स्वाधिष्ठान चक्र

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स्वाधिष्ठान चक्र तंत्र और योग साधना की चक्र संकल्पना का दूसरा चक्र है। स्व का अर्थ है आत्मा। यह चक्र त्रिकास्थि (पेडू के पिछले भाग की पसली) के निचले छोर में स्थित होता है। इसका मंत्र वम (ङ्क्ररू) है।

विषेशता[संपादित करें]

स्वाधिष्ठान चक्र मानव के विकास के दूसरे स्तर का द्योतक है। इसी में चेतना की शुद्ध, मानव चेतना की ओर उत्क्रांति का प्रारंभ होता है। यह अवचेतन मन का वह स्थल है जहां हमारे अस्तित्व के प्रारंभ में गर्भ से सभी जीवन अनुभव और छायाएं जमा रहती हैं। स्वाधिष्ठान चक्र की जाग्रति स्पष्टता और व्यक्तित्व में विकास लाती है।

प्रतीक[संपादित करें]

  • स्वाधिष्ठान चक्र का प्रतीकात्मक चित्र ६ पंखुडिय़ों वाला कमल है। ये पंखुड़ियाँ ६ मनोविकारों- क्रोध, घृणा, वैमनस्य, क्रूरता, अभिलाषा और गर्व के संकेतक हैं जिनपर साधक को विजय पाना होता है। ये व्यक्ति के विकास में बाधक छः गुणों- आलस्य, भय, संदेह, प्रतिशोध, ईर्ष्या और लोभ के भी संकेतक हैं।
  • स्वाधिष्ठान चक्र का प्रतीक पशु मगरमच्छ है। यह सुस्ती, भावहीनता और खतरे का प्रतीक है जो इस चक्र में छिपे हैं।
  • इस चक्र का अनुरूप तत्त्व जल है , यह भी छुपे हुए खतरे का प्रतीक है।
  • इस चक्र का देवता ब्रह्मा और सरस्वती हैं।
  • स्वाधिष्ठान का रंग संतरी है।सूर्योदय का यह रंग उदीयमान चेतना का प्रतीक है। संतरी रंग सक्रियता और शुद्धता का भी रंग है। यह सकारात्मक गुणों का प्रतीक है और इस चक्र में प्रसन्नता, निष्ठा, आत्मविश्वास और ऊर्जा जैसे गुण पैदा होते हैं।[1]

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

  1. मूलाधार चक्र
  2. स्वाधिष्ठान चक्र
  3. मणिपुर चक्र
  4. अनाहत चक्र
  5. विशुद्धि चक्र
  6. आज्ञा चक्र
  7. बिंदु चक्र
  8. सहस्रार चक्र

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]

संदर्भ[संपादित करें]