समुच्चय (गणित)

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ऑयलर आरेख में समुच्चय का उदाहरण

समुच्चय अवयवों अथवा सदस्यों के रूप में गणितीय वस्तुओं के सुपरिभाषित समूह या संग्रह निर्माण हेतु गणितीय ‌‌‌‌‌‌‌‌मॉडल है। परिभाषा के रूप में वस्तुओं के उस समूह अथवा समाहार को समुच्चय कहते हैं जिसमें सम्मिलित प्रत्येक वस्तु किसी गुण विशेष को सन्तुष्ट करती हो जिसके आधार पर स्पष्ट रूप से यह बताया जा सके कि अमुक वस्तु उस संग्रह में सम्मिलित है अथवा नहीं है।[1] उदाहरणतः किसी विद्यालय में कक्षाओं को विद्यार्थियों के समुच्चय के रूप में कहा जा सकता है।

समुच्चय सिद्धान्त का विकास जर्मन गणितज्ञ गेऔर्ग काण्टॉर द्वारा किया गया था। त्रिकोणमितीय श्रेणी के प्रश्नों को हल करते समय उनका समुच्चय से परिचय हुआ।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि[संपादित करें]

जर्मन गणितज्ञ गेऔर्ग काण्टॉर को आधुनिक समुच्चय सिद्धान्त के अधिकांश भाग का जन्मदाता माना जाता है। समुच्चय सिद्धात पर उनके शोध पत्र 1874 से 1897 ई. के बीच के किसी समय में प्रकाश में आए। उनका समुच्चय सिद्धान्त का अध्ययन उस समय हुआ जब वे के रूप की त्रिकोणमितीय श्रेणी का अध्ययन कर रहे थे।

1874 में अपने एक शोध पत्र में यह प्रकाशित किया कि वास्तविक संख्याओं को पूर्णांकों के साथ एक से एक सामंजस्य में नहीं रखा जा सकता है। 1879 के उत्तरार्ध में अमूर्त समुच्चयों के विभिन्न गुणधर्मो को दर्शाने वाले उनके अनेक शोध पत्र प्रकाशित हुए।

काण्टॉर के शोध को एक अन्य विख्यात गणितज्ञ रिचर्ड डेडकिण्ड ने प्रशंसनीय ढंग से स्वीकार किया। परन्तु लियोपोल्ड क्रोनेकर ने अपरिमित समुच्चयों को, उसी प्रकार से लेने के लिए जिस प्रकार परिमित समुच्चयों को लिया जाता है, उनकी भर्त्सना की। एक दूसरे जर्मन गणितन गॉट्लोब फ़्रेग ने शताब्दी की समाप्ति पर समुच्चय सिद्धान्त को तर्कशास्त्र के नियमों के रूप में प्रस्तुत किया। उस समय तक सम्पूर्ण समुच्चय सिद्धान्त सभी समुच्चयों के समुच्चय के अस्तित्व को कल्पना पर आधारित था। यह विख्यात अंग्रेज़ दार्शिनिक बर्ट्रण्ड रसल थे जिन्होंने 1902 ई में बतया कि सभी समुच्चयों के समुच्चय के अस्तित्व की कल्पना एक विरोधोक्ति को जन्म देती है। इस प्रकार रसल की विख्यात विरोधोक्ति मिली। पौल हाल्मोस ने इसके चारे में अपनी पुस्तक ‘नाईव समुच्चय सिद्धान्त' में लिखा है कि "कुछ नहीं में सब कुछ समाहित हैं"।

इन सभी विरोधोक्तियों के परिणामस्वरूप समुच्चय सिद्धान्त का प्रथम अभिगृहीतीकरण 1908 में ऐर्न्स्ट त्सर्मेलो द्वारा प्रकाशित किया गया। 1922 में अब्राहम फ़्रैंकल ने एक दूसरा प्रस्ताव भी दिया। 1925 में जॉन वॉन नॉय्मन ने नियमितीकरण का अभिगृहीत स्पष्ट रूप से प्रस्तुत किया। इसके बाद 1937 में पौल बर्नेस ने सन्तोषजनक अभिगृहीतकरण प्रस्तुत किया। इन अभिगृहीतों में सुधार, कुर्ट गूडल द्वारा 1940 में अपने मोनोग्राफ में प्रस्तुत किया गया। इस सुधार को वॉन नॉय्मन-बर्नेस-गूडल समुच्चय सिद्धान्त कहते हैं।

