लोक प्रशासन का इतिहास

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
Jump to navigation Jump to search

एक व्यवस्थित अध्ययन के रूप में लोक-प्रशासन का विकास अभी नया ही है। लोक-प्रशासन के शैक्षिक अध्ययन का प्रारम्भ करने का श्रेय वुडरो विल्सन को जाता है जिसने १८८७ में प्रकाशित अपने लेख ‘द स्टडी ऑफ ऐडमिनिस्ट्रेशन' में इस शास्त्र के वैज्ञानिक आधार को विकसित करने की आवश्यकता पर बल दिया। इस लेख में राजनीति तथा प्रशासन के बीच स्पष्ट भिन्नता दिखाई गई और घोषित किया गया कि प्रशासन की राजनीति से दूर रहना चाहिए। इसी को तथाकथित ‘राजनीति-प्रशासन-द्विभाजन’ कहते हैं।

लोक प्रशासन का इतिहाjस निम्नलिखित 5 चरणों में विभाज्य है-

प्रथम चरण (1887 - 1926)[संपादित करें]

एक विषय के रूप में लोक-प्रशासन का जन्म 1887 में हुआ। अमेरिका के प्रिन्सटन यूनिवर्सिटी में राजनीतिशास्त्र के तत्कालीन प्राध्यापक वुडरो विल्सन को इस शास्त्र का जनक माना जाता है। उन्होंने 1887 में प्रकाशित अपने लेख 'प्रशासन का अध्ययन' (The Study of Administration) में राजनीति और प्रशासन को अलग-अलग बताते हुए कहा- "एक संविधान का निर्माण सरल है पर इसे चलाना बड़ा कठिन है।" उन्होंने इस ‘चलाने’ के क्षेत्र के अध्ययन पर बल दिया जो स्पष्टतः ‘प्रशासन’ ही है। उन्होंने राजनीति और प्रशासन में भेद किया। सन् 1887 में विल्सन के लेख के प्रकाशन के साथ वास्तव में एक ऐसे नए युग का जन्म हुआ जिसमें धीरे-धीरे लोक-प्रशासन अध्ययन के एक नए क्षेत्र के रूप में विकसित हुआ। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि अन्य देशों की तुलना में संयुक्त राज्य अमेरिका में लोक-प्रशासन के अध्ययन पर विशेष बल दिया जाने लगा। वहाँ प्रशासन एक विज्ञान के रूप में विकसित हुआ है जिसके अध्ययन के लिए लोग प्रबन्ध विद्यालयों (Management Schools) में प्रवेश लेते हैं।

इस विषय के अन्य महत्त्वपूर्ण प्रणेता फ्रैंक गुडनाउ (Frank J. Goodnow) हैं जिन्होंने 1900 में प्रकाशित अपनी पुस्तक ‘राजनीति और प्रशासन’ (Politics and Administration) में यह तर्क प्रस्तुत किया कि राजनीति और प्रशासन अलग-अलग हैं क्योंकि जहाँ राजनीति राज्य-इच्छा को प्रतिपादित करती है वहां प्रशासन का संबंध इस इच्छा या राज्य-नीतियों के क्रियान्वयन से है। वास्तव में यह वह समय था जब अमेरिका में सरकारी क्षेत्र में शिथिलता और भ्रष्टाचार का बोलबाला था और फलस्वरूप सरकार-सुधार के आन्दोलन चल रहे थे। इस सुधार-आकांक्षी वातावरण में अनेक विद्यालयों में लोक-प्रशासन का अध्ययन-अध्यापन शुरू हो गया। 1914 में अमेरिकी राजनीति विज्ञान संघ ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा कि सरकार में काम करने के लिए कुशल व्यक्तियों की पूर्ति करना राजनीतिशास्त्र के अध्ययन का एक लक्ष्य है। फलस्वरूप लोक-प्रशासन राजनीति विज्ञान का एक प्रमुख अंग बन गया और इसके अध्ययन-अध्यापक को भारी प्रोत्साहन मिला। सन् 1926 में एल.डी. ह्नाइट की पुस्तक 'लोक-प्रशासन के अध्ययन की भूमिका' (Introduction to the Study of Public Administration) प्रकाशित हुई। वह लोक-प्रशासन की प्रथम पाठ्यपुस्तक थी जिसमें राजनीति-प्रशासन के अलगाव में विश्वास व्यक्त किया गया और लेखक ने अपनी यह मान्यता प्रकट की कि लोक-प्रशासन का मुख्य लक्ष्य दक्षता और मितव्ययता है। ह्नाइट की पुस्तक के अनेक संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं और वह आज भी प्रचलन में ही नहीं है, बल्कि इसे लोक प्रशासन की महत्त्वपूर्ण कृति माना जाता है।

