हरिव्यासदेव

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हरिव्यासदेवनिम्बार्क सम्प्रदाय के अत्यधिक प्रसिद्ध कवि हैं।[1]

जीवन परिचय[संपादित करें]

हरिव्यासदेव समय के विषय में साम्प्रदायिक विद्वानों में दो मत हैं।

  • प्रथम मत वालों के अनुसार हरिव्यासदेव जी समय वि० सं ० १४५० से १५२५ तक है।
  • दूसरे मत वाले इनका समय कुछ और पीछे ले जाते हैं। उनके विचार में वि ० सं ० १३२० ही श्री हरिव्यासदेव का ठीक समय है। ये दोनों ही मान्यतायें साम्प्रदायिक ग्रंथों अथवा अनुश्रुतियों पर आधारित हैं।[1]
  • हरिव्यासदेव का जन्म गौड़ ब्राह्मण कुल में हुआ था। आप श्रीभट्ट के अन्तरंग शिष्यों में से थे।[2] ऐसा प्रसिद्द है कि पर्याप्त काल तक तपस्या करने के बाद आप दीक्षा के अधिकारी बन सके थे। श्री नाभादास जी की भक्तमाल में हरिव्यासदेव जी के सम्बन्ध में निम्न छप्पय मिलता है:
खेचर नर की शिष्य निपट अचरज यह आवै।
विदित बात संसार संतमुख कीरति गावै।।
वैरागिन के वृन्द रहत संग स्याम सनेही।
ज्यों जोगेश्वर मध्य मनो शोभित वैदेही।।
श्री भट्ट चरन रज परसि के सकल सृष्टि जाकी नई।
श्री हरिव्यास तेज हरि भजन बल देवी को दीक्षा दई।।[1]

रचनाएँ[संपादित करें]

हरिव्यासदेव की संस्कृत में चार रचनाएँ उपलब्ध हैं ;

  1. सिद्धान्त रत्नांजलि ~ दशश्लोकी की बृहत टीका
  2. प्रेम भक्ति विवर्धिनी ~ निम्बार्क अष्टोत्तर शत नाम की टीका
  3. तत्वार्थ पंचक
  4. पंच संस्कार निरूपण

किन्तु ब्रजभाषा में हरिव्यासदेव जी की केवल एक रचना महावाणी उपलब्ध होती है।[1]

माधुर्य भक्ति का वर्णन[संपादित करें]

महावाणीकार के उपास्य राधा-कृष्ण प्रेम-रंग में रंगे हैं। दोनों वास्तव में एक प्राण हैं ~~ किन्तु उन्होंने दो विग्रह धारण किये हुए हैं। वे सदा संयोगावस्था में रहते हैं क्योंकि दूसरे का क्षणिक विछोह भी उन्हें सह्य नहीं है। अल्हादनी शक्ति-स्वरूपा राधा का स्थान श्रीकृष्ण की अपेक्षा विशिष्ट है।

मनमोहन वस कारिनी नखसिख रूप रसाल।
सो स्वामिनि नित गाइए रसिकनि राधा बाल।।[1]

प्रिया-प्रियतम के परस्पर प्रेम का स्वरुप भी विलक्षण है। इस प्रेम के वशीभूत वे नित्य-संयोग में नित्य-वियोग की अनुभूति करते है।

सदा अनमिले मिले तऊ लागे चहनि चहानि।
हौं बलि जाऊँ अहु कहा अरी अटपटी बानि।।

उनकी स्थिति यह है कि परस्पर छाती से छाती मिली है किन्तु फिर भी वे एक दूसरे में समा जाने के लिए व्याकुल हैं। पर राधा- कृष्ण का यह प्रेम सर्वथा विकार-शून्य है। इसी कारण वह मंगलकारी, आनन्द प्रदान करने वाला और सुधा की वर्षा करने वाला है।

सदा यह राज करो बलि जाऊँ दंपति को सुख सहज सनेह।
सुमंगलदा मनमोदप्रदा रसदायक लायक सुधा को सो मेह।।

दोनों के इस प्रेम की चरम अभिव्यक्ति सूरत में होती है। इसीलिये महावाणी में में विहार-लीन नवल-किशोर के ध्यान का निर्देश किया गया है ~

सब निशि बीती खेल में तउ उर अधिक उमंग।
ऐसे नवलकिशोरवर , हियरे बसौ अभंग।।[1]

बाह्य स्रोत[संपादित करें]

  • ब्रजभाषा के कृष्ण-काव्य में माधुर्य भक्ति :डॉ रूपनारायण :हिन्दी अनुसन्धान परिषद् दिल्ली विश्वविद्यालय दिल्ली के निमित्त :नवयुग प्रकाशन दिल्ली -७(1962)

सन्दर्भ[संपादित करें]