केशव बलिराम हेडगेवार
| डा० केशवराव बलिराम हेडगेवार | |
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डा० केशवराव बलिराम हेडगेवार (१८८९-१९४०)
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| जन्म | 1 अप्रैल 1889 नागपुर महाराष्ट्र भारत |
| मृत्यु | जून 21, 1940 (aged 51) नागपुर महाराष्ट्र भारत |
डा० केशवराव बलिराम हेडगेवार (अंग्रेजी: Dr. K. B. Hedgewar, मलयालम: കെ. ബി. ഹെഡ്ഗേവാർ, मराठी: केशव बळीराम हेडगेवार, तेलुगू: కె. బి. హెడ్గేవార్, जन्म: १ अप्रैल, १८८९ - मृत्यु: २१ जून, १९४०) राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक एवं प्रकाण्ड क्रान्तिकारी थे।[1] उनका जन्म हिन्दू वर्ष प्रतिपदा के दिन हुआ था। यह दिन महाराष्ट्र में गुढ़ी पड़वा के रूप में मनाया जाता है।[2] नव-वर्ष आरम्भ होने के कारण यह दिन बड़ा शुभ माना जाता है। घर से कलकत्ता गये तो थे डाक्टरी पढने परन्तु वापस आये उग्र क्रान्तिकारी बनकर। कलकत्ते में श्याम सुन्दर चक्रवर्ती के यहाँ रहते हुए बंगाल की गुप्त क्रान्तिकारी संस्था अनुशीलन समिति के सक्रिय सदस्य बन गये। सन् १९१६ के कांग्रेस अधिवेशन में लखनऊ गये। वहाँ संयुक्त प्रान्त (वर्तमान यू०पी०) की युवा टोली के सम्पर्क में आये। बाद में कांग्रेस से मोह भंग हुआ और नागपुर में संघ की स्थापना कर डाली। मृत्युपर्यन्त सन् १९४० तक वे इस संगठन के सर्वेसर्वा रहे।
अनुक्रम |
[संपादित करें] संक्षिप्त जीवन परिचय
डॉ. हेडगेवार का जन्म १ अप्रैल, १८८९ को महाराष्ट्र के नागपुर जिले में पण्डित बलिराम पन्त हेडगेवार के घर हुआ था। इनकी माता का नाम रेवतीबाई था। माता-पिता ने पुत्र का नाम केशव रखा। केशव का बड़े लाड़-प्यार से लालन-पालन होता रहा। उनके दो बड़े भाई भी थे, जिनका नाम महादेव और सीताराम था। पिता बलिराम वेद-शास्त्र के विद्वान थे एवं वैदिक कर्मकाण्ड (पण्डिताई) से परिवार का भरण-पोषण चलाते थे। स्वामी दयानन्द सरस्वती के अनुयायी व आर्य समाज में निष्ठा होने के कारण उन्होंने अग्निहोत्र का व्रत लिया हुआ था। परिवार में नित्य वैदिक रीति से सन्ध्या-हवन होता था।
[संपादित करें] बडे भाई से प्रेरणा
केशव के सबसे बड़े भाई महादेव भी शास्त्रों के अच्छे ज्ञाता तो थे ही मल्ल-युद्ध की कला में भी बहुत माहिर थे। वे रोज अखाड़े में जाकर स्वयं तो व्यायाम करते ही थे गली-मुहल्ले के बच्चों को एकत्र करके उन्हें भी कुश्ती के दाँव-पेंच थे। महादेव भारतीय संस्कृति और विचारों का बड़ी सख्ती से पालन करते थे। केशव के मानस-पटल पर बडे भाई महादेव के विचारों का गहरा प्रभाव था। किन्तु वे बडे भाई की अपेक्षा बाल्यकाल से ही क्रान्तिकारी विचारों के थे। जिसका परिणाम यह हुआ कि वे डॉक्टरी पढ़ने के लिये कलकत्ता गये और वहाँ से उन्होंने कलकत्ता मेडिकल कॉलेज से प्रथम श्रेणी में डॉक्टरी की परीक्षा भी उत्तीर्ण की; परन्तु घर वालों की इच्छा के विरुद्ध देश-सेवा के लिए नौकरी का प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया। [2]
[संपादित करें] क्रान्ति का बीजारोपण
कलकत्ते में पढाई करते हुए उनका मेल-मिलाप बंगाल के क्रान्तिकारियों से हुआ। केशव चूँकि कलकत्ता में अपने बडे भाई महादेव के मित्र श्याम सुन्दर चक्रवर्ती[3] के घर रहते थे अत: वहाँ के स्थानीय लोग उन्हें केशव चक्रवर्ती के नाम से ही जानते व सम्बोधित करते थे। उनकी असाधारण योग्यता को मद्देनजर रखते हुए उन्हें पहले अनुशीलन समिति का साधारण सदस्य बनाया गया। उसके बाद जब वे कार्यकुशलता की कसौटी पर खरे उतरे तो उन्हें समिति का अन्तरंग सदस्य भी बना लिया गया। इस प्रकार क्रान्तिकारियों की समस्त गतिविधियों का ज्ञान और संगठन-तन्त्र कलकत्ते से सीखकर वे नागपुर लौटे।[1]
