वार्ता:सनातन धर्म

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कृपया "सनातन धर्म " की "नई व्याख्या " के आर्टिकल को अंत तक पढें! ManglaRamji (वार्ता) 00:05, 2 मई 2020 (UTC)

सनातन धर्म " की "नई व्याख्या[संपादित करें]

कृपया "सनातन धर्म " की "नई व्याख्या " के लिए आर्टिकल को अंत तक पढें! ManglaRamji (वार्ता) 00:08, 2 मई 2020 (UTC)

                                                                          • -   "सनातन धर्म" नामकरण : महज "विज्ञापन की इबारत"

ब्राह्मणत्व की शीर्ष भूमिका से युक्त कर्मकांड प्रधान वैदिक धर्म के "विज्ञापन की इबारत" ही  "सनातन धर्म" है! ______________________

  • "सनातन धर्म" की  नई व्याख्या*۔

____________________ "सनातन धर्म" नामकरण : महज "विज्ञापन की इबारत"


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ब्राह्मणत्व की शीर्ष भूमिका से युक्त कर्मकांड प्रधान वैदिक धर्म के "विज्ञापन की इबारत" ही  "सनातन धर्म" है! बाजार  : जरूरत  के अनुसार चीजें बनाना !बाजारवाद  : चीजें बनाकर (विज्ञापनोंं के जरिये ) *जरूरत* पैदा करना!  इस तरह   सनातनवाद सांस्कृतिक व्यावसायिकता  है,  जो सदा  से विज्ञापन  की वैशाखियों की मोहताज रही है !  यह *सनातन* विशेषण : एकल वर्चस्वकामी ब्राह्मणत्ववादी धर्म का ही व्यावसायिक विज्ञापन है!

  • धर्म य: धारयेत्!*
  • जो धारण किया जाये, वही 'धर्म' है!*
  • हमने सर्व_समाजों की उद्भावक_सहभागिता के लिए ही समतामूलक लोकतंत्र धारण किया है! यही हमारा "लोकतांत्रिक धर्म" है!*

हमारे निर्माणाधीन वैश्विक-समाज में विविध धर्म *तदर्थ अवधारणाएँ* मात्र हैं! लेकिन हम जगद्गुरु तो *उदार चरितानां वसुधैव कुटुंबकम्* के ध्येय-वाक्य के कारण ही विश्व में मान्य हुए हैं! फिर लोकतंत्र के समावेशी विधान सभी धर्मावलंबियों को अपने धर्म को मानते-पूजते रहने की अनुमति देता है! इसलिए शिकायत यही है कि *कोई एक "धर्म विशेष" यह 'दावा' करे कि केवल "वही" सृष्टि के आरंभ से शुरुआती धर्म है, इसीलिए वह 'सनातन' है!*

  • हमारी विनम्र आपत्ति केवल "सनातनता के दावे" के साथ आमजन की मानसिकता को कब्जाये रखने की "सनातन नियत" से है!*
  • अपने इस दुराग्रह को विधि के रूप में सुस्थापित और शीर्ष भूमिका पर काबिज रखने की नियत से है, जो अपनी कलमों के जरिये रची गई सांस्कृतिक-साजिशों को जारी रखने के प्रयास जारी रखने पर कायम है!*
  • हमारी अपील उन कलमकारों से ही है, जो संस्कृति के नाम से "हमारी आंतरिकता की विषैली ढलाई"  करते जा रहे हैं! हमारी आंतरिकता की मिट्टी ही "सांस्कृतिक साँचे" बन जाती है! वह "कुंभकार की सृजन_योजना" के अनुसार ढलाई के दौरान ढलती रहती है और वही उसकी नियत को साधने वाले 'साँचे' भी बन जाती है! ये कुंभकार के साँचे "उनकी नियत की आँच" में ही पककर बनते हैं!*

हमारा यह विमर्श : संस्कृति के साँचे गढने वाले कुंभकार की 'सनातन नियत' को समझने के लिए ही है! हम पायेंगे कि मूल आलेख में दी गई सनातन धर्म की व्याख्या तथ्य-विरुद्ध है, अत: उसे "प्रसिद्ध तथ्यों" से तुलना करके सुधारने की आवश्यकता है!

