रूपरसिक

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रूपरसिक की निम्बार्क सम्प्रदाय के प्रसिद्ध रसिक भक्त कवियों में गणना की जाती हैं।[1]

जीवन परिचय[संपादित करें]

इन्होंने अपने हरिव्यास यशामृत में श्री हरिव्यासदेव को अपना गुरु स्वीकार किया है~~[1]

श्री हरिव्यास भजो मन भाई।
असरन सरन करन सुख दुख हर महा प्रेम घन आनन्ददाई।।
अतिदयाल जनपाल गुणागुण सकल लोक आचारज राई।
वेदन को अति ही दुल्लभ सो महावाणी आप बनाई।।
दंपति मिलन सनातन मारग भजन रीति जा प्रभु दरसाई।
रूपरसिक रसिकन की जीवन महिमा अमित पार न पाई।।

इसी आधार पर इनका समय १७ वीं शताब्दी अनुमानित किया जा सकता है। किन्तु अपने लीलविंशति ग्रन्थ का रचनाकाल इन्होंने इस प्रकार दिया है;[1]

पंदरा सै रु सत्यासिया मासोत्तम आसोज।
यह प्रबन्ध पूरन भयो शुक्ला सुभ दिन द्योज।।

इस दोहे के आधार पर साम्प्रदायिक विद्वान रूपरसिक का समय सोलहवीं शताब्दी ठहराते हैं।[1]

रचनाएँ[संपादित करें]

रूपरसिक जी के तीन हस्तलिखित ग्रन्थ उपलब्ध हैं :

  1. बृहदुत्सव मणिमाल
  2. हरिव्यास यशामृत
  3. लीलाविंशति[1]

माधुर्य भक्ति का वर्णन[संपादित करें]

उक्त तीनों ग्रंथों में राधा-कृष्ण की प्रेम -लीलाओं का वर्णन करते समय रूपरसिक जी ने अपने उपास्य ,उपासना तथा उपासक भाव के प्रति जो विचार प्रकट किये हैं उनका सारांश इस प्रकार है :

  • रूपरसिक के उपास्य राधा-माधव सर्व समर्थ हैं।
  • राधा-माधव की राजधानी वृन्दावन है जहां ये भक्तों को अपनी वभिन्न लीलाओं से सुख प्रदान करते हुए सदा निवास करते हैं।
  • राधा-माधव की सेवा भक्त को अनायास ही आनन्द की प्राप्त हो जाती है।
हमारे राधा माधो धेय।
कहु बात की कमी न राखें जो चाहें सो देय।।
रजधानी वृन्दावन जैसी निगमागम की ज्ञेय।
अनायास ही रूपरसिक जन पावत सब सुख सेय।।

राधा-कृष्ण के विहार का दर्शन कर उसी के ध्यान में सदा लीन रहना ही इनकी उपासना एवं भजन-रीति है। इसी से सहज-प्रेम की प्राप्ति सम्भव है:

पिय लिय लगाय हिय सों प्रवीनि।
मन भायो सुख ले छाँड़ि दीनि।।
यह दम्पति को मधुरितु विलास।
गावै जो पावै प्रेमरास।।
महा मधुर मधुर ते अति अनूप।
रसपान करे होय रसिक रूप।।

बाह्य स्रोत[संपादित करें]

  • ब्रजभाषा के कृष्ण-काव्य में माधुर्य भक्ति :डॉ रूपनारायण :हिन्दी अनुसन्धान परिषद् दिल्ली विश्वविद्यालय दिल्ली के निमित्त :नवयुग प्रकाशन दिल्ली -७

सन्दर्भ[संपादित करें]