सदस्य:ShrutiSethia/एम्मानुएलकांट

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एम्मानुएलकांट
Kant foto.jpg
एम्मानुएलकांट
जन्म

२२ अप्रैल १७२४
कोनिग्सबर्ग,

प्रशिया
राष्ट्रीयता प्रशियन्

जीवन[संपादित करें]

इम्मानुअल कांत सन १७४२ प्रशिया में जन्मे थे। उनकी मां, अन्ना रेजिना रॉयटर भी कोनिग्सबर्ग प्रशिया में पैदा हुई थी । जोहान जॉर्ज कांत ,उन्के पिता मेमेल मे एक जर्मन दोहन थे। उस समय प्रशिया के सबसे पूर्वोत्तर शहर (अब विनियस, लिथुआनिया) में था मेमेल । इम्मानुअल कांत का मानना ​​था कि उनके दादा हंस कांत स्कॉटिश मुल तके थे। एम्मनेउल अपने माता पिता के चौथे पुत्र थे । बपतिस्मा 'इम्मानुअल' ने अपना नाम एम्मनुएल मे बदल लिया हिब्रू सिखने के बाद। दोनों माता पिता लूथरवादी चर्च के धर्मात्मा अनुयायि थे, जो यह सिखाता है कि धर्म आंतरिक जीवन कि सादगी और नैतिक कानून का पालन कर्न है।

युवा छात्र[संपादित करें]

कांत ने बहुत हि कम उम्र मे अध्ययन के लिये योग्यता दिखाई है।उन्होंने पहले कोनिग्सबर्ग मे कौलेज पुरि कि जिसमें से वह सन् १७४० में गर्मियों के अंत में स्नातक की उपाधि प्राप्त कि। उन्होने १६ वर्ष की आयु में कोनिग्सबर्ग विश्वविद्यालय में दाखिला लिया। उन्होंने गोटफ्राइड लीबनीज के दर्शन का अध्ययन और मार्टिन क्नुतज़ेन् के तहत ईसाई वोल्फ (जो कि सन १७३४ से ,तर्क और मीमांसा के एसोसिएट प्रोफेसर थे), एक बुद्धिवादी जो ब्रिटिश दर्शन और विज्ञान के क्षेत्र के विकास से परिचित था और आइजैक न्यूटन के नए गणितीय भौतिकी के बारे मे कांत को परिछित कराया।उन्के पिता के म्रित्यु के कारन उन्के पडाइ मे बहुत बाधाए आई।

योग्दान[संपादित करें]

कांत सबसे ज्यादा अपने इन छेत्र -नैतिकता और तत्वमीमांसा के योग्दन के लिये जाने जाते है, उन्होने अन्य विषय मे भि महत्वपूर्ण योगदान किया है।उन्होंने एक खगोलीय खोज पृथ्वी के घूर्णन की प्रकृति के बारे मे बताया है , जिसके लिए उन्हे सन 1754 में बर्लिन अकादमी पुरस्कार से सम्मनित किया गया था।

प्रकृति के सामान्य इतिहास और स्वर्ग के सिद्धांत (१७५५) में कान्त ने निहारिका की परिकल्पना की है ।जिसमें उन्होंने बताया कि सौर प्रणाली गैस के एक बहुत बड़े बादल से निर्मित है ।उसके बाद उन्होंने सौर प्रणाली के क्रम को समझाने की कोशिश की है ।आइजेक न्यूटन ने भी ईश्वर के बनाए हुए इस क्रम की व्याख्या करने की कोशिश की थी ।कान्त ने सही रूप से खोज की कि आकाश गंगा तारों का एक समूह है जो बहुत बड़े तारागणों के समूह के रूप में परिभाषित किया जा सकता है ।बाद में उन्होंने सुझाव दिया कि इसी प्रकार का कोई दूसरा तारागणों का समूह भी हो सकता है । कान्त की इस खोज ने खगोल विज्ञान को एक नया आयाम दिया है । पहली बार खगोल शास्त्र का विस्तार गेलेक्टिक और एक्स्ट्रा गेलेक्टिक स्थानों तक हुआ ।

दर्शन[संपादित करें]

कान्त ने अप्ने निभन्ध मे 'प्रबोधन क्या है?' इस प्रशन क उत्तर देते हुए प्रबोधन को एक लैटिन आदर्श 'बुस्कधिमन हो कर कर्ने के हिम्मत वालि उम्र' कह कर परिभाशित किया है कान्त क कथन है कि व्यक्ति को बाध्य रुपो के निर्देश से मुक्त होकर स्वार्थ रुप से सोछ्ना चाहिये। उन्के इस मत ने १८ वि सदि कि अनुभव वादि परम्परओ और बुधिवादि परम्परओ के मतभेद का मेल मिलाप करवाया। उन्के इस मत का १९ वि सदि के रोमेनटीक और जर्मन आदर्शवादि दर्शन पर एक निर्मानक प्रभाव पड़ा। उन्के विछार २० वि सदि के कई दार्शिन्को के लिये प्रारम्भिक बिन्दु के रुप मे माने जाते है।

ट्रान्सेंडैंटल स्कीमा सिद्धांत[संपादित करें]

कान्त अपने "सिद्धांत मस्तिष्क उद्देश्य ज्ञान के उत्पादन में अहम् भूमिका निभाता है " के कारण समस्या में पड़ गए । विचारधारा और श्रेणियां पूरी तरह से अलग हैं , इसलिए ये दोनों आपस में कैसे मिल सकते हैं ? कान्त का समाधान एक दिव्य स्कीम है ।एक प्राथमिक सिद्धांत जिसको समयानुसार दिव्य कल्पना से जोड़ा जा सकता है -- सभी सिद्धांत अस्थायी रूप से बाध्य हैं, क्योंकि अगर एक विचारधारा विशुद्ध रूप से एक प्राथमिकता है । जिस प्रकार श्रेणियां बाध्य हैं।तब उन्हें हर समय उपयोग में लाना चाहिए । इसलिए पदार्थों जैसे सिद्धांत हैं जो समय के माध्यम से सदा यही कर रहे हैं । कारण हमेशा प्रभाव से ज्यादा महत्वपूर्ण होना चाहिए ।


सन्दर्भ[संपादित करें]

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  1. http://www.philosophers.co.uk/immanuel-kant.html
  2. https://en.wikipedia.org/wiki/Immanuel_Kant
  3. https://www.britannica.com/biography/Immanuel-Kant
  4. http://www.iep.utm.edu/kantmeta/
  5. http://www.biography.com/people/immanuel-kant-9360144