  • क्योंकि यह मूल व्याख्या दुराग्रह_ग्रसित 'सप्रयोजन' प्रक्षेपण मात्र है!*
  • आलेख में प्रथमत: निवेदन यह है कि पूरे आलेख में जिस *ब्राह्मणत्व* शब्द का उल्लेख किया गया है, यह आदिशंकराचार्य के द्वारा "उल्लेखित शब्द" ही है! इस लेखक का नहीं! यहाँ किसी *ब्राह्मण व्यक्ति* से भी तात्पर्य नहीं है, बल्कि *बुद्धि के अस्त्र के प्रयोग से "मानवीय सेवाओं का शिकार करने वाले" सभी *भेजा_माफिया चतुर परजीवी* से ही तात्पर्य है!*
  • ब्राह्मणत्व के पेशे, आसाराम, राम रहीम, रामपाल, नित्यानंद आदि आध्यात्मिक धंधेबाज, तांत्रिक, ओझे_भोपे आदि सभी इनमें शामिल हैं!*
  • डॉ.सुरेंद्र कुमार शर्मा 'अज्ञात्' आदि "व्हिशल_ब्लोवर" विद्वान ब्राह्मणों की बदौलत ही संविधान_सम्मत वैज्ञानिक रवैये को बढावा देने के लिए ही यह आलेख पेश किया जा रहा है! इसीलिए यह कृतज्ञ लेखक सर्वप्रथम विद्वान ब्राह्मण_ब्रहस्पतियों को नतमस्तक हो प्रणाम करता है! ताकि हम "हमारे दिमाग के विविध मकड_जाल और दुराग्रहों की खरपतवारों"  की सफाई हो सके औऱ वर्तमान जरूरत के उद्भावक विचारों के अंकुरण के लिए अनुकूल भूमि तैयार की जा सकें!  किसी पर दोषारोपण नहीं, बल्कि यही राष्ट्र-हितेषी शुभ कामना है|*
  • संस्कृति : हमारी आंतरिकता की ढलाई है और यह आंतरिकता मूलत: "विश्ववारा प्रहरी संस्कृति" है! जिससे अनुप्राणित होकर हम "चरेवैति_चरेवैति का प्रयाण_गीत" गाते हुए महासागरों की छाती पर सवार हुए और महासागर को अपना 'हिंदनाम' धरने के लिए अनुकूलित किया! जो सदियों से "हिंद महा,हिंदमहान्" का 'विरुद'(प्रशस्ति-गान) गाता ही आ रहा है,जो आज भी हमारा "सनातन भाट" बना हुआ है!

उसी "प्रहरी_संस्कृति" की प्रभावना से हम सुदूर_पूर्व में हिंदुस्तानी परचम फहरा पाये थे!आज का हिंदेशिया "हिंदमय एशिया" का नारा ही तो है!*

सच तो यह हैैैै कि *सनातन धर्म की आंतरिकता का आकार देने वाली संस्कृति तो *ब्राह्मणत्व की शीर्ष भूमिका वाली पुजारी_संस्कृति ही है!*

  • जिसने सम्राट हर्ष को जुनूनी अतिदान के लिए दुष्प्रेरित किया और आमजन में बिना पात्रता के ही "फोकटिया दान" का मोहताज बना दिया; जिससे पहल और पुरुषार्थ_प्रेरणा का ह्रास हो गया! इससे राष्ट्र की "प्रतिरक्षा_सामर्थ्य" का ही दिवाला निकल गया!*
  • कोई हमलावर नहीं होता, न ही कोई हमले का शिकार ! यह तो युग-धर्म की प्रचंड शक्तियों का कमजोरियों के निर्वात की ओर स्वाभाविक "शक्ति_संचरण" मात्र  है!*
  • प्रकृति के दरबार में लिहाज का कोई खाता ही नहीं होता! वह हमेशा से खरा-खरा ही तौलती आई है! जब हम शक्तिमान थे, तो सुदूरपूर्व में छा गये थे! जब हमारे देश में कमजोरी का निर्वात पैदा हुआ तो 713 ई में मात्र 17 साल के नाबालिग लडके "बिन कासिम" ने सिंध पर हमला कर दाहिर को मार कर लंबी गुलामी का प्रवेश-द्वार खोल दिया!*
  • कारण यह कि सत्तासीन सम्राट हर्ष_प्रेरित सांस्कृतिक जडता के पोषण के जरिये हुआ!*
  • दैत्यराज बलि के "पाताल_पैठन" का पौराणिक आख्यान सबक दे चुका था! तब की प्रहरी-संस्कृति ने "राजधर्म के मूल्य" को रेखांकित कर यह स्यष्ट संदेश दिया था कि "किसी राजा को अपने अतिदान जुनून में प्रजा के राजकोष का दुरुपयोग नहीं करना चाहिए!*
  • लेकिन हर्ष के समय परजीवी पुजारी संस्कृति ने सम्राट को ऐसा करने के लिये प्रोत्साहित किया  और  ऐतिहासिक-सांस्कृतिक 'खता' कर डाली!*
  • लमहों ने 'खता' की, 'सजा' सदियों ने पाई!*
  • इसी "पुजारी संस्कृति" के हित_साधन के उद्देश्य से प्रेरित आज का सनातन धर्म है!*
  • सनातन धर्म" तो ब्राह्मणत्व के "एकल_वर्चस्व" को साधने वाला चमचमाता 'सनसनीखेज विज्ञापन" मात्र है!*
  • आदिशंकराचार्य ने इसी बात को प्रमाणित किया है!*