इन सभी काठिन्यों के बावजूद, काण्टॉर के समुच्चय सिद्धान्त को वर्तमान काल के गणित में प्रयोग किया जाता है। वास्तव में आजकल गणित के अधिकांश संकल्पनाएँ तथा परिणामों को समुच्चय सैद्धान्तिक भाषा में प्रस्तुत करते हैं।

मौलिक अवधारणाएँ और अंकन[संपादित करें]

समुच्चयों और उनके अवयवों को क्रमशः रोमन वर्णमाला के बड़े अक्षरों, जैसे A, B, C आदि और छोटे अक्षरों, जैसे a, b, c आदि से निरूपित किया जाता है। उदाहरणार्थ

यदि a, समुच्चय S का एक अवयव है, तो हम कहते हैं कि ' समुच्चय S में है ' वाक्यांश 'अवयव है' 'सदस्य हैं' या 'में है' को सूचित करने हेतु यूनानी वर्णमाला के अक्षर " (एप्सिलोन)" का प्रयोग किया जाता है। अतः 'a ∈ S' लिखा जाता है। यदि x समुच्चय S का अवयव नहीं है, तो x ∉ S' लिखा जाता है और इसे "x समुच्चय S में नहीं है" पढ़ते हैं।

सूचीबद्ध रूप[संपादित करें]

सूचीबद्ध रूप में अल्पविराम द्वारा पृथक् करके तरंगित कोष्ठकों {} के मध्य अवयवों को सूचीबद्ध करके एक समुच्चय को परिभाषित किया जाता है। उदाहरणार्थ रोमन वर्णमाला के सभी स्वरों का समुच्चय है।

यह ध्यान योग्य है कि समुच्चय को सूचीबद्ध रूप में लिखते समय किसी अवयव का सामान्यतः पुनरावृत्ति नहीं होना चाहिए, अर्थात्, प्रत्येक अवयव दूसरे से भिन्न होता है।

कई अवयवों के साथ समुच्चय हेतु, विशेष रूप से जो एक अन्तर्निहित प्रतिमान का पालन करते हैं, सदस्यों की सूची को '...' का प्रयोग करके संक्षिप्त किया जा सकता है। उदाहरणार्थ पहले सौ प्राकृतिक संख्याओं के समुच्चय को सूचीबद्ध रूप में निर्दिष्ट किया जा सकता है।

परिमित और अपरिमित समुच्चय[संपादित करें]

किसी समुच्चय S के अवयवों की संख्या से अभिप्राय समुच्चय के भिन्न अवयवों की संख्या से है और इसे प्रतीक n(S) द्वारा दर्शाया जाता हैं। यदि n(S) एक प्राकृतिक संख्या है, तो S एक आरिक्त परिमित समुच्चय होता है अन्यथा यह अपरिमित समुच्चय कहलाता है। उदाहरणार्थ सभी प्राकृतिक संख्याओं के समुच्चय है जो कि अपरिमित है।

सभी अपरिमित समुच्चय का वर्णन सूचीबद्ध रूप में नहीं किया जा सकता है। उदाहरणार्थ वास्तविक संख्याओं के समुच्चय का वर्णन इस रूप में नहीं किया जा सकता है, क्योंकि इस समुच्चय के अवयवों का कोई विशेष प्रतिमान नहीं होता है।

समुच्चय निर्माण रूप[संपादित करें]

समुच्चय निर्माण रूप में, किसी समुच्चय के सभी अवयवों में एक सर्वनिष्ठ गुणधर्म होता है जो समुच्चय से बाहर के किसी अवयव में नहीं होता है। उदाहरर्णाथ समुच्चय {a,e,i,o,u} के सभी अवयवों में एक सर्वनिष्ठ गुणधर्म है कि इनमें से प्रत्येक अवयव रोमन वर्णमाला का एक स्वर है और इस गुणधर्म वाला कोई अन्य अक्षर नहीं है। इस समुच्चय को V से निरूपित करते हुए निम्नलिखित लिखा जाता है:

V = {x|x रोमन वर्णमाला का एक स्वर है}

यहाँ ध्यान योग्य है कि किसी समुच्चय के अवयवों का वर्णन करने के लिए x प्रतीक का प्रयोग करते हैं, (x के स्थान पर किसी अन्य प्रतीक का भी प्रयोग किया जा सकता है) जिसके उपरान्त ऊर्ध्वाधर रेखा का चिह्न '|' लिखा जाता है। इसके पश्चात् समुच्चय के अवयवों के विशिष्ट गुणधर्म के साथ सम्पूर्ण कथन को तरंगीय कोष्ठक { } के भीतर लिखते हैं। समुच्चय V के उपर्युक्त वर्णन को निम्नलिखित प्रकार से पढ़ा जाता है, “ सभी x का समुच्चय जहाँ x रोमन वर्णमाला का एक स्वर है।"

