गुरुकुल
ऐसे विद्यालय जहाँ विद्यार्थी अपने परिवार से दूर गुरू के परिवार का हिस्सा बनकर शिक्षा प्राप्त करता है। [1] भारत के प्राचीन इतिहास में ऐसे विद्यालयों का बहुत महत्व था। प्रसिद्ध आचार्यों के गुरुकुल के पढ़े हुए छात्रों का सब जगह बहुत सम्मान होता था। राम ने ऋषि विश्वामित्र के यहाँ रह कर शिक्षा प्राप्त की थी। इसी प्रकार पांडवों ने ऋषि द्रोण के यहाँ रह कर शिक्षा प्राप्त की थी।
प्राचीन भारत में तीन प्रकार की शिक्षा संस्थाएँ थीं-
- (१) गुरुकुल- जहाँ विद्यार्थी आश्रम में गुरु के साथ रहकर विद्याध्ययन करते थे,
- (२) परिषद- जहाँ विशेषज्ञों द्वारा शिक्षा दी जाती थी,
- (३) तपस्थली- जहाँ बड़े-बड़े सम्मेलन होते थे और सभाओं तथा प्रवचनों से ज्ञान अर्जन होता था। नैमिषारण्य ऐसा ही एक स्थान था।
गुरुकुल आश्रमों में कालांतर में हजारों विद्यार्थी रहने लगे। ऐसे आश्रमों के प्रधान कुलपति कहलाते थे। रामायण काल में वशिष्ठ का बृहद् आश्रम था जहाँ राजा दिलीप तपश्चर्या करने गये थे, जहाँ विश्वामित्र को ब्रह्मत्व प्राप्त हुआ था। इस प्रकार का एक और प्रसिद्ध आश्रम प्रयाग में भरद्वाज मुनि का था। [2]
[संपादित करें] परिचय
गुरुकुल इसका शाब्दिक अर्थ है गुरु का परिवार अथवा गुरु का वंश परंतु यह सदियों से भारतवर्ष मे शिक्षासंस्था के अर्थ में व्यवहृत होता रहा है। गुरुकुलों के इतिहास में इस देश की शिक्षाव्यवस्था और ज्ञानविज्ञान की रक्षा का इतिहास समाहित है। भारतीय संस्कृति के विकास में चार पुरुषार्थों, चार वर्णो और चार आश्रमों की मान्यताएँ तो अपने उद्देश्यों की सिद्धि के लिए अन्योन्याश्रित थी ही, गुरुकुल भी उनकी सफलता में बहुत बड़े साधक थे। यज्ञ और संस्कारों द्वारा ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य बालक 6,8 अथवा 11 वर्ष की अवस्थाओं में गुरुकुलों में ले जाए जाते थे (यज्ञोपवीत, उपनयन अथवा उपवीत) और गुरु के पास बैठकर ब्रह्मचारी के रुप में शिक्षा प्राप्त करते थे। गुरु उनके मानस और बौद्धिक संस्कारों को पूर्ण करता हुआ उन्हें सभी शास्त्रों एवं उपयोगी विद्याओं की शिक्षा देता तथ अंत में दीक्षा देकर उन्हें विवाह कर गृहस्थाश्रम के विविध कर्तव्यों का पालन करने के लिए वापस भेजता। यह दीक्षित और समावर्तित स्नातक ही पूर्ण नागरिक होता और समाज के विभिन्न उत्तरदायित्वों का वहन करता हुआ त्रिवर्ग की प्राप्ति का उपाय करता। स्पष्ट है, भारतीय सभ्यता और संस्कृति के विकास में गुरुकुलों का महत्वपूर्ण योग था।