आदि शंकराचार्य ने गीता के अपने ऐतिहासिक भाष्य के 'उपोद्गात' पेज 14 पर प्रकट कर दिया है! +--------------------------- वे कहते हैं कि ...

  • ब्राह्मणत्वस्य हि रक्षणेन रक्षित: स्याद् वैदिको: धर्म: तदधीनत्वाद वर्णाश्रम भेदानाम्!*

निहितार्थ है : *वर्णों के (ऊँच-नीच) के भेदभाव और आश्रम_व्यवस्था ब्राह्मण के ही अधीन है, "ब्राह्मण के व्यवसाय" यानी "ब्राह्मणत्व" की रक्षा करने से ही वैदिक धर्म सुरक्षित रह सकता है!*

  • इसतरह : सनातन धर्म का उद्देश्य केवल "ब्राह्मणत्व" और उसके हितों की रक्षा करना ही है,उसे आमजन की मानसिकता की शीर्ष भूमिका पर काबिज रखना है!*
  • सनातन धर्म को "सृष्टि के आरंभ से ही शुरुआती धर्म" बताना एक दुराग्रही_दावा मात्र है,जो "भारतीय मनीषा" पर थोपी गई "सांस्कृतिक साजिश" है!*
  • जगद्गुरु की पुनर्प्रतिष्ठा और वर्तमान राष्ट्र-हित इस सनातनी-साजिश के 'जीनोम' को समझने से ही साधी जा सकती है!*
  • ब्राह्मणत्व ,पुजारी_संस्कृति और केवल अपने हित_साधन के लिए खुद के ऐश्वर्य-भोग के पट्टे जारी करने वाली 'कलमें' एकमेक ही हैं! यह सनातन धर्म और कुछ नहीं, बल्कि यह *त्रय_मुखी-ब्राह्मणत्व* ही है, जिसे शंकराचार्य ने भलीभाँति प्रमाणित कर दिया है!*

इसे वर्तमान परिस्थितियों में समझने के लिए सबूत टटोलें!

  • हमारी संस्कृति को अपूर्व वैश्विक-गौरव प्रदान करने वाले स्वामी विवेकानंद को अमरीका के धर्म_सम्मेलन के लिए समुद्र-यात्रा करने मात्र से अछूत करार देकर समुद्र में धकेलने की धमकियाँ दी गईं थीं! वह और कोई नहीं, बल्कि पुजारी_संस्कृति का बंधक बना यह सनातन धर्म ही है! लेकिन आज वही सनातन_धर्म स्वामी विवेकानंद को अपने प्रेरणा_पुरुष के रूप में पेश करने को मजबूर है!*
  • मौका_परस्त सनातन का पैंतरा_बदल चरित्र ही सनातन चरित्र हैै! आज मंदिरों की प्रस्तर मूर्तियों को भी बुखार आना बताने पर कोई डॉक्टर स्टेथ लगाकर बुखार की जाँच करता दिखता है तो पुजारी_संस्कृति और सनातन धर्म दोनों गलबहियाँ डाले मंद-मंद मुस्कुराते हैं, कि सनातन धर्म की जय हो रही है!*
  • मूल ऋग्वेद में न तो आत्मा है, न राम, शिव, शक्ति, ब्रह्मा आदि! केवल विष्णु के लिए 6 ऋचाएँ ही हैं! वहाँ त्वष्टा, पशुपति ,प्रजापति के गुण 'रूद्र' में समाहित हुए! वेदों के बाद वही रूद्र 'शिव' कहलाये!

