राज्यश्री (नाटक)

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राज्यश्री जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित एक नाटक है। इसका प्रकाशन वर्ष 1915 है। इस नाटक में मालवा, स्थाणेश्वर, कन्नौज और मगध की राजपरिस्थितियों का वर्णन मिलता है। यह उनका प्रथम ऐतिहासिक नाटक है। इस नाटक का सारांश यह है, कि स्थानेश्वर में अपना राज्य स्थापित कर प्रभाकरवर्धन सीमा का विस्तार करता है और अपनी पुत्री राज्यश्री की विवाह कन्नौज राज ग्रहवर्मन से कर देता है। स्थानेश्वर और कन्नौज का उत्कर्ष देखकर मालवा और गौड़ ईर्ष्यालु बन जाते हैं। इन्हीं ईर्ष्यालु राजाओं के कुचक्रों की लीला इस नाटक में दृष्टिगोचर होता है।[1]

सन्दर्भ[संपादित करें]

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