गुरुकुल प्राय: ब्राह्मण गृहस्थों द्वारा गाँवों अथवा नगरों के भीतर तथा बाहर दोनों ही स्थानों में चलाए जाते थे। गृहस्थ विद्वान और कभी कभी वाणप्रस्थी भी दूर दूर से शिक्षार्थियों को आकृष्ट करते और अपने परिवार में और अपने साथ रखकर अनेक वर्षों तक-आदर्श और विधान पच्चीस वर्षों तक का था-उन्हें शिक्षा देते। पुरस्कार स्वरुप ब्रह्मचारी बालक या तो अपनी सेवाएँ गुरू और उसके परिवार को अर्पित करता या संपन्न होने की अवस्था में अर्थशुल्क ही दे देता। परंतु ऐसे आर्थिक पुरस्कार और अन्य वस्तुओंवाले उपहार दीक्षा के बाद ही दक्षिणास्वरूप दिए जाते और गुरु विद्यादान प्रारंभ करने के पूर्व न तो आगंतुक विद्यार्थियों से कुछ माँगता और न उनके बिना किसी विद्यार्थी को अपने द्वार से लौटाता ही था। धनी और गरीब सभी योग्य विद्यार्थियों के लिए गुरुकुलों के द्वार खुले रहते थे। उनके भीतर का जीवन सादा, श्रद्धापूर्ण, भक्तिपरक और त्यागमय होता था। शिष्य गुरु का अंतेवासी होकर (पास रहकर) उसके व्यक्तित्व और आचरण से सीखता। गुरु और शिष्य के आपसी व्यवहारों की एक संहिता होती और उसका पूर्णत: पालन किया जाता। गुरुकुलों में तब तक जाने हुए सभी प्रकार के शास्त्र और विज्ञान पढ़ाए जाते और शिक्षा पूर्ण हो जाने पर गुरु शिष्य की परीक्षा लेता, दीक्षा देता और समावर्तन संस्कार संपन्न कर उसे अपने परिवार को भेजता। शिष्यगण चलते समय अपनी शक्ति के अनुसार गुरु को दक्षिणा देते, किंतु गरीब विद्यार्थी उससे मुक्त भी कर दिए जाते थे।
भारतवर्ष में गुरुकुलों की व्यवस्था बहुत दिनों तक जारी रही। राज्य अपना यह कर्तव्य समझता था कि गुरुओं और गुरुकुलों के भरण पोषण की सारी व्यवस्था करें। वरतंतु के शिष्य कौत्स ने अत्यंत गरीब होते हुए भी उनसे कुछ दक्षिणा लेने का जब आग्रह किया तो गुरु ने क्रुद्ध होकर एक असंभव राशि चौदह करोड़ स्वर्ण मुद्राएँ-माँग दीं। कौत्स ने राजा रघु से वह धनराशि पाना अपना अधिकार समझा और यज्ञ में सब कुछ दान दे देनेवाले उस अकिंचन राजा ने उस ब्राह्मण बालक की माँग पूरी करने के लिए कुबेर पर आक्रमण करने की ठानी। रघुवंश की इस कथा में अतिमानवीय पुट चाहे भले हों, शिक्षासंबंधी राजकर्तव्यों का यह पूर्णरूपेण द्योतक है। पालि साहित्य में ऐसी अनेक चर्चाएँ मिलती हैं, जिनसे ज्ञात होता है कि प्रसेनजित जैसे राजाओं ने उन वेदनिष्णात ब्राह्मणों को अनेक गाँव दान में दिए थे, जो वैदिक शिक्षा के वितरण के लिए गुरुकुल चलाते। यह परंपरा प्राय: अधिकांश शासकों ने आगे जारी रखी और दक्षिण भारत के ब्राह्मणों को दान में दिये गए ग्रामों में चलने वाले गुरुकुलों और उनमें पढ़ाई जानेवाली विद्याओं के अनेक अभिलेखों में वर्णन मिलते हैं। गुरुकुलों के ही विकसित रूप तक्षशिला, नालंदा, विक्रमशिला और वलभी के विश्वविद्यालय थे। जातकों, ह्वनेसांग के यात्राविवरण तथा अन्य अनेक संदर्भों से ज्ञात होता है कि उन विश्वविद्यालयों में दूर दूर से विद्यार्थी वहाँ के विश्वविख्यात अध्यापकों से पढ़ने आते थे। वाराणसी अत्यंत प्राचीन काल से शिक्षा का मुख्य केंद्र थी और अभी हाल तक उसमें सैकड़ों गुरुकुल, पाठशालाएँ रही हैं और उनके भरण पोषण के लिए अन्नक्षेत्र चलते रहे। यही अवस्था बंगाल और नासिक तथा दक्षिण भारत के अनेक नगरों में रही। 