हिंदू रसायन का इतिहास

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हिन्दू रसायन का इतिहास (A history of Hindu chemistry from the earliest times to the middle of the sixteenth century, A.D) , आचार्य प्रफुल्ल चन्द्र राय द्वारा रचित इतिहास ग्रन्थ है जिसमें भारतीय रसायन विज्ञान के इतिहास का विशद वर्णन है।

'द हिस्ट्री ऑफ हिंदू कैमिस्ट्री' एक ऐसी पुस्तक है जो पेशे से रसायनज्ञ सर प्रफुल्ल चन्द्र राय द्वारा लिखी गई है। यद्यपि वे रसशास्त्र के क्षेत्र में गलती से आ गये थे, लेकिन उन्होंने ईमानदारी से काम किया ताकि विषय से पूर्ण न्याय हो सके। अतः इस विषय के लगभग सभी क्षेत्रों को समेटते हुए उन्होंने अपनी पुस्तक को १२ वर्ष की अवधि में पूर्ण किया और दो खंडों में प्रकाशित किया। पुस्तक तर्कसंगत विचारों, वैज्ञानिक विश्लेषण और स्वदेशी विचारों से समृद्ध है। पहले भाग के परिशिष्ट में दिए गए आठ यंत्रों के चित्रों का अपना महत्व है। चूंकि पुस्तक अंग्रेजी में लिखी गई थी, इसलिए सभी तरह के लोगों ने इसका स्वागत किया और यह शीघ्र ही लोकप्रिय बन गयी। इसके द्वारा आचार्य प्रफुल्ल चन्द्र रसशास्त्र की ओर दुनिया का ध्यान आकृष्ट करने में सक्षम रहे। यदि यह कहा जाय कि इस ग्रन्थ के प्रकाश्न के बाद रसशास्त्र की अवधारणाओं का वैश्वीकरण शुरू हुआ तो यह अतिशयोक्ति नहीं होगी। हालांकि यह लगभग एक शताब्दी से अधिक पुरानी है किन्तु आज भी इसका महत्व बना हुआ है।

इतिहास[संपादित करें]

प्रेसीडेंसी कालेज में कार्य करते हुए आचार्य प्रफुल्ल चन्द्र राय को तत्कालीन महान फ्रांसीसी रसायनज्ञ बर्थेलो की पुस्तक "द ग्रीक एल्केमी" पढ़ने को मिली। तुरन्त उन्होंने बर्थेलो को पत्र लिखा कि भारत में भी अति प्राचीनकाल से रसायन की परम्परा रही है। बर्थेलो के आग्रह पर आचार्य ने मुख्यत: नागार्जुन की पुस्तक "रसेन्द्रसारसंग्रह" पर आधारित प्राचीन हिन्दू रसायन के विषय में एक लम्बा परिचयात्मक लेख लिखकर उन्हें भेजा। बर्थेलाट ने इसकी एक अत्यंत विद्वत्तापूर्ण समीक्षा "जर्नल डे सावंट" में प्रकाशित की, जिसमें आचार्य राय के कार्य की भूरि-भूरि प्रशंसा की गई थी। इससे उत्साहित होकर आचार्य ने अंततः अपनी प्रसिद्ध पुस्तक "हिस्ट्री ऑफ हिन्दू केमिस्ट्री" का प्रणयन किया जो विश्वविख्यात हुई और जिनके माध्यम से प्राचीन भारत के विशाल रसायन ज्ञान से समस्त संसार पहली बार परिचित होकर चमत्कृत हुआ। स्वयं बर्थेलाट ने इस पर समीक्षा लिखी जो "जर्नल डे सावंट" के १५ पृष्ठों में प्रकाशित हुई।

विशेषताएँ[संपादित करें]

इस ग्रन्थ में आचार्य ने यह प्रदर्शित किया है कि हिन्दुओं के रसायन-सम्बन्धी विचार बहुत प्राचीन काल में ही दूर-दूर तक फैल चुके थे। आचार्य ने यत्र-तत्र इस ग्रन्थ में दोहराया है कि रसार्णव को भारत की अमूल्य निधि समझना चाहिए। [1] इस ग्रन्थ में तत्कालीन रॉयल क्लासिकल इंग्लिश का उपयोग किया है।

आचार्य ने इस ग्रन्थ में इस ग्रन्थ में यूरोपीय विद्वानों की इस बात के लिए कटु आलोचना की है कि उन्होने प्राचीन भारतीय विज्ञान को बड़े पक्षपातपूर्ण ढँग से अध्ययन किया है-

It is curious to reflect that language is concerned. These writings are extracts from his the upholders of the 'Greek culture' are often found ready , elaborated book 'The Positive Sciences of the Hindus' or , it is though unconsciously , to twist and torture facts and quite a possibility that the book was written later elaborately . conclusions to serve their own purpose, and reserve to themselves the benefit of doubt as regards date; but whenever the priority of the Hindus is unquestionable, an appeal is made to the theory of common origin and The knowledge of the author in the field of Chemistry seems independent parallelism of growth.

