रतिचित्रण

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पॉर्न या रतिचित्रण या रति चित्रण किसी पुस्तक, चित्र, फिल्म या अन्य किसी माध्यम से संभोग का चित्रण करना रतिचित्रण कहलाता है।[1] रतिचित्रण भारत मे प्रतिबंधित है । रतिचित्रण के कलाकार, रतिचित्रणकर्ता, इसकी बिक्री करने की सजा भारत मे 50 करोड़ जुर्माना तथा 40 साल की कैद अथवा उम्रकैद है। [2]

इतिहास[संपादित करें]

रतिचित्रण या पोर्न का फिल्म के रूप में निर्माण 1895 में हुए आविष्कार के बाद हुआ। जब एउगुने फिराऊ और अल्बर्ट किर्च्नर ने पहली बार इस तरह की फिल्म का निर्माण किया। यह फिल्म 1869 में प्रदर्शित हुई। यह एक फ्रेंच फिल्म थी। जिसमें एक औरत को नग्न किया जाता है। इसके बाद जब इस फिल्म बनाने वालों को लाभ हुआ तब अन्य फिल्म कारों ने इस पर ध्यान लगाया। जिसमें इंग्लैंड सबसे आगे निकल गया।

इस तरह के फिल्म निर्माता और बेचने वालों के लिए खजाने की तरह था। इसके फिल्म का मूल रूप से निर्माण 1920 के आसपास होना शुरू हुआ। जिसके लिए फ्रांस और अमेरिका मुख्य स्थान थे। इस फिल्म को बनाना और बेचना दोनों ही बहुत कठिन था। इसके बेचने का कार्य पूर्ण रूप से अकेले में किया जाता था। क्योंकि यह कई देशों में प्रतिबंधित है। इस कारण इसके बेचने के लिए यह गुप्त रूप से आयात निर्यात करते थे।

अब भारत के उत्तराखंड राज्य में उच्च न्यायालय द्वारा राज्य में रतिचित्रण से जुड़े जालस्थलों पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। इसके बाद भारत सरकार पॉर्नहब और उस जैसे 827 जालस्थलों को इंटरनेट सुविधा प्रदानकर्ताओं के माध्यम से प्रतिबंधित कर चुकी है। थे[3]

वर्गीकरण[संपादित करें]

पोर्न के नुकसान[संपादित करें]

पोर्न फिल्में देखने का असर न केवल पुरुषों या लड़को पर बल्कि लड़कियों पर पोर्न फिल्मों का असर भी पड़ता है, लड़कियों पर पोर्न फिल्मों का प्रभाव काफी अधिक व्यापक होता है, इससे न सिर्फ दिमाग पर नाकारात्मक असर पड़ता है बल्कि उसकी मानसिक स्थिती भी काफी ज्यादा खराब हो जाती है, तो आइय़े आपको बताते हैं कि लड़कियों पर पोर्न फिल्मों का प्रभाव क्या होता है.

  • सेक्स की लत

नियमित रुप से पोर्न फिल्मे देखने का जो पहला बुरा प्रभाव होता है वह है सेक्स की गन्दी लत, अश्लील सामग्री से यौन उत्तेजना या कामोत्तेजक करने की कामना काफी ज्यादा बढ़ती है और धीरे धीरे लड़कियां इसकी आदी हो जाती हैं, पोर्नोग्राफ़ी बहुत रोमांचक और पॉवरफुल इमेजरी प्रदान करती थी, जिसे वे हमेशा महसूस करती रहना चाहती हैं और उनकी कल्पनाएं कुछ इसी तरह कि हो जाती हैं, एक बार इस बुरी लत की आदी हो जाने पर वे तलाक, परिवार को नुकसान और कानूनी समस्याएं (जैसे यौन उत्पीड़न, उत्पीड़न या साथी कर्मचारियों का दुरुपयोग) जैसी परेशानियों में बुरी तरह से फंस सकती हैं.

  • दिमाग पर एडल्ट फिल्मों का प्रभाव

एडल्ट फिल्में देखने के प्रभाव लड़के और लड़कियों इन दोनों पर पड़ता अलग तरह से पड़ते है, शोधकरता के मुताबिक, जो पुरुष या महिला काफी मात्रा में इस तरह की वीडियो देखते हैं उनके दिमाग की रचनात्मकता धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगती है, किए गए रिसर्च के माने तो, इस प्रकार के वीडियो देखने वाले लोगों में याददाश्त कम होने की समस्या भी आने लगती हैं, लड़कियों पर पोर्न फिल्मों का प्रभाव उनकी यादाश्त शक्ति के कम होने के रुप में दिखाई देता है, हमेशा पोर्न देखने से दिमाग की मांसपेशियां शिथिल हो जाती हैं और सिकुड़ सी जाती हैं, जो की अच्छी बात नहीं है.

