आचार्य गिरिराज किशोर

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आचार्य गिरिराज किशोर (4 फरवरी 1920 – 13 जुलाई 2014) विश्व हिन्दू परिषद के नेता थे। वे श्रीराम जन्मभूमि आन्दोलन के समय से ही परिषद् से जुड़ गये थे। गिरिराज किशोर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक रहे। श्रीराम जन्मभूमि आन्दोलन में उनकी प्रमुख भूमिका थी।[1] नई दिल्ली स्थित विहिप मुख्यालय में उन्होंने लगभग साढ़े 94 वर्ष की आयु में 13 जुलाई, 2014 को प्राण त्यागे।[2] आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन करने वाले आचार्य गिरिराज किशोर ने देहदान का संकल्प बहुत पहले ही कर लिया था ताकि उनकी मृत्यु के बाद भी उनका शरीर किसी के काम आ सके।[3]

परिचय[संपादित करें]

आचार्य गिरिराज किशोर का जन्म 4 फरवरी, 1920 को एटा, उ.प्र. के मिसौली गांव में श्री श्यामलाल एवं श्रीमती अयोध्यादेवी के घर में मंझले पुत्र के रूप में हुआ। हाथरस और अलीगढ़ के बाद उन्होंने आगरा से इंटर की परीक्षा उत्तीर्ण की। आगरा में श्री दीनदयाल जी और श्री भव जुगादे के माध्यम से वे स्वयंसेवक बने और फिर उन्होंने संघ के लिए ही जीवन समर्पित कर दिया।

प्रचारक के नाते आचार्य जी मैनपुरी, आगरा, भरतपुर, धौलपुर आदि में रहे। 1948 में संघ पर प्रतिबंध लगने पर वे मैनपुरी, आगरा, बरेली तथा बनारस की जेल में 13 महीने तक बंद रहे। वहां से छूटने के बाद संघ कार्य के साथ ही आचार्य जी ने बी.ए तथा इतिहास, हिन्दीराजनीति शास्त्र में एम.ए. किया। साहित्य रत्न और संस्कृत की प्रथमा परीक्षा भी उन्होंने उत्तीर्ण कर ली। 1949 से 58 तक वे उन्नाव, आगरा, जालौन तथा उड़ीसा में प्रचारक रहे।

इसी दौरान उनके छोटे भाई वीरेन्द्र की अचानक मृत्यु हो गयी। ऐसे में परिवार की आर्थिक दशा संभालने हेतु वे भिण्ड (म.प्र.) के अड़ोखर कॉलेज में सीधे प्राचार्य बना दिये गये।

आचार्य जी की रुचि सार्वजनिक जीवन में देखकर उन्हें अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और फिर संगठन मंत्री बनाया गया। नौकरी छोड़कर वे विद्यार्थी परिषद को सुदृढ़ करने लगे। उनका केन्द्र दिल्ली था। उसी समय दिल्ली वि0वि0 में पहली बार विद्यार्थी परिषद ने अध्यक्ष पद जीता। फिर आचार्य जी को जनसंघ का संगठन मंत्री बनाकर राजस्थान भेजा गया। आपातकाल में वे 15 मास भरतपुर, जोधपुर और जयपुर जेल में रहे।

1979 में मीनाक्षीपुरम कांड ने पूरे देश में हलचल मचा दी। वहां गांव के सभी 3,000 हिन्दू एक साथ मुसलमान बने। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इससे चिंतित होकर डा0 कर्णसिंह को कुछ करने को कहा। उन्होंने संघ से मिलकर ‘विराट हिन्दू समाज’ नामक संस्था बनायी। संघ की ओर से श्री अशोक सिंहल और आचार्य जी इस काम में लगे। दिल्ली तथा देश के अनेक भागों में विशाल कार्यक्रम हुए; पर धीरे-धीरे संघ के ध्यान में आया कि डा. कर्णसिंह और इंदिरा गांधी इससे अपनी राजनीति साधना चाहते हैं। अतः संघ ने हाथ खींच लिया। ऐसा होते ही वह संस्था भी ठप्प हो गयी। इसके बाद अशोक जी और आचार्य जी को विश्व हिन्दू परिषद के काम में लगा दिया गया।

1980 के बाद इन दोनों के नेतृत्व में परिषद ने अभूतपूर्व काम किये। संस्कृति रक्षा योजना, एकात्मता यज्ञ यात्रा, राम जानकी यात्रा, रामशिला पूजन, राम ज्योति अभियान, राममंदिर का शिलान्यास और फिर छह दिसम्बर को बाबरी ढांचे के ध्वंस आदि ने विश्व हिन्दू परिषद को नयी ऊंचाइयां प्रदान कीं। आज विश्व हिन्दू परिषद गोरक्षा, संस्कृत, सेवा कार्य, एकल विद्यालय, बजरंग दल, दुर्गा वाहिनी, पुजारी प्रशिक्षण, मठ-मंदिर व संतों से संपर्क, परावर्तन आदि आयामों के माध्यम से विश्व का सबसे प्रबल हिन्दू संगठन बन गया है।

विश्व हिन्दू परिषद के विभिन्न दायित्व निभाते हुए आचार्य जी ने इंग्लैंड, हालैंड, बेल्जियम, फ्रांस, स्पेन, जर्मनी, रूस, नार्वे, स्वीडन, डेनमार्क, इटली, मारीशस, मोरक्को, गुयाना, नैरोबी, श्रीलंका, नेपाल, भूटान, सिंगापुर, जापान, थाइलैंड आदि देशों की यात्रा की है। वृद्धावस्था में अनेक रोगों से घिरे होने पर भी उनकी सक्रियता बनी है।

निधन[संपादित करें]

13 जुलाई 2014 को 96 साल की उम्र में निधन हो गया। विश्व हिन्दू परिषद के आरके पुरम, दिल्ली स्थित मुख्यालय में रात 9:15 बजे अंतिम सांस ली थी। उनके निधन पर विहिप और भाजपा नेताओं ने शोक जताया।[4][5]

सन्दर्भ[संपादित करें]