आचार्य ने इस ग्रन्थ में बर्थेलो, ब्लूमफील्ड, कोलब्रूक और गोब्ले आदि के अनुच्छेदों को उद्धृत किया है (बिना उनका अनुवाद दिए)।

पुस्तक दूसरे भाग में प्रधानाचार्य ब्रजेन्द्र नाथ सील के पेपर हैं जिनमें उन्होने प्राचीन हिन्दुओं के यन्त्र-सम्बन्धी, भौतिक और रासायनिक सिद्धान्तों का विवरण दिया है। ये पेपर एक तरह से उनके 'द पॉजिटिव साइन्सेस ऑफ हिन्दूज' के सार अंश हैं।

रसार्णव अन्य रसशास्त्रों पर आचार्य प्रफुल्ल चन्द्र राय के विचार[संपादित करें]

  • (१) रसार्णव, भारतीय किमियागारी का प्रथम 'पूर्ण' ग्रन्थ है। इस ग्रन्थ को भारत की अमूल्य निधि समझा जाना चाहिए।
  • (२) रसार्णव के रचनाकार ने एक स्थान पर ताम्र को स्वर्ण समझने की गलती की है। (रसार्णव ७/३१-३२)
  • (३) आचार्य ने बताया है कि रसार्णव में ज्वाला के रंग के द्वारा पदार्थ की पहचान करने की विधि का वर्णन है।
ताँबा नीली लौ देता है, टिन से कबूतर के रंग की ज्वाला निकलती है, सीसा से हल्के पीले रंग की ज्वाला निकलती है।

आचार्य ने यह विशेष टिप्पणी की है कि, हमारी जानकारी में इतना पहले, किसी अन्य भूभाग पर, धातुओं के गुणात्मक परीक्षण (क्वालिटेटिव टेस्ट) के लिए इस प्रकार की विधि का प्रयोग नहीं किया है। [2]

  • (४) भारतीयों ने ही सबसे पहले 'रसक' (कैलेमाइन) नामक अयस्क से जस्ते के निष्कर्षण की विधि बतलायी थी। रसरत्नसमुच्चय में वर्णित यह विधि इतनी वैज्ञानिक है कि रसायन विज्ञान के किसी भी आधुनिक ग्रन्थ में इसे ज्यों-का-त्यों उद्धृत किया जा सकता है।
  • (५) भारतीयों को उर्ध्वपातन, आसवन आदि प्रक्रमों तथा उनके लिए आवश्यक यन्त्रों का विस्तृत ज्ञान था। आचार्य ने कहा है कि इनका आविष्कारा नागार्जुन ने किया था। उन्होने निम्नलिखित अंश को उदृत किया है।
चूंकि पारद, टिन और सीसा से मिश्रित हो जाता है, इन अशुद्धियों को दूर करने के लिए पारद का तीन बार आसवन करना चाहिए।
लेकिन आयुर्वेद में यह अन्तर साफ-साफ वर्णित है। सुश्रुत ने पोटैशियम कार्बोनेट का नाम 'यव क्षार' दिया है जबकि सोडियम कार्बोनेट का नाम 'सर्जिका क्षार' दिया है।
  • (७) सुश्रुत ने अल्कली के निर्माण, उनमें चूना मिलाकर उन्हें कास्टिक बनाने एवं कास्टिक अल्कली को संरक्षित रखने के लिए लोहे के पात्रों में रखने का सुझाव दिया है। इस पर आचार्य राय ने टिप्पणी की है कि-
इस विधि को आप १६वीं और १७वीं शताब्दी तक के यूरोपीय ग्रन्थों में खोजेंगे तो निराशा ही हाथ लगेगी। और, सुश्रुत द्वारा दी गयी विधि इतनी वैज्ञानिक है कि उसे रसायन विज्ञान की किसी आधुनिक पुस्तक में पूरा का पूरा, ज्यों-का-त्यों डाला जा सकता है।
  • (८) आचार्य राय ने रसेन्द्रचूडामणि से एक श्लोक उद्धृत किया है और बताया है कि प्राचीन भारतीय लोग प्रयोग करने को कितना महत्वपूर्ण मानते थे-
उनको ही असली गुरु मानना चाहिए जो प्रयोग करके दिखा सकें, जो कुछ वे पढ़ा रहे हैं। और, वे ही असली शिष्य हैं जो गुरु द्वारा बताए गए प्रयोग को स्वयं कर सके। शेष सभी गुरु और शिष्य तो केवल अभिनय कर रहे हैं।[3]