"पुरुषसूक्त" तो ऋग्वेद के दसवें मंडल में सप्रयोजन परवर्ती प्रक्षेपण ही है!*

  • नासदासीन्नो सदासात्तदानीं नासीद्रजो नोव्योमा परोयत्।*

इस सूक्त को  ऋग्वेद के 10 वें मंडल का हिस्सा बनाकर 129 वें सूक्त में मूल "नासदीय सूक्त" को ही बदल दिया गया। मूल नासदीय तो सृष्टि के "असत्" होने पर ही जोर देता है और केवल "ईमानदार जिज्ञासा" पेश करता है! "वैदिक संस्कृति" ग्रंथ के लेखक : डॉ गोविंद्रचंद्र पांडेय पेज 9 पर उल्लेख करते हुए लिखते हैं कि *आधुनिक विद्वानों का प्रायिक मत है कि प्रथम और दशम मंडल के सूक्त अधिकांश में प्रक्षेपण परवर्ती हैं!*

  • इस तरह ऋग्वेद को भी अपना मतलब साधने वाला "दादी का मटका" बनाकर धरने वाला ही पुरुषसूक्त का प्रक्षेपण करता है! यह कलमकारी ही सनातन है!*
  • जबकि मूल ऋग्वेद का मूल "नासदीय सूक्त" परम सत्ता (ईश्वर) "ना सत्" मानता है! वेद में केवल यही "जिज्ञासा" है*

कि.....

  • इस संसार को किसने बनाया? सोमरस पीने वाला जानता है! शायद वह भी नहीं जानता!*

बस ,यही है, वेद में ईश्वरीय ज्ञान! हिंदू शब्द 1000 साल से प्रचलित है! इसे मानने में कोई हर्ज नहीं!

  • ये 'सनातन' शब्द तो केवल ईश्वर के गुणों के विशेषण के रूप में ही प्रयुक्त हुआ था!

जब वेदों में "आत्मा" शब्द ही नहीं, तो "परमात्मा" कैसे हो सकता है?*

  • बाद में दर्शनों के युग में भी "यागादिरेव धर्म:" की परिभाषा लागू रही, जो हिंसक-कर्मकांडों पर ही आधारित थी!*
  • ब्रह्मज्ञान : उपनिषदों में निर्माणाधीन अवस्था में रहा था, जिसे सनानतवादी जैमिनि ने निंदित किया था! आज का सनातन धर्म ब्रह्मज्ञान को किस आधार अपनी इसे अपनी गौरवशाली थाती बता रहा है? जो उसके हिंसक۔ वैदिक कांड के ही विरोध_स्वरूप विकसित ज्ञानमार्ग की प्रतिनिधि अवधारणा थी! ब्रह्मज्ञान तो आधिकारिक रूप से "वेदांत दर्शन" की तब की देन है, जब सनातन हिंसक यज्ञों में जीव_हिंसा कर रहा था!

कथित वेदमार्गी मीमांसक जैमिनि ने तो उपनिषदों के समूचे ज्ञान मार्ग का ही पुरजोर खंडन ही किया था! जैमिनि के सशक्त तर्क ज्ञान मार्गियों के छक्के छुडाने में तो सफल रहा, लेकिन दिमागी रूप से पाबंद बनाने में सफलता गीता को ही मिली!* गीता 600BC से व्यासजी की कलम 126 श्लोकों से लिखी जानी शुरु हई! 400ई में वैशंपायन ने उसमें 119 श्लोक जोडे और अंतिम लेखक 'सौति' ने उसमें 455 नये भक्ति और समर्पण साधने वाले श्लोक जोडकर पुष्यमित्र के समय में इसे 700 श्लोकों की गीता को संपादित किया! हालांकि आज कुछ संस्करणों में 745 श्लोक तक मिलते हैं,ये मौका_परस्त मानवीय घालमेल को ही पुष्ट करते हैं! सन् 1969 में डॉ.गजानन श्रीपत खैर की रिसर्च बुक Quest for the Original Gita में उक्त रहस्य को सरेआम किया गया है!