[संपादित करें] कांग्रेस और हिन्दू महासभा में भागीदारी
सन् १९१६ के कांग्रेस अधिवेशन में लखनऊ गये। वहाँ संयुक्त प्रान्त (वर्तमान यू०पी०) की युवा टोली के सम्पर्क में आये। बाद में आपका कांग्रेस से मोह भंग हुआ और नागपुर में संघ की स्थापना कर डाली।
लोकमान्य तिलक की मृत्यु के बाद केशव कॉग्रेस और हिन्दू महासभा दोनों में काम करते रहे। गांधीजी के अहिंसक असहयोग आन्दोलन और सविनय अवज्ञा आन्दोलनों में भाग लिया, परन्तु ख़िलाफ़त आंदोलन की जमकर आलोचना की। ये गिरफ्तार भी हुए और सन् १९२२ में जेल से छूटे। नागपुर में १९२३ के दंगों के दौरान इन्होंने डॉक्टर मुंजे के साथ सक्रिय सहयोग किया। अगले साल सावरकर के पत्र हिन्दुत्व का संस्करण निकला जिसमें इनका योगदान भी था। इसकी मूल पांडुलिपि इन्हीं के पास थी[4]।
[संपादित करें] व्यक्तित्व व कृतित्व
डॉ.साहब ऐसे व्यक्ति थे, जिन्होंने व्यक्ति की क्षमताओं को उभारने के लिये नये-नये तौर-तरीके विकसित किये। हालांकि प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की असफल क्रान्ति और तत्कालीन परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए उन्होंने एक अर्ध-सैनिक संगठन की नींव रखी।[5] १९२५ को दशहरे के दिन इन्होने नागपुर मे राष्टीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की। इन्होंने भारत की गुलामी के कारणों को बडी बारीकी से पहचाना और इसके स्थाई समाधान हेतु संघ कार्य प्रारम्भ किया। इन्होंने सदैव यही बताने का प्रयास किया कि नई चुनौतियों का सामना करने के लिए हमें नये तरीकों से काम करना पड़ेगा और स्वयं को बदलना होगा, अब ये पुराने तरीके काम नहीं आएंगे।[2] डॉ.साहब १९२५ से १९४० तक, यानि मृत्यु पर्यन्त राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक रहे। २१ जून,१९४० को इनका नागपुर में निधन हुआ। इनकी समाधि रेशम बाग नागपुर में स्थित है, जहाँ इनका अंत्येष्टि संस्कार हुआ था।
[संपादित करें] संदर्भ
- ↑ 1.0 1.1 संघ का इतिहास-प्रस्तावना आर्कीव्स ऑफ आर.एस.एस. पर
- ↑ 2.0 2.1 2.2 डॉ.हेडगेवार एक पुस्तक, लेखक:विनोद तिवारी| ३ फरवरी,२००४| मनोज प्रकाशन
- ↑ डा० मदनलाल वर्मा 'क्रान्त' स्वाधीनता संग्राम के क्रान्तिकारी साहित्य का इतिहास (भाग-दो) २००६ प्रवीण प्रकाशन नई दिल्ली पृष्ठ ४६० ISBN 8177831208
- ↑ यह राष्ट्रीयता की कसौटी नहीं है? जनसत्ता, प्रभाष जोशी, १० सितंबर, २००६
- ↑ के.एन.गोविन्दाचार्य भारतीय पक्ष पर
[संपादित करें] बाहरी कड़ियाँ
- आधिकारिक आर.एस.एस. का जालस्थल
- स्वयंसेवकों की स्वयंसेवकों द्वारा वेबसाइट-SanghParivar.org
- भारत पर्यन्त आरएसएस शाखा के सदस्य बनने हेतु संपर्क-SanghParivar.org
- डॉ.हेडगेवार की जीवनी. http://archivesofrss.org/index.php?option=com_biographies&Itemid=37/.
| पूर्वाधिकारी (कोई नहीं) |
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक १९२५ – १९४० |
उत्तराधिकारी माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर |
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