन्न होता है. इस असुंतलन के कारण भिन्न-भिन्न अंश के भूकंप उत्पन्न होते है. जब दो प्लेट एक दूसरे से दूर हटती है तो मध्यम प्रकार के भूकम्प आते है. क्योकि इस दशा में पपड़ी में टूटन कि डर, प्लेट के हटने कि दर तथा लावा के ऊपर आने का दर धीमा होता है. धीमे दर के परिणामस्वरुप भूकम्प मूल काम गहराई(25से 30किमी) स्थित होता है. सिर्फ कुछ दशा में ही भूकम्प मूल उल्लेखनीय गहराई जैसे 60 किमी पर स्थित होते है. जब दो प्लेटो के विपरीत दिशा में हटने से मध्यअटलांटिक कटक तथा पूर्वी प्रशान्त महासागरीय उभार का निर्माण हुआ था. तो इनके सहारे भूकम्प भी अंकित किये गए थे.
  • इसके विपरीत जब दो प्लेटे आमने- सामने आकर टकराती तै तो भूकम्प उच्च अंश के पाए जाते है. इस दशा में भूकम्प मूल 200 से 700 किमी कि गहराई पर निहित होते है. यहाँ पर क्षेपित भाग के सहारे तीव्र रगड़ होता है तथा मैग्मा भी तीव्र डर से ऊपर आता है. इसी कारण विनाशात्मक किनारे पर भ्क्म्प कि तीव्रता अत्यधिक हो जाती है तथा ये अधिक खतरनाक होते है. प्रशान्त मह्सागर में राकी- एंडीज पर्वत तथा एशियाई द्वीपों और चापो के निर्माण के कर्ण ही परिप्रशान्त महासागर में अधिक भूकम्प आते है. इसी सहारे अल्पाइन- हिमालय श्रृंखला के सहारे भी काफी भूकम्प आते है.
  • जब दो प्लेटे अगल-बगल खिसकती है तो उसको संरक्षी किनारा कहा जाता है. इस दशा में भी भूकम्प आते है परन्तु तीव्रता कम होती है. कैलिफोर्निया का भूकम्प इसका उदाहरण है.[4]

प्लेट विवर्तनिकी और ज्वालामुखी उद्गार[संपादित करें]

ज्वालामुखी उद्गार के क्षेत्रो पर ध्यान देने से पता चलता है कि इनका वितरण तिन क्षेत्रो में अधिक मिलाता है. पहला क्षेत्र महासागरीय कटक के सहारे संरचनात्मक किनारे पर पाया जाता है. दूसरा क्षेत्र परिप्रशान्त पर्वतीय ज्वालामुखी क्षेत्र के सहारे विनाशात्मक किनारे पर निहित है. तृतीय ज्वालामुखी क्षेत्र रिफ्ट घाटी के सहारे फैला मिलता है.

वर्तमान में ज्वालामुखी उद्गार को भी प्लेट विवर्तनिकी से समझाया जा सकता है. जब दो प्लेटे टकराती है तो भारी प्लेट नीचे क्षेपित हो जाती हिया तथा हल्की प्लेट इसके ऊपर चढ़ जाती है. क्षेपित प्लेट जब 100 किमी के नीचे चली जाती है तो इसका निचला भाग पिघल जाता है. इसके फलस्वरूप मैग्मा बनता है और एकत्रित विस्फोट गैसों द्वारा ये ऊपर कि तरफ आने के लिये बाध्य कर दिया जाता है. जब ये प्लेट दूर हटती है तो दबाव काम हो जाता है. इसी क्रिया के फलस्वरूप नीचे मौजूद मैन्टिल पिघल कर ज्वालामुखी उद्गार के रूप में ऊपर आता है. मध्य महासागरीय कटक के सहारे होने वाला ज्वालामुखी उद्गार इसी प्रकार का है. यह पाया गया है कि मध्य अटलांटिक कटक के नजदीक होने वाले द्वीप नवीन लावा से तथा दूर स्थित द्वीप पुराने लावा से निर्मित है. उदाहरण स्वरूप अजारे द्वीप मध्य अटलांटिक कटक के नजदीक होने कर्ण सिर्फ 4 मिलियन वर्ष पुराने लावा से निर्मित है. जबकि दूर स्थित केपवार्ड द्वीप 120 मिलियन वर्ष पुराने लावे से निर्मित है.