  • क्योंकि पुरुषसूक्त इसी धारणा को स्थापित करने के वेद में जोडा गया कि *ब्राह्मण तो ईश्वर (परम पुरुष) का मुख ही है! उसके मुख से स्वयं श्रीकृष्ण भगवान ही बोलते हैं!* प्रमाण भी तैयारसुदा है *ब्राह्मणोsस्य मुखं आसीत्*, तो अब कोई सवाल कैसे कर सकता है, जब ब्राह्मण खुद ही "भगवान का मुख" बन गये?*

"धर्म य:धारयेत् " की सर्वमान्य परिभाषा भी "ब्राह्मणत्व के एकल वर्चस्व" के कमजोर होने पर ही प्रचलित हो सकी थी!

  • इसतरह 'सनातन' तो केवल "बुद्धि के अस्त्र से मानवीय सेवाओें के शिकार करने की सांस्कृतिक-साजिश" है , ,और ये "शुरुआती होने की कसमें" खाता "दावा" मात्र है! हाँ,यदि सनातन धर्म और उसके विधि-निषेध सदैव रहने वाले हैं ,तो अब कहाँ है : अश्लील-अभिमेथन वाला हिंसक अश्वमेध यज्ञ?

कहाँ है "गोवंश की बलि" पर आधारित गोमेध, ज्योतिष्टोम और शूलगव यज्ञ? क्योंकि अहिंसावादी बौद्धों, जैनों के प्रखऱ विरोध के कारण "पवित्र हिंसा" के बूचडखानों को बंद करना पड गया था!*

  • इसके बावजूद इन हिंसा-लोलुप कर्मकांडियों ने "अहिंसा परमो धर्म:" में भी 'परंतुक' जो़ड कर कहा , "अहिंसा परमो धर्म: 'धर्महिंसा तदैव च'!*
  • समय पलटा तो धार्मिक अनुष्ठानों में जीव_हिंसा को धर्म_सम्मत बताने वाले ही आज 'गोरक्षक' बनने को मजबूर हो गये हैं!*
  • उनके सनातन धर्म के द्वारा इस तरह U-Turn लेने को क्या आज "शुरुआती परंपरा (सनातन परंपरा) निभाना" कह सकते हैं?*
  • असल में, बदलती जरूरतों के अनुसार ये "यू_टर्न" लेते रहना ही "सनातन धर्म के सनातन पैंतरे" है| यह तो परजीवी बुद्धजीवियों द्वारा "अपनी सांस्कृतिक हार" का वैसा ही "महिमा_मंडन" है, जैसा कि युद्ध के मैदान से भागने वाले को "रणछोड" कहकर जयकारे लगाये जाते हैं!*
  • बदलती जरूरतों के अनुसार अपने मूल्यों को शीर्षासन करवाने वाला धर्म "सनातन धर्म" कैसे हो सकता है?*
  • क्या सनातन "हिग्सबोसोन" का ही नाम है? जो सृष्टि के आदिकण के रूप में साबित तो हुआ है, लेकिन उस पर कोई "सनातनी कोटिंग" तो नहीं पाई गई! ये आई_टी सेल किसलिए है? लिख दें, जर्मनी के डेविड 'गपोडस्मिथ' ने एक रिसर्च कर...*
  • गौरव की बात तो यह है कि "हिग्सबोसोन" शब्द में "बोसोन" तो हमारे ही "सत्येंद्रनाथ बोस" की 40 साल पहले की गई "सृष्टि के आदिकण की परिकल्पना" का ही सम्मान_स्वरूप 'नामकरण' है!

लेकिन "अणुवाद के विचार" के साथ "भौतिक विज्ञान" की नींव धरने वाले 'कणाद' का नाम बिगाडने की सनातन परंपरा को कैसे तोडा जाये? बोस को गाली देते रहकर उस 'आदिकण' को "गॉड_पार्टिकल" पुकारने से ही हमारी सनातन परंपरा का पालन हो पायेगा! है न?*

  • सनातन वैदिक कर्मकांड के प्रवक्ता उपनिषदों के ज्ञानमार्ग का विरोध ही करते रहे!