  • अवैध सम्बन्धों को बढ़ावा

लड़कियों पर पोर्न फिल्मों का असर सबसे भयानक और नुकसानदेह तब हो जाता है, जब वो इस तरह की वीडियो लगातार देखने लग जाती है, और इसका असर उन पर इस हद तक पड़ता है की अपनी लालसा पूरा करने के चक्कर में अवैध सम्बन्धों में बांध जाती है. इस तरह की अवैध संबंध न सिर्फ लड़की के लिए बल्कि साथ साथ हमारे भारतीय समाज के लिए भी खतरा बन जाता है. आपको बता दें की लगातार एडल्ट फिल्में देखने पर दिन पर दिन इसके प्रति जिज्ञासा और बढ़ जाती है, जो की उनके स्वस्थ के लिए भी हानिकारक हो सकता है. अपने दिमाग को पूर्ण रूप से शान्ति पहुँचाने और अपने शरीर की उत्तेजना पर काबू न रहने के कारण अक्सर वो ये गलत कदम उठा लेती हैं.

  • समाज से अलगाव

पोर्न मूवी भले ही हिंदुस्तान में सबसे ज्यादा देखी जाती हो, लेकिन, आज भी लोगो इन्हें छुप छुप कर ही देखते है, अगर किसी को इसकी बुरी लत लग जाये तो लोग उससे दूरी बनाना शुरु कर देते हैं, भले ही हुमेरा देश 21 वीं सदी में खड़ा हो गया है, लेकिन आज भी हमारे देश भारत में महिलाओं के पोर्न देखने की बात समाज को अच्छी नहीं लगती है.

पोर्न की समस्या और अमेरिका[संपादित करें]

अमेरिकी समाज पोर्न में पूरी तरह पोर्न में डूब चुका है। समाज को पोर्न में डुबाने में बहुराष्ट्रीय मीडिया कंपनियां और कारपोरेट हाउस सबसे आगे हैं। हमारे देश में जो लोग अमेरिकीकरण के काम में लगे हैं उन्हें यह ध्यान रखना होगा कि भारतीय समाज का अमरीकीकरण करने का अर्र्थ है पोर्न में डुबो देना। पोर्न में डूब जाने का अर्थ है संवेदनहीन हो जाना। अमेरिकी समाज क्रमश: संवेदनहीनता की दिशा में आगे जा रहा है। संवेदनहीनता का आलम यह है कि समाज में बेगानापन बढ रहा है। जबकि सामाजिक होने का अर्थ है कि व्यक्ति सामाजिक संबंध बनाए, संपर्क रखे, एक-दूसरे के सुख-दुख में साझेदारी निभाएं। अमेरिकी समाज में वे ही लोग प्रभावशाली हैं जिनके पास वित्तीय सुविधाएं हैं, पैसा है। उनका ही मीडिया और कानून पर नियंत्रण है।