उपसमुच्चय[संपादित करें]

यदि समुच्चय A का प्रत्येक अवयव, समुच्चय B का भी एक अवयव है, तो A, B का उपसमुच्चय कहलाता है। निम्नलिखित उदाहरण देखिए:

A = विद्यालय के सभी विद्यार्थियों का समुच्चय,

B = कक्षा के सभी विद्यार्थियों का समुच्चय ।

B का प्रत्येक अवयव, A का भी एक अवयव है, अतएव B, A का एक उपसमुच्चय है। इस तथ्य को प्रतीकों में द्वारा प्रकट किया जाता है। प्रतीक कथन 'एक उपसमुच्चय है', अथवा 'अन्तर्विष्ट है' के लिए प्रयुक्त होता है।

, यदि

उपर्युक्त कथन को इस प्रकार पढ़ा जाता है, “B, A का एक उपसमुच्चय है, यदि a, B का एक अवयव है तात्पर्य है कि a, A का भी एक अवयव है"। यदि B, A का उपसमुच्चय नहीं है, तो लिखा जाता है कि

B को A का समुच्चय होने हेतु केवल मात्र यह आवश्यक है कि B का प्रत्येक अवयव A में है। यह सम्भव है कि A का प्रत्येक अवयव B में हो या न हो। यदि ऐसा होता है कि A का प्रत्येक अवयव B में भी है, तो । इस दशा में, B और A समान समुच्चय हैं और इस प्रकार और , जहाँ द्विधा तात्पर्य हेतु प्रतीक है और जिसे 'यदि और केवल यदि' पढ़ते हैं तथा संक्षेप में 'iff' लिखते हैं।

गणित में संख्याओं का विशेष समुच्चय[संपादित करें]

प्राकृतिक संख्याएँ पूर्णांकों में निहित हैं, जो परिमेय संख्याओं में निहित हैं , जो वास्तविक संख्याओं में निहित हैं, जो सम्मिश्र संख्याओं में समाहित हैं।

ऐसे गणितीय महत्व के समुच्चय हैं, जिनका गणितज्ञ इतनी बार उल्लेख करते हैं, कि उनके परिचय हेतु उन्होंने विशेष प्रतीक और सांकेतिक परिपाटी प्राप्त कर ली गई है।

  • या , सभी प्राकृतिक संख्याओं का समुच्चय: ;
  • या , सभी पूर्णांकों का समुच्चय: ;
  • या , सभी परिमेय संख्याओं का समुच्चय: ;
  • या , सभी अपरिमेय संख्याओं का समुच्चय:;
  • या , सभी वास्तविक संख्याओं का समुच्चय जिसमें बीजीय संख्याएँ शामिल है: ;
  • या , सभी सम्मिश्र संख्याओं का समुच्चय:

रिक्त समुच्चय[संपादित करें]

रिक्त समुच्चय empty set (या शून्य समुच्चय null set) एक विशेष समूह होता है, जिसमें कोई भी नहीं होता है। इसे या या ϕ[2] (या ϕ) चिह्न के साथ दिखाया जाता है।[3]

घात समुच्चय[संपादित करें]

एक समुच्चय S के उपसमुच्चयों के संग्रह को S का घात समुच्चय कहते हैं। इसे P(S) से निरूपित करते हैं। रिक्त समुच्चय और स्वयं S, S के घात समुच्चय के अवयव हैं, क्योंकि ये दोनों ही S के उपसमुच्चय हैं। यदि तो

यदि S में n अवयव हैं, तो P(S) में 2ⁿ अवयव हैं। उपरोक्त उदाहरण में, S के चार अवयव हैं, और P(S) में 2² = 4 अवयव हैं, जैसा कि ऊपर दर्शाया गया है।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. शीलवंत सिंह (2011). सिविल सेवा प्रारम्भिक परिक्षा. टाटा मैकग्रा - हिल एजुकेशन. पृ॰ 54. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 9780071074810.
  2. Aggarwal, M.L. (2021). "1. Sets". Understanding ISC Mathematics Class XI. 1. Arya Publications (Avichal Publishing Company). पृ॰ A=3.
  3. Sourendra Nath, De (January 2015). "Unit-1 Sets and Functions: 1. Set Theory". Chhaya Ganit (Ekadash Shreni). Scholar Books Pvt. Ltd. पृ॰ 5.