लोक-प्रशासन के विकास के इस प्रथम चरण की दो प्रमुख विशेषताएं रहीं - लोक-प्रशासन का उदय और राजनीतिक एवं प्रशासन के अलगाव में विश्वास।

द्वितीय चरण (1927 - 1937)[संपादित करें]

लोक-प्रशासन के इतिहास में द्वितीय चरण का प्रारंभ हम डब्ल्यू. एफ. विलोबी (W. F. Willoughby) की पुस्तक ‘लोक-प्रशासन के सिद्धांत’ (Principles of Public Administration) से मान सकते हैं। विलोबी ने यह प्रतिपादित कि लोक-प्रशासन में अनेक सिद्धान्त हैं जिनको क्रियान्वित करने में लोक-प्रशासन को सुधारा जा सकता है। वास्तव में यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि ह्नाइट और विलोबी के दोनों प्रवर्तक ग्रन्थों ने लोक-प्रशासन संबंधी पाठ्यपुस्तकों के प्रणयन और उसे अध्ययन की पद्धति का निर्धारण किया। इन दोनों ही पुस्तकों का रूप तकनीकी है जिनमें उन सभी प्रकार की सामान्य समस्याओं का अध्ययन किया गया है, जिन्हें ‘पोस्डकार्ब’ शब्द में समाहित किया जा सकता है। इन पुस्तकों में प्रशासकीय अध्ययन के विशिष्ट क्षेत्र में उठने वाली विषय-वस्तु संबंधी समस्याओं का वर्णन नहीं मिलता है। ये दोनों ही प्रवर्त्तक ग्रन्थ इस मान्यता पर आधारित हैं कि लोक-प्रशासन को राजनीति से पृथक् और स्वतंत्र होना चाहिए तथा इसके सिद्धान्तों को मोटे तौर पर सहज ही पहचाना और परिभाषित किया जा सकता है।

विलोबी की उपरोक्त पुस्तक के बाद अनेक विद्वानों ने लोक-प्रशासन पर पुस्तकें लिखनी शुरू कीं, जिनमें कुछ उल्लेखनीय नाम हैं- मेरी पार्कर फोलेट, हेनरी फेयोल, मूने (Mooney), रायली (Reiley) आदि। 1937 मेंं लूथर गुलिक तथा उर्विक ने मिलकर लोक-प्रशासन पर एक महत्त्वपूर्ण पुस्तक का सम्पादन किया जिसका नाम है ‘प्रशासन विज्ञान पर निबन्ध’ (Papers on the Science of the Administration)। द्वितीय चरण के इन सभी विद्वानों की यह मान्यता रही कि प्रशासन में सिद्धान्त होने के कारण यह एक विज्ञान है और इसीलिए इसके आगे 'लोक' शब्द लगाना उचित नहीं है। सिद्धान्त तो सभी जगह लागू होते हैं, चाहे वह 'लोक-क्षेत्र' हो या 'निजी-क्षेत्र'।