अमेरिकी समाज पोर्न में पूरी तरह पोर्न में डूब चुका है। समाज को पोर्न में डुबाने में बहुराष्ट्रीय मीडिया कंपनियां और कारपोरेट हाउस सबसे आगे हैं। हमारे देश में जो लोग अमेरिकीकरण के काम में लगे हैं उन्हें यह ध्यान रखना होगा कि भारतीय समाज का अमरीकीकरण करने का अर्र्थ है पोर्न में डुबो देना। पोर्न में डूब जाने का अर्थ है संवेदनहीन हो जाना। अमेरिकी समाज क्रमश: संवेदनहीनता की दिशा में आगे जा रहा है। संवेदनहीनता का आलम यह है कि समाज में बेगानापन बढ रहा है। जबकि सामाजिक होने का अर्थ है कि व्यक्ति सामाजिक संबंध बनाए, संपर्क रखे, एक-दूसरे के सुख-दुख में साझेदारी निभाएं। अमेरिकी समाज में वे ही लोग प्रभावशाली हैं जिनके पास वित्तीय सुविधाएं हैं, पैसा है। उनका ही मीडिया और कानून पर नियंत्रण है। मनोवैज्ञानिकों के यहां पोर्न और वेश्यावृत्ति एक ही कोटि में आते हैं। पोर्न वे लोग देखते हैं जो दमित कामेच्छा के मारे हैं। अथवा जीवन में मर्दानगी नहीं दिखा पाए हैं। वे लोग भी पोर्न ज्यादा देखते हैं जो यह मानते हैं कि पुरूष की तुलना में औरत छोटी, हेय होती है।ये ऐसे लोग हैं जो स्त्री के भाव, संवेदना, संस्कार, आचार- विचार, नैतिकता आदि किसी में भी आस्था नहीं रखते अथवा इन सब चीजों से मुक्त होकर स्त्री को देखते हैं। पोर्न देखने वाला अपने स्त्री संबंधी विचारों को बनाए रखना चाहता है। वह औरत को वस्तु की तरह देखता है। उसे समान नहीं मानता। पोर्न ऐसे भी लोग देखते हैं जो पूरी तरह स्त्री के साथ संबंध नहीं बना पाते।स्त्री के सामने अपने को पूरी तरह खोलते नहीं है। संवेदनात्मक अलगाव में जीते है। संवेदनात्मक अलगाव में जीने के कारण ही इन लोगों को पोर्न अपील करता है। पोर्न देखने वालों में कट्टर धर्मिक मान्यताओं के लोग भी आते हैं जो यह मानते हैं कि औरत तो नागिन होती है, राक्षसनी होती है। पोर्न का दर्शक अपने विचारों में अयथार्थवादी होता है। उसके यहां मर्द और वास्तव औरत के बीच विराट अंतराल होता है। जिस व्यक्ति को पोर्न देखने की आदत पड़ जाती है वह इससे सहज ही अपना दामन बचा नहीं पाता। पोर्न को देखे विना कामोत्तेजना पैदा नहीं होती। वह लगातार पोर्न में उलझता जाता है। अंत में पोर्न से बोर हो जाता है तो पोर्न के दृश्य उत्तेजित करने बंद कर देते हैं। इसके बाद वह पोर्न दृश्यों को अपनी जिन्दगी में उतारने की कोशिश करता है। यही वह बिन्दु है जहां से स्त्री का कामुक उत्पीडन, बलात्कार आदि की घटनाएं तेजी से घटने लगती हैं।यह एक सच है कि शर्म के मारे 90 फीसदी बलात्कार की घटनाओं की रिपोर्टिंग तक नहीं होती। अमेरिकी समाज में एक-तिहाई बलात्कारियों ने बलात्कार की तैयारी के लिए पोर्न की मदद ली। जबकि बच्चों का कामुक शोषण करने वालों की संख्या 53 फीसदी ने पोर्न की मदद ली।पोर्न की प्रमुख विषयवस्तु होती है निरीह स्त्री पर वर्चस्व