मध्य महासागरीय कटक से दूर स्थित ज्वालमुखी द्वीप महासागरीय प्रसरण के कारण दूर होते जा रहे है.

सम्बन्धित शब्दावली[संपादित करें]

  1. प्रतिध्रुवस्थ स्थित ( Amtipodal Situation): स्थल के विपरीत जल तथा जल के विपरीत स्थल की स्थिति को प्रतिध्रुवस्थ स्थिति कहा जाता है।
  2. समकालिक रेखा (Isochrones): सागरीय नितल में स्थित प्राचीन चुम्बक कि समान तिथियो को मिलाने वाली रेखा को समकालिक रेखा कहते है।
  3. केन्द्रीय भुसन्नति (Eu geosyncline): सागरीय किनारों पर स्थित ऐसी भूसन्नति कहते है जिसमे ज्वालामुखी पदार्थ तथा क्लस्टीक अवसादो का मोटा निक्षेप पाया जाता है।
  4. स्थल गोलार्द्ध (Land Hemisphere): स्थलीय भागो के आधिक्य के कारण उत्तरी को स्थल गोलार्द्ध कहते है।
  5. पुरा चुम्बकत्व (Palaeomagnetism): पृथ्वी के विभिन्न भूगर्भिक कालो में निर्मित शैलो में संरक्षित चुम्बकीय गुणों(अवशेषो) को पुराचुम्ब्कत्व कहते है।
  6. प्लेट (Plate): पृथ्वी के दृढ भूखण्ड अथवा क्रस्ट को प्लेट कहते है। इस तरह प्लेट दो प्रकार के होते है: (1) महासागरीय प्लेट और (2) महाद्वीपीय प्लेट |
  7. सागर-नितल प्रसरण (Sea-floor Spreading): मध्य महासागरीय कतको के सहारे किसी भी महासागरीय तली के दोनों तरफ फैलने को सागर नितल का प्रसरण कहते है। यह क्रियाअपसारी (divergent) या रचनात्मक (constructive) प्लेटो के मध्य महासागरीय कटको के अपसरण (विपरीत दिशाओ में गमन) के कारण होता है। इस क्रिया द्वारा महासागरो कि तालियो (floors या bottom) में निरंतर विस्तार होता है।
  8. गोला (sphere): एक गोला वह ज्यामितीय आकृति है जिसका आयतन उसके धरातलीय क्षेत्रफल कि अपेक्षा सर्वाधिक है।
  9. चतुष्फलक(tetrahedron): एक चतुष्फलक चार फलको वाली वह ज्यामितीय आकृति है जिसका आयतन उसके धरातलीय क्षेत्रफल कि अपेक्षा न्यूतम होआ है।
  10. दुर्बलतामण्डल(Asthenosphere): स्थालमंडल के नीचे 85 किमी से कई सौ किलोमीटर कि गहराई तक वाले भाग कि अपेक्षा काम दृढ होती है परन्तु इतनी दृढ(rigid) अवश्य होती है कि उनसे होकर अनुप्रस्थ भूकम्पीय तरंगे अग्रसर हो सके को दुर्बलतामंडल कहते है।
  11. अंतरतम (core): पृथ्वी कि धरातलीय सतह से 2900 किमी से प्रारंभ होकर पृथ्वी के केंद्र(6371 किमी) तक के आंतरिक भाग को पृथ्वी का क्रोड या अंतरतम कहते है।
  12. क्रस्ट(crust): पृथ्वी कि धरातलीय सतह से नीचे 30किमी (अधिकतम 100 किमी) की गहराई वाले भाग को क्रस्ट कहा जाता है। इसका औसत घनत्व 2.8 से 3.0 होता है।
  13. मैन्टिल(mantle): पृथ्वी कि क्रस्ट के नीचे से 2900 किमी की मोटाई वाला पृथ्वी का आंतरिक भाग मैन्टिल कहा जाता है।
