रावल मल्लिनाथ

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'रावल मल्लिनाथ'

राजस्थान के लोकसन्त हैं। वह और उनकी पत्नी रानी रूपादे को पश्चिमी राजस्थान में लोग सन्त की तरह पूजते हैं।


      • मालानी के लोक देवता रावल मल्लिनाथ जी-***

मल्लिनाथजी अत्यंत पराक्रमी थे। आपने पराक्रम के सहारे उन्होंने पूरे महेवा क्षेत्र को अपने अधिकार में कर लिया, यही क्षेत्र बाद में उनके नाम से मालाणी के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इस प्रदेश में उनके वंशजों का ही कब्जा रहा। सिद्ध पुरुष के रूप में विख्यात हुए| मल्लीनाथ मारवाड़ के राव सलखाजी के पुत्र थे। मुंहता नैणसी के अनुसार "मल्लिनाथ केवल सिद्ध पुरुष ही नहीं थे, अपितु उनको देवताओं के चमत्कार भी प्राप्त थे। वे भविष्य में घटने वाली बातों को पहले ही जान लेते थे।"


यह कहा जाता है कि एक सिद्ध साधु के आशीर्वाद से ही उन्होंने रावल पदवी धारण की थी। इसी कारण उनके वंशज रावल कहलाते हैं। मारवाड़ के लोग उनको सिद्ध तथा अवतारी पुरुष मानते रहे हैं तथा इसका प्रमाण है, लूणी नदी के किनारे बसे बाडमेर जिले के तिलवाड़ा गाँव में बना हुआ इनका मंदिर, जहाँ प्रतिवर्ष चैत्र महीने में एक विशाल मेला लगता है। इसके अतिरिक्त जोधपुर के मंडोर में स्थित देवताओं तथा वीरों की साल में भी घोड़े पर सवार मल्लीनाथ जी की प्रतिमा भी इसका प्रमाण है।

'जोधपुर राज्य री ख्यात' के अनुसार रावसलखा के जयेष्ठ पुत्र के रूप में मल्लिनाथ का जन्म वि. सं. 1395 (ई. स. 1338) में बाड़मेर जिले के सिवाणा के गोपड़ी गाँव में हुआ था। पिता के स्वर्गवास के बाद बारह वर्ष की उम्र में वे अपने काका राव कान्हड़देव के पास चले गए। राव कान्हड़देव ने इनके कार्य करने की कुशलता से प्रसन्न हो कर थोड़े ही समय में राज्य का समस्त प्रबंध इनको सौंप दिया।

एक बार दिल्ली के बादशाह की ओर से कुछ व्यक्तियों के साथ एक अधिकारी दंड वसूल करने के आए। सरदारों की राय से कान्हड़देव ने दंड नहीं देने तथा दंड वसूल ने आये लोगों को मारने का फैसला किया। लेकिन मल्लिनाथ ने कूटनीति का सहारा लेते हुए उस अधिकारी कि अत्यंत खातिरदारी की तथा उसको सही-सलामत दिल्ली भेज दिया। इस बात पर बादशाह ने उनको महेवा की रावलाई का सौंप दी। किन्तु कुछ इतिहासकार इस बात को सच नहीं मानते हैं। जब कान्हड़देव का देहांत हो गया तब मल्लिनाथ ने सोचा कि बादशाह ने उन्हें रावलाई तो दे दी किन्तु जब तक त्रिभुवनसी जिन्दा है, तब तक महेवा राज्य मेरे हाथ नहीं लगेगा। इसलिए उन्होंने महेवा के शासक त्रिभुवनसी को उसी के भाई पद्मसिंह के हाथों मरवा दिया। त्रिभुवनसी के मरने के बाद शुभ मुहूर्त देख कर मल्लिनाथ महेवा पहुँच कर राजगद्दी पर बैठे। उन्होंने चारो तरफ घोषणा करवाई और धीरे-धीरे लगभग सभी राजपूत आकर उनसे मिल गए व उन्हें समर्थन दिया। इस तरह उनकी धाक दिनों-दिन बढ़ने लगी।


मल्लिनाथ ने मंडोर, मेवाड़, आबू तथा सिंध के मध्य लूट-मार करके जब मुसलमानों को तंग करना शुरू किया तब उनकी एक बहुत बड़ी सेना ने उन पर चढा़ई कर दी, जिसमें 13 दल थे। मल्लिनाथ ने इन सभी 13 दलों कोहरा दिया। 'जोधपुर राज्य री ख्यात' के अनुसार यह घटना वि. सं. 1435 (ई. सं. 1378) में हुई थी। इस हार का बदला लेने के लिए मालवा के सूबेदार ने खुद इन पर चढाई कर दी, किन्तु मल्लिनाथ की शूरवीरता और युद्ध कौशल के सामने वो टिक नहीं सका।

मारवाड़ में ये अधदूहा अत्यंत प्रसिद्ध है -

"तेरा तुंगा भांगिया, मालै सलखाणीह।"

अर्थात सलखा के बेटे मालौ ने अपने अनूठे पराक्रम से मुसलमानों की फौज के तेरह दलों (तुंगां) को हरा दिया।