अमेरिकी समाज पोर्न में पूरी तरह पोर्न में डूब चुका है। समाज को पोर्न में डुबाने में बहुराष्ट्रीय मीडिया कंपनियां और कारपोरेट हाउस सबसे आगे हैं। हमारे देश में जो लोग अमेरिकीकरण के काम में लगे हैं उन्हें यह ध्यान रखना होगा कि भारतीय समाज का अमरीकीकरण करने का अर्र्थ है पोर्न में डुबो देना। पोर्न में डूब जाने का अर्थ है संवेदनहीन हो जाना। अमेरिकी समाज क्रमश: संवेदनहीनता की दिशा में आगे जा रहा है। संवेदनहीनता का आलम यह है कि समाज में बेगानापन बढ रहा है। जबकि सामाजिक होने का अर्थ है कि व्यक्ति सामाजिक संबंध बनाए, संपर्क रखे, एक-दूसरे के सुख-दुख में साझेदारी निभाएं। अमेरिकी समाज में वे ही लोग प्रभावशाली हैं जिनके पास वित्तीय सुविधाएं हैं, पैसा है। उनका ही मीडिया और कानून पर नियंत्रण है। मनोवैज्ञानिकों के यहां पोर्न और वेश्यावृत्ति एक ही कोटि में आते हैं। पोर्न वे लोग देखते हैं जो दमित कामेच्छा के मारे हैं। अथवा जीवन में मर्दानगी नहीं दिखा पाए हैं। वे लोग भी पोर्न ज्यादा देखते हैं जो यह मानते हैं कि पुरूष की तुलना में औरत छोटी, हेय होती है।ये ऐसे लोग हैं जो स्त्री के भाव, संवेदना, संस्कार, आचार- विचार, नैतिकता आदि किसी में भी आस्था नहीं रखते अथवा इन सब चीजों से मुक्त होकर स्त्री को देखते हैं। पोर्न देखने वाला अपने स्त्री संबंधी विचारों को बनाए रखना चाहता है। वह औरत को वस्तु की तरह देखता है। उसे समान नहीं मानता। पोर्न ऐसे भी लोग देखते हैं जो पूरी तरह स्त्री के साथ संबंध नहीं बना पाते।स्त्री के सामने अपने को पूरी तरह खोलते नहीं है। संवेदनात्मक अलगाव में जीते है। संवेदनात्मक अलगाव में जीने के कारण ही इन लोगों को पोर्न अपील करता है। पोर्न देखने वालों में कट्टर धर्मिक मान्यताओं के लोग भी आते हैं जो यह मानते हैं कि औरत तो नागिन होती है, राक्षसनी होती है। पोर्न का दर्शक अपने विचारों में अयथार्थवादी होता है। उसके यहां मर्द और वास्तव औरत के बीच विराट अंतराल होता है। जिस व्यक्ति को पोर्न देखने की आदत पड़ जाती है वह इससे सहज ही अपना दामन बचा नहीं पाता। पोर्न को देखे विना कामोत्तेजना पैदा नहीं होती। वह लगातार पोर्न में उलझता जाता है। अंत में पोर्न से बोर हो जाता है तो पोर्न के दृश्य उत्तेजित करने बंद कर देते हैं। इसके बाद वह पोर्न दृश्यों को अपनी जिन्दगी में उतारने की कोशिश करता है। यही वह बिन्दु है जहां से स्त्री का कामुक उत्पीडन, बलात्कार आदि की घटनाएं तेजी से घटने लगती हैं।यह एक सच है कि शर्म के मारे 90 फीसदी बलात्कार की घटनाओं की रिपोर्टिंग तक नहीं होती। अमेरिकी समाज में एक-तिहाई बलात्कारियों ने बलात्कार की तैयारी के लिए पोर्न की मदद ली। जबकि बच्चों का कामुक शोषण करने वालों की संख्या 53 फीसदी ने पोर्न की मदद ली।पोर्न की प्रमुख विषयवस्तु होती है निरीह स्त्री पर वर्चस्व।

पोर्न का इतिहास बड़ा पुराना प्राचीन ग्रीक समाज से लेकर भारत,चीन आदि तमाम देशों में पोर्न रचनाएं रची जाती रही हैं। किन्तु सन् 1800 के पहले तक पोर्न सामाजिक समस्या नहीं थी।किन्तु सन् 1800 के बाद से आधुनिक तकनीकी विकास, प्रिण्टिंग प्रेस, फिल्म, टीवी, इंटरनेट आदि के विकास के साथ-साथ जनतंत्र और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के उदय ने पोर्न को एक सामाजिक समस्या बना दिया है। मीडिया ने पोर्न और सेक्स को टेबू नहीं रहने दिया है। आज पोर्न सहज ही उपलब्ध है। सामान्य जीवन में पोर्नको जनप्रिय बनाने में विज्ञापनों की बड़ी भूमिका है। विज्ञापनों के माध्यम दर्शक की कामुक मानसिकता बनी है। कल तक जो विज्ञापन की शक्ति थी आज पोर्न की शक्ति बन चुकी है।आज पोर्न संगीत वीडियो से लेकर फैशन परेड तक छायी हुई है। वे वेबसाइड जो एमेच्योर पोर्न के नाम पर आई उनमें सेक्स के दृश्य देख्रकर लों में पोर्न के प्रति आकर्षण बढ़ा। स्कूल-कॉलज पढ़ने जाने वाली लड़कियां बड़े पैमाने ट्यूशन पढ़ने के बहाने अपने घर से निकलती थी। और छुपकर पोन्र का आनंद लेती थीं।इसके लिए वे वेबकॉम का इस्तेमाल करती थीं। वेबकास्ट की तकनीक का इस्तेमाल करने के कारण कम्प्यूटर पर प्रतिदिन अनेकों नयी वेबसरइट आने लगीं। लाइव शो आने लगे।इनमें नग्न औरत परेड करती दिखाई जाती है,सेक्स करते दिखाई जाती है। पोर्न के निशाने पर युवा दर्शक हैं। फे्रडरिक लेन (थर्ड) ने ”ऑवसीन प्रोफिटस:दि इंटरप्रिनर्स ऑफ पोर्नोग्राफी इन दि साइबर एज” में लिखा है कि पोर्न के विकास में वीसीआर और इंटरनेट तकनीक ने केन्द्रीय भूमिका अदा की है।