फिर अस्तित्व_रक्षण की मजबूरी आन पडी तो उन्हीं विरोधी उपनिषदों के घोंसलों में ही अपना घर बसाना पड गया! समय बडा बलवान है! उपनिषदों से गीता रचकर, फिर 'रणछोड' बनकर गौरवान्वित भी हुए, कहा* _

  • सर्वोपनिषदो गावो दोग्धा गोपालनंदन:!*

तो हम सभी के आराध्य श्रीकृष्ण भगवान के चरित्र को इतना गिरा कर "दूहने वाला ग्वाला" तक बना दिया? *क्या ऐसे होती है, सनातन आराध्यों की सुस्थापित प्रतिष्ठा के ऐश्वर्य की रक्षा?*

  • यह चरित्र_हनन इसलिए कि "अर्जुन के वाहन_चालक" को उसकी 'औकात' भी तो बतानी थी ये "साजिशी-तरीके" ही सनातन है!*
  • जब "वृहद्रथ क्षत्रिय" की हत्या धर्म प्रवक्ता ब्राह्मण पुष्यमित्र शुंग ने की, तो इसे भुलाने के लिए गीता में भक्ति की सुनामी उडेल दी!*

लेकिन उन्हें डर था कि *क्षत्रिय -समाज, सम्राट की हत्या का बदला ले सकता था! उसे सांस्कृतिक-हथियार के आख्यानों में साधकर लिमिट में रखऩे की साजिश रची! फलत: क्षत्रियों द्वारा अपनी कन्याओं को त्यागने के "पवित्र पैंतरे" डिजाइन किये गये!*

  • शांता : जो राजा दशरथ की पहली संतान थी, लेकिन कन्या होने के कारण परित्याग करवा कर रोमपद की गोद_पुत्री बना दिया गया और दशरथ तीन_तीन रानियों से भरे रनिवास में निस्संतानता का दंश भोगते रहे! वह इसलिए, कि उनकी स्क्रिप्ट राम_कथा के समानांतर "परशुराम_प्रतिज्ञा का आख्यान" भी रच चुकी थी!

फिर किसी ब्राह्मण रावण को भला कोई क्षत्रिय_पुत्र श्रीराम कैसे मार सकते थे? जिनके विरुद्ध 21 बार संहार का ऐलान जो कर चुके थे!*

  • इस लक्ष्य को साधने के लिए राम_कथा में "जबरदस्त ट्विस्ट" देकर राम आदि को "श्रृंग ऋषि" का "यज्ञ_पुत्र" बनवा दिया!*
  • मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का 'परिवर्तित पितृत्व' मूल वाल्मीकि रामाय़ण में कलमकारों की आत्ममुग्धता के लिए "शांता_प्रसंग" के रूप में आज भी जस का तस मौजूद है!*
  • लेकिन जब तुलसी रामचरित मानस को लोकभाषा में राम के "पितृत्व_बदलने की कारगुजारी" को सरेआम करने वाले थे! मुगलों के खासमखास "क्षत्रिय राजा मानसिंह" के कोप से बचने और पूरे क्षत्रिय-समाज को क्षुब्ध होने से बचाने के लिए राम को फिर से "दशरथ पुत्र" बनाने के लिए शांता का प्रसंग ही हटा लिया गया! लेकिन "सिया के राम" के टीवी सीरियल में फिर पुराने नासूर कुरेद दिये!*
  • हम अतीत के हाथ नहीं बाँध सकते और न ही उसे चुप करा सकते है! फिर हम अतीत से उसकी गलतियों का मुआवजा भी तो नहीं भरवा सकते ! कटुता फैलाने वाली बीती बातें बिसराई तो जा सकती हैं और उनसे सबक भी लिया जा सकता है! ऐसा करके अतीत की मानवी गलतियों को दफन करके वर्तमान भाईचारे के माहौल को बचाया भी तो जा सकता है!*
  • लेकिन ये "परशुराम जयंती" के जुलूसों में अतीत की गलतियों के प्रतीक "परशु" दिखाकर, आज के माहौल में भी यह जताना कि अभी तो क्षत्रिय_संहार के 20 केस पेंडिंग हैं, और जिन्हें कभी भी कारित किया जा सकता है!

क्या यही सनातन_धर्म की सनातन_संस्कृति है?*

  • ऐसी काल्पनिक बातों से वर्तमान लोकतांत्रिक माहौल पर डर बरपाना कहाँ तक जायज है?*

ये *सांस्कृतिक कहर* उन क्षत्रियों के विरुद्ध *सांस्कृतिक क्रूरता* है, जिन्होंने घास की रोटी खाकर देश_संस्कृति और अपनी आन_मान की रक्षा की है! जरूरत पडने पर अनेक कुर्बानियाँ दी हैं! ये उन क्षत्राणी_वीरांगनाओं को मर्माहत कर देने वाली बर्बरता है, जिन्होंने अपने सतीत्व और मान_मर्यादा की रक्षा के लिए जौहर तक का अंतिम विकल्प चुना था!*