मल्लिनाथ ने सालोड़ी गाँव अपने भतीजे चूंडे (राव वीरम के पुत्र) को दिया था तथा नागौर के ऊपर चढ़ाई करने में उसकी मदद की थी।इसके अलावा उन्होंने मुसलामानों से छीनकर सिवाना को अपने छोटे भाई जैतमाल को, खेड़ (किसी-किसी ख्यात में भिरड़कोट) को अपने सोतैले भाई वीरम को, तथा ओसियां को अपने सोतैलै भाई शोभित को जागीर की रूप में दिया था। दरअसल ओसियां पर उस समय पंवारों का कब्जा था और मल्लिनाथ की इजाजत से शोभित ने उनको हरा कर उसपर कब्ज़ा किया था।

रावल मल्लिनाथ महान वीर और नीतिज्ञ शासक थे। उन्होंने न केवल राठौड़ों के राज्य का विस्तार किया बल्कि उसको मजबूती भी प्रदान की। मल्लिनाथ का स्वर्गवास वि. सं. 1456 (ई.स. 1399) में हुआ। कुछ​इतिहासकारों के मुताबिक मल्लिनाथ के 5 पुत्र थे और इतिहासकार ओझा के अनुसार 9थे, जिसमें सबसे बड़ा पुत्र होने के कारण जगमाल पाटवी था।

अपने आख़िरी दिनों में साधुवृत्ति धारण करने के कारण रावल मल्लिनाथ को सिद्ध-जोगी के रूप में आज भी मारवाड़ में याद किया जाता है। उन्हें चमत्कारी सिद्ध-पुरुष तथा वीर के रूप में तो याद किया ही जाता हैं, लेकिन एक पंथ को शुरू करने के कारण भी उनके अनेक शिष्य हुए थे। इनकी रानी रूपां देके चमत्कारों तथा संत उगमसी भाटी के उपदेशों से प्रभावित होकर वे उगमसी भाटी के उस पंथ में दीक्षित हुए जिसमें गुरु तथा ईश्वर भक्ति माध्यम से मानव जीवन को सार्थक बनाना प्रमुख ध्येय माना गया था। तिलवाड़ा की मल्लिनाथ समाधि, मंदिर एवं पशु मेला:- जोधपुर-बाड़मेर मार्ग पर लूणी नदी के किनारे बसा ग्राम तिलवाड़ा लोक देवता मल्लीनाथ का स्थल है। बालोतरा से दस किलोमीटर दूर लूणी नदी की तलहटी में राव मल्लीनाथ की समाधि स्थल पर मल्लीनाथ मन्दिर निर्मित है। यहां चैत्र कृष्णा सप्तमी से चैत्र शुक्ला सप्तमी तक 15 दिन का विशाल 'मल्लीनाथ तिलवाड़ा पशु मेला' भरता है,जहां देश के विभिन्न प्रान्तो, शहरों से आये पशुओं का क्रय-विक्रय होता है। मेले में ग्रामीण परिवेश, सभ्यता एवं संस्कृति का दर्शन करने देशी-विदेशी पर्यटक भी पहुंचते हैं। मेले के दौरान हजारों की संख्या में श्रृद्धालु मल्लीनाथ की समाधि पर नतमस्तक होते हैं।

लोक देवता के रूप में पूज्य मल्लिनाथ जी का जन्म विक्रम सावंत 1415 में महुआ नगर में हुआ|इनके पिता जी का नाम सलखा जी, माता का नाम जानी दे, पत्नी का नाम रूपादे | मल्लिनाथ जी ने अपने बाहुबल से न केवल अपने राज्य का विस्तार किया जबकि अपने भतीजे चुंडा जी को विक्रम संवत 1451 में मंडोर तथा 1454 में नागौर विजय में भी सहायता दी | विक्रम सावंत 1465 इन्होंने मारवाड़ के सारे संतों को सम्मिलित करके बड़ा भारी हरि संकीर्तन करवाया और कुंडा पंथ की स्थापना की|ऐसी मान्यता है कि श्री मल्लीनाथ जी एक भविष्य दृष्टा और चमत्कारी पुरुष थे|जिन्होंने विदेशी आक्रांताओं से जनसाधारण की रक्षा करने और जनता का मनोबल बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई|1378 में इन्होंने मालवा के सूबेदार निजामुद्दीन की सेना को परास्त किया|यह निर्गुण निराकार ईश्वर को मानते थे|तिलवाड़ा बाड़मेर में इनका प्रसिद्ध मंदिर है यहां पर राजस्थान का सबसे प्राचीन मेला जिसे मानते हैं वह हर वर्ष चैत्र कृष्ण एकादशी से चैत्र शुक्ल एकादशी तक भरता है|इनकी रानी रूपादे का मंदिर भी तिलवाड़ा से कुछ ही दूर माला जाल गांव में स्थित है| लोक मान्यता है कि बाड़मेर के मालाणी क्षेत्र का नाम इन्हीं के नाम पर पड़ा == बाहरी कड़ियाँ ==