19वीं शताब्दी में प्रारंभ होनेवाले भारतीय राष्ट्रीय और सांस्कृतिक पुनर्जागरण के युग में प्राचीन गुरु कुलों की परंपरा पर अनेक गुरुकुल स्थापित किए गए और राष्ट्रभावना के प्रसार में उनका महत्वपूर्ण योग रहा। यद्यपि आधुनिक अवस्थाओं में प्राचीन गुरुकुलों की व्यवस्था को यथावत पुन: प्रतिष्ठित तो नहीं किया जा सकता, तथापि उनके आदर्शों को यथावश्यक परिवर्तन के साथ अवश्य अपनाया जा सकता है।
प्राचीन भारतीय गुरुकुलों में कुलपति हुआ करते थे। कालिदास ने वसिष्ठ तथा कण्व ऋषि को (रघुवंश, प्रथम, 95 तथा अभि. शा., प्रथम अंक) कुलपति की संज्ञा दी है। गुप्तकाल में संस्थापित तथा हर्षवर्धन के समय में अपनी चरमान्नति को प्राप्त होनेवाले नालंदा महाविहार नामक विश्वविद्यालय के कुछ प्रसिद्ध तथा विद्वान कुलपतियों के नाम हुए नत्सांग के यात्राविवरण से ज्ञात होता हैं। बौद्ध भिक्षु धर्मपाल तथा शीलभद्र उनमें प्रमुख थे। प्राचीन भारतीय काल में अध्ययन अध्यापन के प्रधान केंद्र गुरुकुल हुआ करते थे, जहाँ दूर दूर से ब्रह्मचारी विद्यार्थी, अथवा सत्यान्वेषी पर्व्राािजक अपनी अपनी शिक्षाओं को पूर्ण करने जाते थे। वे गुरुकुल छोटे अथवा बड़े सभी प्रकार के होते थे। परंतु उन सभी गुरुकुलों को न तो आधुनिक शब्दावली में विश्वविद्यालय ही कहा जा सकता है और न उन सबके प्रधान गुरुओं को कुलपति ही कहा जाता था। स्मृतिवचनों के अनुसार ‘मुनीनां दशसाहस्रं योऽन्नदानादि पोषाणात। अध्यायपति विप्रर्षिरसौ कुलपति: स्मृत:।’ स्पष्ट है, जो ब्राह्मण ऋषि दस हजार मुनि विद्यार्थियों को अन्नादि द्वारा पोषण करता हुआ उन्हें विद्या पढ़ाता था, उसे ही कुलपति कहते थे। ऊपर उद्धृत स्मत: शब्द के प्रयोग से यह साफ दिखाई देता है कि कुलपति के इस विशिष्टार्थग्रहण की परंपरा बड़ी पुरानी थी। कुलपति का साधारण अर्थ किसी कुल का स्वामी होता था। वह कुल या तो एक छोटा और अविभक्त परिवार हो सकता था अथवा एक बड़ा और कई छोटे छोटे परिवारों का समान उद्गम वंशकुल भी। अंतेवासी विद्यार्थी कुलपति के महान विद्यापरिवार का सदस्य होता था और उसके मानसिक और बौद्धिक विकास का उत्तरदायित्व कुलपति पर होता था; वह छात्रों के शारीरिक स्वास्थ्य और सुख की भी चिंता करता था। आजकल इस शब्द का प्रयोग विश्वविद्यालय के वाइसचांसलर के लिए किया जाता है।
- ↑ प्रसाद, कालिका (2000). बृहत हिन्दी कोश. वाराणसी भारत: ज्ञानमंडल लिमिटेड. प॰ 147.