विषयसूची[संपादित करें]

पुस्तक दो भागों में है। प्रथम भाग ७ अध्यायों में विभक्त है तथा प्रत्येक अध्याय अनेकों उप-अध्यायों में।

भाग १[संपादित करें]

Preface to the first edition
Written by P.C. Ray on the first of May 1902
Preface to the second edition
Written by P.C. Ray on the first of January 1904
Table of Contents
Introduction
Chapter 1: Alchemical ideas in the Vedas
Chapter 2: The Ayurvedic Period
Chapter 3: The Transitional Period
Chapter 4: The Tantric Period
Chapter 5: The Iatro-chemical Period
Chapter 6: Indebtedness of the Arabians to India
The A yurvedic period
(From Pre-Buddhistic Era to circa 800 A.D.)
Chapter 1: The constitution and properties of Matter; The Atomic Theory
Chapter 2: Chemistry in the Charaka and the Susruta
Chapter 3: Chemistry in the Bower Mss.
Chapter 4: Chemistry in the Vagbhata
The Transitional period
(From 800 A.D. to circa 1100 A.D.)
Chapter 1: Chemistry in the Siddhayoga of Vrinda (circa 900 A.D.)
Chapter 2: Chemistry in Chakrapani (circa 1060 A.D.)
The Tantric period
(From 1100 A.D. to circa 1300 A.D.)
Chapter 1: Chemistry in Rasarnava
The latro-chemical period
(From 1300 A.D. to circa 1550 A.D.)
Chapter 1: Chemistry in Rasaratna Samucchaya
Notes
Alum and Green Vitriol
Metals and Metallurgy
Zinc
Calamine the Vitriols Blue Vitriol
Gun powder, Saltpeter and the Mineral Acids
Knowledge of technical arts and decline of scientific spirit
The wastage of Gold during the course of preparing jewelry in Bengal
The Salts
Killing of metals
The Hindu method of preparing Calomel
Appendices
Appendix 1: Analysis of some preparations used in the Hindu Medicine
Appendix 2: Illustrations
Indices
Index 1: Proper Names
Index 2: Subjects
Sanskrit texts
Extracts from Vrinda
Rasarnava
Rasaratna Samucchaya

भाग-२[संपादित करें]

Preface
Written by P.C.Ray on the first of June 1909
Preface
Written by B.N.Seal on the twenty third of May 1909
Introduction
Chapter 1: On the age of Nagarjuna and Buddhist Alchemical Tantras
Chapter 2: Further cultivation of Alchemy
Chapter 3: Circa 1350 A.D.
Chapter 4: Modern Period (1500 A.D. to 1600 A.D.)
Chapter 5: Indigenous origin of Indian Alchemy
Chapter 6: Some noted Indian Alchemists and their works
The Tantric period
(Continued from Volume 1)
Chemistry in Rasaratnakara of Nagarjuna to Chemistry in Swarnatantra (14 texts)
  • Knowledge of Gems
  • Note on method of preparing Caustic Alkali
  • The Tantrists, the Rosicrucians and the seekers after Truth
  • The Metals and their Loss in Weight after Calcination
  • Antimony
  • The preparation known as Swarna Sindura or Makaradhwaja
  • Identification of Metals by their colouration of flames
  • The age of Bhikshu Govinda, the author of Rasahridaya
The mechanical, physical and chemical theories of the ancient hindus
(By Principal B.N.Seal)
  • The Sankhya Patanjali System
  • Chemistry in the medical schools of ancient India
  • Weights and Measures o Vedantic System
  • The Atomic theory of the Buddhists
  • The Atomic theory of the Jains
  • The Nyaya Vaisheshika chemical theory
  • Conception of Molecular motion
The date of rasaratna samucchaya
(By P.C. Ray quoting an extract from the article of Mr.T.G.Kala, editor of Marathi journal 'Samalochaka' which contained a critical notice of Rasaratna Samucchaya)
The weight of air (By Principal B.N.Seal)
Appendix
The Hindu doctrine of scientific method (By Principal B.N.Seal)
Addenda
Empirical recipes of Chemical Technology (By Principal B.N.Seal)
Errata
Sanskrit texts
Extracts from fourteen texts namely, Rasaratnakara, Rasahridaya, Kakachandishwari Tantra, Rasendra Chudamani, Rasaprakasha Sudhakara, Rasendra Chintamani, Rasakalpa, Rasarajalakshmi, Rasanakshatra Malika, Rasaratnakara of Nityanatha, Dhaturatnamala, Rasapradipa, Dhatukriya and Swarnatantra.
Indices
Index 1: Proper Names
Index 2: Subjects

सन्दर्भ[संपादित करें]

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]