"आकाश" के अवतरणों में अंतर

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:जिस प्रकार एक ही सर्वव्यापक आकाश घड़े के अंदर व बाहर है, उसी प्रकार सदा स्थिर (सदा विद्यमान) व सदा गतिमान (सदा रहने वाला) ब्रह्म सभी भूतों (all existence) में है।
 
तज्ज्ञस्य पुण्यपापाभ्यां स्पर्शो ह्यन्तर्न जायते | न ह्याकाशस्य धूमेन दृश्यमानापि सङ्गतिःसंगतिः ||४- ३||<ref>अष्टावक्र गीता, भाग ४, श्लोक-३</ref>
:उसे (ब्रह्म को) जानने वाला अपने अंतः में पाप व पुण्य को स्पर्श नहीं करता, यह ऐसा ही है जैसे ऊपर से कितना ही प्रतीत हो किंतु वास्तव में धुआं कभी आकाश को स्पर्श नहीं करता।
 

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