- ↑ "महामना का स्वप्न". अभ्युदय.कॉम.
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gurukul poundha गुरुकुल पौंधा के लिये प्रवेश की योग्यता तथा नियम-मोटे अक्षरआयु- प्रवेश के समय प्रवेशार्थी की आयु न्यूनतम बारह वर्ष तथा अधिक से अधिक चौदह वर्ष हो। परन्तु विशेष परिसिथति में अन्य गुरुकुलों से अधीत प्रतिभावान एवं चरित्रवान छात्रों को योग्यता अनुसार कक्षाओं में प्रवेश दिया जा सकता है। स्वास्थ्य- प्रवेशार्थी की शारीरिक एवं मानसिक सिथति ठीक एवं स्वस्थ होनी चाहिए। प्रवेश परीक्षा- माता-पिता एवं अभिभावकों को अपने बालकों के प्रवेश के लिए आवेदन-पत्र आचार्य के पास भेजना चाहिए। आवेदन पत्र स्वीकृत होने पर प्रवेश परीक्षा ली जायेगी, जिसकी सूचना यथासमय दी जायेगी । छात्र की निर्धारित समय पर उपसिथति अनिवार्य होगी। प्रवेश के समय प्रवेशार्थी की उत्तीर्ण कक्षा में पढे़ हुए विषयोंं की सामान्य परीक्षा होगी। प्रवेशकाल- 20 मर्इ से 20 जून तक प्रवेश हेतु छात्रों की मौखिक तथा लिखित परीक्षा ली जाती है। इसमें उत्तीर्ण होने वाले छात्र प्रवेश की तिथि से अगि्रम 15 दिनों तक प्रवेश ले सकते हैं। तदुपरान्त आने वाले छात्र द्वारा दी गर्इ परीक्षा के परिणामस्वरुप प्रवेश योग्य नहीं समझे जायेंगे। विशेष परिसिथतिवश कार्यकारिणी के निर्णयानुसार प्रवेशकाल में परिर्वतन किया जा सकता हैं। जिसकी सूचना सार्वदेशिक, आर्यजगत, आर्षज्योति: आदि पत्रिकाओं में दी जायेगी। अनुमानित मासिक व्यय- 1. पालन-पोषण का न्यूनतम व्यय रु. 1000 प्रतिमास होता है जिसमें शुद्ध शाकाहरी, साविक एवं स्वादिष्ट भोजन उपलब्ध कराया जाता है। 2. ब्रह्राचारियों को आवश्यकतानुसार औषध, पथ्य तथा प्राथमिक चिकित्सा की सुविधा भी नि:शुल्क प्रदान की जाती है। रोग विशेष होने पर अभिभावक खर्च वहन करेंगे। 3. अभिभावकों को ब्रह्राचारियों की पुस्तकें, वस्त्र तथा भोजन, दूध, घी आदि का व्यय देना होगा। पठन-पाठन सम्बन्धी शिक्षा पूर्णत: नि:शुल्क रहेगी। प्रवेश के समय देय शुल्क- 1. प्रवेश शुल्क रु. 2000.00 2 वार्षिक भोजन शुल्क रु. 8000.00 3. धरोहर राशि रु. 1000.00 4. अन्य शुल्क रु. 1000.00
कुल योग रु. 12000.00
