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टोपी कुंज

टोपि कुंज

टोपी कुंज एक क्रिष्ण का मंदिर है। यह मंदिर वृंदावन मे अच्छी तरह से जाने गये मंदिरो मे से एक है। इस मंदिर मे निम्बार्क सम्प्रदाय होति है जो चार दिन प्रति वर्ष होती है। महावानी से समाज गायन प्रति एक दिन आयोजित किया जाता है। उसकि अंतिम दिन मे दिव्या दंपति कि सुंदरता पर ध्यान होती है। कार्यक्रम, श्री भात्ता के युगल शताक से ५२ गानो से शुरु होती है।

                            फूल महल फूल वारी मेम फूल श्रिग्गार किये |
                              श्री हरिप्रिया बैठे कर फुले फूल हिये ||

टोपी कुंज हवेली शौली का एक छोटा सा मंदिर है। ड्रम और मंजिरा के एकल सेट दक्षता से खेला जाता है। वहाँ तीन आचार्या है- केंद्र मे मुकुंद देव, बाई मे मदावा दस और दाईं मे सनत कुमार जी। मुकुंद देव से सातवे वंशज रामदास था। वह उस सम्य मे विशिष्ट टोपी पहनते थे, इस वज्य से ही मंदिर का नाम टोपी कुंज रका गया है। यह कहा गया था की सभी टोपी कुंज के महंतो सिध्द है। वृंदावन के पवित्र धाम में दिव्य सौंदर्य पर इस खूबसूरत गाया ध्यान में भाग लेने के लिए सभी को नहीं दिया जाता है।

वहाँ का एक आश्रम का मुल्य नाम मुकुंद देव प्रदाना पीठ। आधुनिक युग मे इस मंदिर द्वारा स्थितित माधव दस किया था । अपने पिता की मृत्यु के बाद वह अपनी माँ के साथ तीर्थ यात्रा गया था, और वहाँ साधु को देखकर जगन्नाथ पुरी के पास गया और् वहा त्याग का जीवन लेने के लिए प्रेरित किया गया था लेकिन वह अपनी माँ पर जिम्मेदार था इसिलिए वह नही लिया । वह ब्रह्मण के परिवा से है। उन्के समय को उन्होने बरसाना मे बिताया, गह्वर मे रहते हुए। वह भगवत और अन्य शस्त्र सीखा और अंत मे अच्छी तरह से भाक्तामलि के प्रसिध्द वत्का बन गया था। इसी तरह से उनको भक्तामालि का नाम मिला था। वह रमन रेती मे प्रातिबंध बिहार मे रहना पसंद किए थे। भक्तमलि के प्रसिध्द शिक्षक, जगन्नाथ दास भक्तमलि भी उसके पास से ही सीखा था। इस मंदिर मे कई उपहार और पैसे दश्रिणा के रूप मे गिए जाती है। सनत कुमर दस जी ने अपने गुरु से आशिर्वाद किया जया था की वह टोपी कुंज मे महंत के कम करने के लिए।

माधव दास के उत्तराधिकारी सनत कुमार दास जी थे। उन्का जन्म मध्य प्रदेश के एक गांव में हुआ था। वह दुनिया के तरीके से एक सहज टुकड़ी था और 15 साल की उम्र में घर से भाग गया जब वह परिवार उसकी शादी के बारे में चर्चा सुना। फिर वह उज्जैन गए जहां उन्होंने ब्रज में रहने के लिए महाकालेश्वर से प्रार्थना किय था। वह भारत की सभी पवित्र स्थानों पर जाकर यात्रा किये थे। एक दिन वह नर्मदा नदी में और कुछ चमत्कारी फैशन से स्नान था शालाग्रम शिलास कि अब टोपी कुंज में वेदी पर देखा जा सकता है। वह श्री भट्ट माहावानि और युगल शटाक के बडा भ्क्त थे। उन्के मौत के बाद उन्के भक्तों टोपी कुंज में एकत्र हुए और माहावानि से गाना शुरू कर दिये थे। टोपी कुंज के वर्तमान महंत ललिता शरण दस महाराज जी है।


संदर्भ[संपादित करें]

[1] [2]

  1. http://news.vrindavantoday.org/2016/05/patotsav-at-topi-kunj/
  2. http://news.vrindavantoday.org/gallery/topi-kunj/