द्वितीय चरण की प्रमुखता विशेषता यही रही कि अब इस बात पर बल दिया गया कि प्रशासन के कुछ सिद्धान्त है। इससे इस विषय का सैद्धान्तिक स्वरूप उभरा। यह स्थिति किसी भी विषय को समृद्ध करने के लिए आवश्यक मानी जाती है।

तृतीय चरण (1938 - 1947)[संपादित करें]

अब प्रशासन में सिद्धान्तों को चुनौती देने का युग प्रारम्भ हुआ। सन् 1938 से 1947 तक का चरण लोक-प्रशासन के क्षेत्र में ध्वंसकारी अधिक रहा। सन् 1938 में चेस्टर बर्नार्ड की ‘कार्यपालिका के कार्य’ (The Functions of the Executive) नामक पुस्तक प्रकाशित हुई जिसमें प्रशासन के किसी भी सिद्धान्त का वर्णन नहीं किया गया। सन् 1946 में हरबर्ट ने अपने एक लेख में लोक-प्रशासन के तथाकथित सिद्धान्तों को नकारते हुए इन्हें ‘किवदंतियोंं’ की संज्ञा दी। सन् 1947 में राबर्ट डहाल (Robert Dahl) ने अपने एक लेख में यह सिद्ध करने का प्रयत्न किया कि लोक-प्रशासन विज्ञान नहीं है और इसको सिद्धान्त की खोज में मुख्यतः तीन बाधाओं का सामना करना पड़ता है-

  • प्रथम, विज्ञान ‘मूल्य-शून्य’ होता है जबकि प्रशासन ‘मूल्य-बहुल’ है;
  • द्वितीय, मनुष्यों के व्यक्तित्व समान नहीं होते और फलस्वरूप प्रशासन के कार्यों में विभिन्नता आ जाती है; एवं
  • तृतीय, वह सामाजिक ढांचा भी एक बाधा है जिसके अन्तर्गत लोक-प्रशासन पनपता है।

तृतीय चरण की प्रधानता यही रही कि लोक-प्रशासन का अध्ययन चुनौतियों और आलोचनाओं का शिकार बना, जिससे इस विषय की नई संभावनायें उजागर हुई।

चतुर्थ चरण (1948 - 1970)[संपादित करें]

यह चरण इस अर्थ में क्रांतिकारी अथवा ‘संकट का काल’ रहा कि लोक-प्रशासन जिन-जिन उपलब्धियों का गीत गा रहा था उन सभी को बेकार ठहरा दिया गया। हर्बर्ट साइमन ने जो युक्तिसंगत आलोचना की उसके फलस्वरूप ‘सिद्धान्तवादी’ विचारधारा अविश्वसनीय प्रतीत होने लगी। लोक-प्रशासन के स्वरूप के संबंध में अनेक संदेह उठ खड़े हुए, यह विवाद का विषय बन गया। इसलिए 1948 से 1970 के चरण को लोक-प्रशासन के ‘स्वरूप की संकटावस्था’ (Crisis of Identity) कहा गया है। इस युग में लोक-प्रशासन ने मोटे तौर पर दो रास्ते अपनाए -

  • प्रथम, कुछ विद्वान एक विषय के रूप में लोक प्रशासन को राजनीतिशास्त्र के अन्तर्गत लेकर आये;
  • द्वितीय, लोक-प्रशासन के विकल्प की खोज हुई।