आर्ष न्यास की व्यवस्था के अनुसार महंगार्इ के कारण समयानुसार व्यय में वृद्धि की जा सकती है। वेश-भूषा- गुरुकुल के ब्रह्राचारियों की वेश-भूषा सफेद कुर्ता अथवा सफेद चादर एवं कटिवस्त्र होगी। यह वेशभूषा विधालय तथा छात्रावास दोनों में अनिवार्य है। आवश्यक-वस्त्र- ब्रह्राचारियों के दैनिक उपयोग के वस्त्र देना उनके अभिभावकों का उारदायित्व है। ये वस्त्र गुरुकुल के नियत गणवेश के अनुरुप होने आवश्यक हैं, जो निम्न हैं- कुर्ता-कटिवस्त्र 4 लंगोट 2 बनियान (सैण्डो) 2 तोलिया 1 दरी 1 खाकी नेकर 1 रजार्इ खोल सहित 1 गददा 1 चादर (ओढ़ने की) 2 बैडशीट 2 (गुलाबी, पीला, सफेद, क्रीम, कोर्इ एक प्लेन रंग) पात्र-एक थाली, दो कटोरी, दो चम्मच, एक गिलास। ब्रह्राचारी के दैनिक उपयोग के लिए लगभग „ लीटर स्टील का कमण्डल(डिब्बा) तथा एक बक्सा भी आवश्यक है।
विशेष- अभिभावकों को चाहिए कि वे ब्रह्राचारियों को घड़ी, अंगूठी, कड़ा, आदि आभूषण तथा नकद धन न दें। धन कार्यालय में जमा कराए।
अवकाश सम्बन्धी नियम- 1. विधालय में सामान्यत: अवकाश का कोर्इ प्रावधान नहीं है। 2. विशेष परिसिथतिवश प्रधानाचार्या जी की अनुमति से अवकाश प्रदान किया जा सकता है। 3. यदि कोर्इ ब्रह्राचारी अवकाश की समापित पर नियत समय पर उपसिथत नहीं होगा तो पच्चीस रुपये प्रतिदिन के हिसाब से अतिरिक्त धन देय होगा। सात दिन से अधिक अनुपसिथत रहने की अवस्था में ब्रह्राचारी को विधालय से पृथक कर दिया जायेगा। 4. आज्ञा के बिना घर जाने पर पुन: प्रवेश नहीं होगा। लना एवं पत्र व्यवहार- 1. अभिभावक को अपना तथा छात्र का हस्ताक्षरयुक्त पासपोर्ट सार्इज का छायाचित्र कार्यालय में जमा कराना होगा। 2. अभिभावक या उसके द्वारा अधिकृत व्यकित के अतिरिक्त अन्य कोर्इ व्यकित विधार्थी से नहीं मिल सकेगा। 3. अभिभावक महाविधालय, छात्रावास में सीधे न जाकर महाविधालय कार्यालय से अनुमति प्राप्त करके ही विधार्थी से मिल सकेंगे। 4. छात्र स्वेच्छा से सीधे रूप में कहीं भी पत्र व्यवहार नहीं कर सकेगा। 5. प्रत्येक मास के अनितम रविवार को दूरभाष पर सम्पर्क कर सकेंगे। अन्य दिनों में दूरभाष पर छात्र से वार्तालाप कराने का प्रावधान नहीं है। छात्र का विधालय से पृथक किया जाना- 6. यदि कोर्इ छात्र मन्दबुद्धि, किसी व्यसन (चोरी आदि) तथा संक्रामक रोग से युक्त होने के कारण गुरुकुल के अयोग्य समझा जायेगा तो वह पृथक कर दिया जायेगा। 7. जो छात्र प्रवेश होने के अनन्तर एक वर्ष तक निबर्ुद्धि समझा जायेगा, अथवा जो वार्षिक परीक्षा में लगातार दो वर्ष तक अनुाीर्ण होता रहेगा वह भी पृथक कर दिया जाएगा। 8. यदि कोर्इ छात्र आचारहीनता का दोषी होगा अथवा गुरुकुल के नियमों का उल्लंघन करता मिलेगा तो उसके दोषानुकूल उसको दणिडत किया जायेगा या वह गुरुकुल से पृथक करने योग्य समझा जायेगा तो उसे पृथक किया जा सकता है।