  • और जो इस बर्बरता को एञ्जॉय करते रहने के लिए देश_रक्षक क्षत्रियों को परशु दिखाकर अतीत के घावों को कुरेद कर उन पर नमक छिडकने के मजे लेते हैं! ऊपर से इसे सनातन संस्कृति की रक्षा करने का वास्ता भी देते हैं! देखिये-समझिये, पूरा वृहद् समाज भी ऐसी हरकतों से आहत है!*
  • ऐसी "पल-पल पैंतरे बदलती" भावनाओं को चोटिल करके मजे लूटती कलमों को "सनातनधर्मी कलम" थोडे ही कहेंगे!*
  • फिर कलमकारों की दुष्प्रेरणा में आकर किसी "क्षत्रिय_पिता" ने अपनी "नवजात कन्या" को खेत में फैंका, तो वह राजा जनक के हल की नोंक पर मिली और 'सीता' कहलाई!*
  • तीसरा उदाहरण महाभारत से है! राजा #पृथु के घर कन्या जन्मी, नाम था पृथा! उसे भी राजा कुंतीभोज की गोद दे दिया गया! जो कुंती कहलाई! गीता में "हे पार्थ" संबोधन कुंती के जन्म के नाम 'पृथा' के कारण ही है!*
  • इन तीनों क्षत्रिय कन्याओं का 'पितृत्व' किसने बदला? फिर फुटबॉल बनाकर "अपने गोल' में" किसने दागा? इसी सनातनी कलम ने! ताकि इस सांस्कृतिक औजार से क्षत्रियों की वंश_वृद्धि को सदैव लिमिट में ही रखा जा सके! "
  • इसी सनातनी कलम ने ऐसे "कन्या_विरोधी ऐसे कुसंस्कार" गढे गये, जिसके कारण पिताओं के हाथ आज तक कन्याओं को "माँ की कोख" में भी नहीं बख्शते ! जबकि इन सनातनी कलमकारों की कन्याएँ 'लीलावती' जैसी महान् गणितज्ञाएँ बनती हैं!*
  • क्षत्रिय_कन्याओं को सोमनाथ जैसे मंदिरों में दैव_निर्माल्य बनाना , (संदर्भ : सोमनाथ महालय: आचार्य चतुरसेन) भगवान को सुख_भोग प्रदान करने के बहाने पुजारियों द्वारा उनके यौवन और शील के साथ खिलवाड़ करना अक्षम्य अपराध है !

यदि यहाँ सनातन की कूट_साजिश रंगे हाथों पकडी नहीं जाती कि "कथित सनातनी .कलमकारों ने क्षत्रियों को 'परशु' से नहीं मारा था, बल्कि सनातनी कलमों ने अपनी 'नोंक' से कोंच_कोंच कर मारा है!* तो इस "सनातन-सांस्कृतिक-साजिश " का पर्दाफाश कैसे हो पाता? इसे प्रमाणित करने के लिए पौराॆणिक आख्यानों को कृपया राग-द्वेष से विरहित होकर फिर से पढें!