सामान्य तौर पर अमेरिकी मीडिया पर नजर डालें तो पाएंगे कि सन् 1999 में अमेरिका में उपभोक्ता पत्रिकाओं की बिक्री और विज्ञापन से होने वाली आमदनी 7.8 विलियन डालर थी,टेलीविजन 32 .3विलियन डालर, केबल टीवी 45..5 विलियन डालर, पेशेवर और शैक्षणिक प्रकाशन 14.8विलियन डालर, वीडियो किराए से वैध आमदनी 200 विलियन डालर सन् 2000 में आंकी गयी। विज्ञान इतिहासकार मैकेजी के अनुसार विश्व के सकल मीडिया उद्योग की आमदनी 107 ट्रिलियन डालर सन् 2000 में आंकी गयी। यानी पृथ्वी पर रहने वाले प्रति व्यक्ति 18000 हजार डालर। हेलेन रेनॉल्ड ने लिखा कि अमेरिका में सन् 1986 में सेक्स उद्योग में पचास लाख वेश्याएं थीं। जनकी सालाना आय 20 विलियन डालर थी। एक अनुमान के अनुसार सन् 2003 तक सारी दुनिया में कामुक (इरोटिका) सामग्री की बिक्री 3 विलियन डालर तक पहुँच जाने का अनुमान लगाया गया।फरवरी 2003 में ‘विजनगेन’ नामक संस्था ने अनुमान व्यक्त किया कि सन् 2006 तक ऑनलाइन पोर्न उद्योग 70 विलियन डालर का आंकडा पार कर जाएगा।

अमेरिकी समाज पोर्न में पूरी तरह पोर्न में डूब चुका है। समाज को पोर्न में डुबाने में बहुराष्ट्रीय मीडिया कंपनियां और कारपोरेट हाउस सबसे आगे हैं। हमारे देश में जो लोग अमेरिकीकरण के काम में लगे हैं उन्हें यह ध्यान रखना होगा कि भारतीय समाज का अमरीकीकरण करने का अर्र्थ है पोर्न में डुबो देना। पोर्न में डूब जाने का अर्थ है संवेदनहीन हो जाना। अमेरिकी समाज क्रमश: संवेदनहीनता की दिशा में आगे जा रहा है। संवेदनहीनता का आलम यह है कि समाज में बेगानापन बढ रहा है। जबकि सामाजिक होने का अर्थ है कि व्यक्ति सामाजिक संबंध बनाए, संपर्क रखे, एक-दूसरे के सुख-दुख में साझेदारी निभाएं। अमेरिकी समाज में वे ही लोग प्रभावशाली हैं जिनके पास वित्तीय सुविधाएं हैं, पैसा है। उनका ही मीडिया और कानून पर नियंत्रण है। मनोवैज्ञानिकों के यहां पोर्न और वेश्यावृत्ति एक ही कोटि में आते हैं। पोर्न वे लोग देखते हैं जो दमित कामेच्छा के मारे हैं। अथवा जीवन में मर्दानगी नहीं दिखा पाए हैं। वे लोग भी पोर्न ज्यादा देखते हैं जो यह मानते हैं कि पुरूष की तुलना में औरत छोटी, हेय होती है।ये ऐसे लोग हैं जो स्त्री के भाव, संवेदना, संस्कार, आचार- विचार, नैतिकता आदि किसी में भी आस्था नहीं रखते अथवा इन सब चीजों से मुक्त होकर स्त्री को देखते हैं। पोर्न देखने वाला अपने स्त्री संबंधी विचारों को बनाए रखना चाहता है। वह औरत को वस्तु की तरह देखता है। उसे समान नहीं मानता। पोर्न ऐसे भी लोग देखते हैं जो पूरी तरह स्त्री के साथ संबंध नहीं बना पाते।स्त्री के सामने अपने को पूरी तरह खोलते नहीं है। संवेदनात्मक अलगाव में जीते है। संवेदनात्मक अलगाव में जीने के कारण ही इन लोगों को पोर्न अपील करता है। पोर्न देखने वालों में कट्टर धर्मिक मान्यताओं के लोग भी आते हैं जो यह मानते हैं कि औरत तो नागिन होती है, राक्षसनी होती है। पोर्न का दर्शक अपने विचारों में अयथार्थवादी होता है। उसके यहां मर्द और वास्तव औरत के बीच विराट अंतराल होता है। जिस व्यक्ति को पोर्न देखने की आदत पड़ जाती है वह इससे सहज ही अपना दामन बचा नहीं पाता। पोर्न को देखे विना कामोत्तेजना पैदा नहीं होती। वह लगातार पोर्न में उलझता जाता है। अंत में पोर्न से बोर हो जाता है तो पोर्न के दृश्य उत्तेजित करने बंद कर देते हैं। इसके बाद वह पोर्न दृश्यों को अपनी जिन्दगी में उतारने की कोशिश करता है। यही वह बिन्दु है जहां से स्त्री का कामुक उत्पीडन, बलात्कार आदि की घटनाएं तेजी से घटने लगती हैं।यह एक सच है कि शर्म के मारे 90 फीसदी बलात्कार की घटनाओं की रिपोर्टिंग तक नहीं होती। अमेरिकी समाज में एक-तिहाई बलात्कारियों ने बलात्कार की तैयारी के लिए पोर्न की मदद ली। जबकि बच्चों का कामुक शोषण करने वालों की संख्या 53 फीसदी ने पोर्न की मदद ली।पोर्न की प्रमुख विषयवस्तु होती है निरीह स्त्री पर वर्चस्व।