शाखा संस्थाओं में छात्रों का परिर्वतन- क) छात्र संख्या अधिक होने पर छात्र का परिर्वतन किया जा सकता है। ख) गुरुकुल के अति निकट ग्राम के छात्रों को अन्य संस्था में परिवर्तित किया जायेगा। ग) विशेष परिसिथति अनुसार परिर्वर्तन किया जा सकता है। उपयर्ुक्त सभी परिवर्तन का अधिकार आर्ष-न्यास को होगा। परिवर्तन से पूर्व अभिभावकों को सूचित किया जायेगा।
पाठयक्रम- आर्ष-न्यास अपनी सभी संस्थाओं में महर्षि दयानन्द द्वारा प्रतिपादित आर्ष परम्परा के अनुरूप प्राचीन व्याकरणादि सभी शास्त्रों की शिक्षा देता है, जिसकी मान्यता महर्षि दयानन्द विश्वविधालय रोहतक एवं श्रीमददयानन्द आर्ष विधापीठ से स्वीकृत है। अधिकारी परीक्षा आर्ष-न्यास स्वयं लेता है। मध्यमा से आगे की परीक्षाएँ विश्वविधालय लेता हैै। आर्ष-न्यास निम्नलिखित परीक्षाओं की व्यवस्था करता है- परीक्षा का नाम अवधि समकक्ष अधिकारी (प्रथमा) त्रिवार्षिक 6-7-8 पूर्व मध्यमा द्विवार्षिक 9-10 उत्तर मध्यमा द्विवार्षिक 11-12 शास्त्री त्रिवार्षिक बी.ए. आनर्स आचार्य द्विवार्षिक एम.ए.
आर्ष-न्यास अपनी संस्थाओं में महर्षि दयानन्द विश्वविधालय रोहतक से नीचे दिये गये विषयों की परीक्षा करने-कराने की व्यवस्था करता है- विषय-वेद, हिन्दी, गणित, योग, इतिहास, संस्कृतसाहित्य, भूगोल, विज्ञान, संस्कृतव्याकरण, वैदिक-सिद्धान्त, नागरिकशास्त्र, उपनिषद, अंग्रेजी, दर्शनशास्त्र, स्मृति, अलंकारशास्त्र, अर्थशास्त्र, छन्द:शास्त्र (संस्कृत), छन्द:शास्त्र (हिन्दी), निरुक्त आदि। आधुनिक ज्ञान-विज्ञान के संवाहक कम्पूटर शिक्षा का भी विशेष प्रबन्ध न्यास की संस्थाओं में किया जाता है। पठन-पाठन की रचनात्मकता- अध्ययन के प्रति छात्र की विशेष अभिरुचि जागृत करने के लिए अधीत विषयों के सिंहावलोकन के लिए मासिक एवं अद्र्धवार्षिक परीक्षा ली जाती है, जिसमें प्रत्येक छात्र को अनिवार्यरुपेण समिमलित होना होता है।
प्रकाशन अप्रकाशित तथा अनुपलब्ध दुर्लभ वैदिक वा³मय का प्रकाशन अत्यन्त अपरिहार्य कार्य है। ग्रन्थ ज्ञान के अत्यन्त एवं अनन्य साधन होते हुए ज्ञान की अक्षय निधि भी है। इस अक्षय निधि का निरन्तर मुद्रण एवं प्रकाशन हो यही इस विभाग का परम लक्ष्य है। गुरुकुल के विद्वान अध्यापकों तथा शोधकर्ताओं के उच्चतम विचारों को पुस्तकाकार प्रदान करना इस विभाग का प्रमुख उददेश्य है। जिससे समस्त विश्व के चिन्तनशील व्यकितयों तक वेद का ज्ञान पहुँच सके। आर्ष-न्यास ने इसी उददेश्य की पूर्ति के लिए आर्षसाहित्य संस्थान की स्थापना की है। इस संस्थान ने अब तक प्राचीन ऋषि-महर्षियों के दुर्लभ ग्रन्थों सहित लगभग 50 ग्रन्थों का प्रकाशन किया है । जिसमें वेद, उपनिषद, व्याकरण, संस्कृतसाहित्य, एवं महर्षि दयानन्द द्वारा रचित पुस्तके हैं।