  • क्षत्रियों को जलील कर वहद् समाज को भी ऊँच_नीच के भेदभाव में बाँटकर, पूजा के जरिये ब्रह्मास्त्र जुगाडने का झाँसा देकर सोमनाथ को लुटवाया! तब कहाँ थे, वे भक्त_वत्सल भगवान, जो गजराज (जानवर) को तो बचाने नंगे पाँव दौडे आते हैं! और सोमनाथ, तीसरे पानीपत और प्लासी में भक्तों की बरबादी का जायजा लेने तक नहीं पधारते! इसलिए कि इनकी कलमों के भगवान सिर्फ इनकी कथाओं में ही लक्ष्मी सहित पधारते हैं!*
  • क्षत्रिय_विरोधी कारगुजारियों का नमूना महाभारत के विजेता की "मैच_फिक्सिंग" में भी मिलता है!*
  • वेद व्यास के "तीन नियोग_प्रसंग" क्षत्रियों के 'पुरुषत्व' को कलंकित करने के लिए काफी है! लेकिन असली क्षत्रिय बाप और एक माँ की 100 औलादें भी, "कलम कारित असाधारण_गर्भाधान" से जन्मी 5 आशीर्वादी संतानों (पांडवों) से हार जाती है!*
  • लेकिन कलम क्षत्रिय पांडु को दो पत्नियों का "नकारा पति" साबित करने से भी नहीं चूकती! जबकि कौरवों के पक्ष में ज्येष्ठ भाई की औलादों को चाचा पांडु द्वारा "उनकी अमानत लौटाने" का प्रबल औचित्य़ था! लेकिन कलमों ने 'सुयोधन' को 'दुर्योधन' ही कहना जारी रखा! क्योंकि फैसला उनकी स्क्रिप्ट में छप चुका था! उनकी टोन में उनका पूर्वाग्रह ही बोलता है!*
  • यह कलम के द्वारा किया गया मैच_फिक्सिंग "सनातन धर्म की नियत पर पुनर्विचार'" करने का पुरजोर तकाजा करता है!*
  • जबकि ये कलमकार "सुपर_डोनर" के रूप में विज्ञापित होने से भी बाज नहीं आते!*
  • आख्यानों के शब्द यूं ही नहीं होते, वे सनातनी कलमकारों के दिल के किसी कोने में फन फैलाये जहरीले नाग के उद्देश्य की फुंफकार होते हैं,!*
  • चाणक्य ने विश्ववारा संस्कृति की जडों में भी मट्ठा पिला दिया! राजाओं को कहा गया कि *शांति तो महज "स्थगित युद्ध" है!* पडौसी राजा की कमजोरी भाँप कर उस पर हमला कर उसका राज्य और संपदा का हरण कर लेना चाहिए! दुर्दम्य सबल शत्रु के विरुद्ध विष-कन्याओं का हथियार भी आजमाना चाहिए! तब कहाँ था : राष्ट्र? कहाँ थी राष्ट्रीयता की संस्कृति? अब किस संस्कृति के अतीतवादी "सांस्कृतिक राष्ट्रवाद" का नारा लगाया जा रहा है!*
  • समृद्धि की केशर_क्यारियाँ हमने खडी की और सुरक्षा की कांटेदार बाड۔ ही नहीं बनाई! विदेशी जानवरों ने हमारी केशर_क्यारियो को रौंद डाला था! अब हम उन जानवरों को ही कोस रहे हैं! क्या सनातन संस्कृति की यही सीख है?*

कौटिल्य इसी ब्राह्मणत्व वर्चस्व को साधने के लिए एक अजीब आशीर्वाद इनके कान में फुसफुसाते हुए कहते हैं कि... ---=---------------

  • धनुर्धर का एक तीर विरोधी को मार सकता है!*
  • वह चूक भी सकता है!*
  • लेकिन "बुद्धिमान की बुद्धि का अस्त्र" (मस्त्र) आमजन को "गुलाम के रूप में जन्म लेने को 'पाबंद' कर सकता है" और उन्हें भी जो अभी पैदा ही नहीं हुए!*
  • गुलाम के रूप में जन्म लेने को पाबंद करने वाली संस्कृति और उससे अनुप्राणित सनातन धर्म के जीनोम की व्याख्या के लिए और क्या शब्द चाहिए?*
  • यही चाहिए कि खुद कथित सनातन धर्म के पैरोकार ही गीता मेंं बताये गये "मुनिश्रेष्ठ कपिल" के "मूल सांख्य दर्शन" से प्रेरणा लेकर राष्ट्रहित में खुद अपनी कलमों से ही लोकहितकारी नव-निर्माण करें!*
  • मूल' सांख्य का 'कैवल्य' यही है कि जब 'पुरुष' को बाँधने वाली 'प्रकृति' स्वयं यह 'समझ' लेती है कि "पुरुष ने प्रकृति के द्वारा उसे बाँधने की समस्त कारगुजारियों को देख- समझ लिया है!*

तो प्रकृति उसे बाँधने का कार्य खुद ही बंद कर देती है और पीछे हटकर *शांत* हो जाती है! यह "राष्ट्र_पुरुष" सनातनी कलमों को बाँधते-उलझाते हुए "देख-समझ" चुका है! इसलिए कृपया 'शांत' होइये, धंधों को 'मंगल' कीजिए! राष्ट्र के लोकहितकारी कैवल्य को अपने अनुभवों से आनंदमय बनायें! सत्यमेव जयते! शुभं मंगलं सत्यम्! इति!

ManglaRamji (वार्ता) 00:46, 9 मई 2020 (UTC)

OK ManglaRamji (वार्ता) 01:03, 9 मई 2020 (UTC)