  14. निफे(nife): पृथ्वी कि सबसे निचली आंतरिक परत का स्वेस ने इसकी खानिजीय रचना के अधार पर निफे (निकल+ फेरियम) नामकरण किया। इस परत में लोहे की उपस्थिति से पता चलता है कि पृथ्वी के क्रोड में चुम्बकीय शक्ति हैं।
  15. सियाल(sial): एडवर्ड स्वेस ने पृथ्वी कि क्रस्ट (उपरी परत) का नामकरण सिलिका (silica-si) तथा अलुमिनियम (Aluminium-al) की प्रधानता के कारण सियाल (si+al) किया है।
  16. सीमा(sima): एडवर्ड स्वेस ने सियाल के नीचे स्थित पृथ्वी कि दूसरी परत का नामकरण सिलिका और मैग्निशियम कि प्रधानता के आधार पर सीमा (si+ma) किया है।
  17. प्रशान्त महासागर का ज्वालावृत्त( fire ring of Pacific): प्रशान्त महासगर के चारो और महाद्वीपीय किनारों, द्वीप चापो (island arcs) एवं सागरीय द्वीपों के सहारे सक्रीय ज्वालमुखीयो कि प्रधानता के कारण इसे प्रशान्त महासागर का ज्वालावृत्त कहते है।
  18. भूकंप अभिकेन्द्र (epicentre): भूकंप मूल के ठीक ऊपर धरातलीय सतह के ऊपर स्थित उस केंद्र को भूकम्प अधिकेन्द्र कहते है जहाँ भूकम्पीय लहरों का ज्ञान सबसे पहले होता है।
  19. भूकंप मूल(focus): धरातलीय सतह के नीचे जिस भाग में भूकंप उत्पन्न होता है उस स्थान को भूकंप कि उत्पत्ति का केंद्र या भूकंप मूल (focus) कहते है।
  20. पतालीय भूकंप(plutonic earthquake): धरातलीय सतह से अत्यधिक गहराई पर उत्पन्न होने वाले भूकम्पो को प्लूटानिक भूकंप भी कहते है | यह नामकरण पटल देवता 'प्लूटो' के नाम पर किया गया है।
  21. वलित पर्वत(folded mountain): अभिसारी क्षैतिज संचलन के कारण उत्पन्न पार्श्ववर्ती संपीडन (lateral compression) होने से अवसादी चट्टानों के वलित होने से अपनति (anticlines) एवं अभिनति (synclines) से युक्त पर्वत को वलित पर्वत कहते है।
  22. पर्वत कटक(moutanin ridge): काम चौड़ी एवं ऊची पहाड़ियो के क्रम (सिलसिले) को पर्वत कटक कहते है जो आकर में लम्बे तथा सकरे होते है।
  23. क्षेपण(subduction): जब दो अभिसारी प्लेट (converging plate) एक दूसरे से टकराते है तो अपेक्षाकृत भारी प्लेट का अग्रभाग मुड़कर हलके प्लेट के नीचे चला जाता है। इसे प्लेट क्षेपण कहते है।
  24. चुम्बकीय दिकपात (magnetic inclination): पृथ्वी के चुम्बकीय अक्ष तथा भौगोलिक उत्तर-दक्षिण में जो कोणीय झुकाव पाया जाता है उसे चुम्बकीय दिकपात कहा जाता है।
  25. चुम्बकीय नति (magnetic inclination): चुम्बकीय अक्ष और पृथ्वी के क्षैतिज ताल के साथ जो झुकाव पाया जाता है उसे चुम्बकीय नति कहते हैं।


सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. भौतिक भूगोल का स्वरुप ;लेखक सविन्द्र सिंह
  2. भौतिक भूगोल ; लेखक प्रो महेंद्र बहादुर सिंह
  3. भौतिक भूगोल ; लेखक -प्रो महेंद्र बहादुर सिंह
  4. भौतिक भूगोल: प्रो महेंद्र बहादुर सिंह