सह शैक्षणिक प्रवृत्तियाँ
आर्ष-न्यास के छात्रों की प्रतिभा के बहुआयामी विकास के उददेश्य को लक्षित कर विविध सहशैक्षणिक प्रवृत्तियों का आयोजन करता है, जिनमें, निम्नलिखित प्रवृाियाँ मुख्य हैं।
वाग्वर्धिनी सभा- छात्रों में विशेषरुप से सम्भाषण, गायन, वाक्कला एवं सम्प्रेषण की क्षमता के संवर्धन के उददेश्य से वाग्वर्घिनी सभा की स्थापना आर्ष-न्यास की प्रत्येक संस्था में की गयी है। संयोजन, संचालन आदि कार्यों में छात्रों को निपुण बनाने के लिए उनकी विशेष भूमिका सिथत की जाती है। यह सब कार्य आचार्यों केे निर्देशन में स्वयं छात्र ही करते हैं। प्रतियोगिताएँ एवं पुरस्कार- आर्ष-न्यास मेधावी छात्रों कों विभिन्न प्रतियोगिताओं में भाग लेने हेतु उनकी विशेष सज्जा करवाता है तथा अपनी संस्थाओं के वार्षिकोत्सव आदि विशेष आयोजनों पर भाषण, गायन, लेखन एवं खेलकूद आदि प्रतियोगिताओं का आयोजन करता है, जिनमें योग्यतम स्थान प्राप्त छात्रों को तथा वार्षिक परीक्षा में अपनी कक्षाओं में प्रथम, द्वितीय स्थान प्राप्त करने वाले छात्रों को विशेष पुरस्कार प्रदान किया जाता हैं। संगोषिठयाँ- आर्ष-न्यास विभिन्न विषयों पर यथासमय संगोषिठयों का आयोजन करता है, जिसमें विशिष्ट विद्वानों के द्वारा जीवनोन्नतिकारक लोकप्रिय व्याख्यानों का संयोजन होता है। लेखन कला- आर्ष-न्यास छात्रों में लेखन कला को विकसित करने हेतु विभिन्न समयों पर छात्रों को प्रोत्साहित करता है, जिससे अनेक विशिष्ट पत्र-पत्रिकाओं में छात्रों की कृतियाँ प्रकाशित होती हैं। इसी उददेश्य के द्विगुणित विकास के लिए वर्तमान में आर्ष-ज्योति: नामक मासिक पत्रिका का प्रकाशन न्यास की शाखा गुरुकुल पौंधा, देहरादून से हिन्दी और संस्कृत भाषा में हो रहा है। जिसमें अध्यापकों, छात्रों, स्नातको तथा विद्वानों के विचार प्रकाशित होते हंै। प्रचार-प्रसार कार्य- आर्ष-न्यास कृण्वन्तो विश्वमार्यम अर्थात-सम्पूर्णसंसार को श्रेष्ठ बनाओं के विशाल उददेश्य को ध्यान मे रखते हुए यथासमय यज्ञ, वेदपाठ, व्याख्यान आदि के माध्यम से वैदिक सिद्धान्तों के प्रचार-प्रसार का प्रशंसनीय कार्य निरन्तर करता है। आर्ष-न्यास के स्नातक प्रचार-प्रसार का कार्य देश-विदेश में मनसा-वाचा-कर्मणा कर रहे हैं। देशाटन - आर्ष-न्यास छात्रों के ऐतिहासिक ज्ञान की उन्नति के लिए समय-समय पर विशेष भ्रमणों की व्यवस्था करता है, इन भ्रमणों से छात्र अपने सास्कृतिक, ऐतिहासिक एवं भौगोलिक परिवेश से परिचित होते हैं।