जो विद्वान राजनीतिशास्त्र के अन्तर्गत आए उनका तर्क था कि लोक-प्रशासन राजनीति से निकला है और उसका अंग है। इस समय राजनीतिशास्त्र भी कुछ परिवर्तनों के दौर से गुजर रहा था और उसमें लोक-प्रशासन को पहले वाला महत्त्व नहीं दिया जा रहा था। स्वाभाविक था कि इस स्थिति में लोक-प्रशासन सौतेलेपन और अकेलेपन का अनुभव करने लगा। लोक-प्रशासन के जिस विकल्प की खोज हुई, वह था- ‘प्रशासनिक विज्ञान’ (Administrative Science)। लोक-प्रशासन, व्यापार प्रबंध (Business Administration) आदि ने मिलकर प्रशासनिक विज्ञान की नींव डाली। यह तर्क प्रस्तुत किया गया कि प्रशासन तो प्रशासन ही है, चाहे वह निजी क्षेत्र में हो या सार्वजनिक क्षेत्र में। 1956 में ‘एडमिस्ट्रेटिव साइन्स क्वार्टरली’ नामक पत्रिका का प्रकाशन प्रारंभ हुआ। वास्तव में यह बहुत अखरने वाली बात थी कि लोक-प्रशासन के अपने ‘निजी स्वरूप’ को आघात पहुंचा।

पंचम चरण (1971 से अब तक)[संपादित करें]

चतुर्थ चरण की आलोचनाएँ, प्रत्यालोचनाओं और चुनौतियों ने कुल मिलाकर लोक-प्रशासन का भला किया। लोक-प्रशासन का अध्ययन बहुचर्चित हो गया, नए-नए दृष्टिकोण विकसित हुए और फलस्वरूप लोक-प्रकाशन चहुंमुखी प्रगति के मार्ग पर आगे बढ़ा। अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र, मानवशास्त्र, मनोविज्ञान आदि विभिन्न शास्त्रों के विद्वान और अध्येता लोक-प्रशासन में रूचि लेने लगे। राजनीतिशास्त्र के अध्येता तो प्रारंभ से ही लोक-प्रशासन के अध्ययन में रूचि ले रहे थे। इन विभिन्न अध्ययनों और प्रयत्नों के फलस्वरूप लोक-प्रशासन ‘अन्तर्विषयी’ (Interdisciplinary) बन गया और आज यह तथ्य है कि समाजशास्त्रों में यदि कोई विषय सबसे अधिक ‘अन्तर्विषयी’ है तो वह लोक-प्रशासन ही है। इससे लोक-प्रशासन के वैज्ञानिक स्वरूप का विकास हुआ। इतना ही नहीं इससे लोक-प्रशासन के क्षेत्र का विस्तार होता गया और तुलनात्मक लोक-प्रशासन तथा विकास प्रशासन का प्रादुर्भाव हुआ। परम्परागत दृष्टिकोण की अपर्याप्तता, अनुसंधान के नए उपकरणों और नवीन सामाजिक संदर्भ, अन्तर्राष्ट्रीय निर्भरता आदि ने तुलनात्मक लोक-प्रशासन को जन्म दिया और उसे आगे बढ़ाया। लोक-प्रशासन के तुलनात्मक अध्ययन के परिणामों और प्रविधियों का समग्र लोक-प्रशासन के स्वरूप पर गंभीर प्रभाव पड़ा।

यह तथ्य उत्साहवर्द्धक और हर्षवर्द्धक है कि लोक-प्रशासन में आज पश्चिमी देशों का ही अध्ययन नहीं होता है, वरन् साम्यवादी तथा अफ्रीका और एशिया के देश भी इसकी परिधि में आ गए हैं। लोक-प्रकाशन एक संस्कृति विशेष के घेरे से निकल कर अन्य संस्कृतियों की ओर भी उन्मुख हुआ है जिसने इसे अधिक लाभ पहुंचाया है और लोक-प्रशासन के क्षितिज का विस्तार किया है। नवीन लोक-प्रशासन ने इस महत्त्वपूर्ण बात पर बल दिया है कि लोक-प्रशासन को सीधे समाज से जुड़ा होना चाहिए। नवीन लोक-प्रशासन विशुद्ध रूप से एक अमेरिकी धारणा है। भारत जैसे देश में नवीन लोक-प्रकाशन की धारणा या विचारों का प्रसार व्यापक रूप से नहीं हुआ है।

लोक प्रशासन के प्रमुख चिन्तक[संपादित करें]

इन्हें भी देखें[संपादित करें]