पोर्न का इतिहास बड़ा पुराना प्राचीन ग्रीक समाज से लेकर भारत,चीन आदि तमाम देशों में पोर्न रचनाएं रची जाती रही हैं। किन्तु सन् 1800 के पहले तक पोर्न सामाजिक समस्या नहीं थी।किन्तु सन् 1800 के बाद से आधुनिक तकनीकी विकास, प्रिण्टिंग प्रेस, फिल्म, टीवी, इंटरनेट आदि के विकास के साथ-साथ जनतंत्र और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के उदय ने पोर्न को एक सामाजिक समस्या बना दिया है। मीडिया ने पोर्न और सेक्स को टेबू नहीं रहने दिया है। आज पोर्न सहज ही उपलब्ध है। सामान्य जीवन में पोर्नको जनप्रिय बनाने में विज्ञापनों की बड़ी भूमिका है। विज्ञापनों के माध्यम दर्शक की कामुक मानसिकता बनी है। कल तक जो विज्ञापन की शक्ति थी आज पोर्न की शक्ति बन चुकी है।आज पोर्न संगीत वीडियो से लेकर फैशन परेड तक छायी हुई है। वे वेबसाइड जो एमेच्योर पोर्न के नाम पर आई उनमें सेक्स के दृश्य देख्रकर लों में पोर्न के प्रति आकर्षण बढ़ा। स्कूल-कॉलज पढ़ने जाने वाली लड़कियां बड़े पैमाने ट्यूशन पढ़ने के बहाने अपने घर से निकलती थी। और छुपकर पोन्र का आनंद लेती थीं।इसके लिए वे वेबकॉम का इस्तेमाल करती थीं। वेबकास्ट की तकनीक का इस्तेमाल करने के कारण कम्प्यूटर पर प्रतिदिन अनेकों नयी वेबसरइट आने लगीं। लाइव शो आने लगे।इनमें नग्न औरत परेड करती दिखाई जाती है,सेक्स करते दिखाई जाती है। पोर्न के निशाने पर युवा दर्शक हैं। फे्रडरिक लेन (थर्ड) ने ”ऑवसीन प्रोफिटस:दि इंटरप्रिनर्स ऑफ पोर्नोग्राफी इन दि साइबर एज” में लिखा है कि पोर्न के विकास में वीसीआर और इंटरनेट तकनीक ने केन्द्रीय भूमिका अदा की है।

विशेषज्ञों में यह सवाल चर्चा के केन्द्र में है कि आखिरकार कितनी संख्या में पोर्न वेबसाइट हैं। एक अनुमान के अनुसार तीस से लेकर साठ हजार के बीच में पोर्न वेबसाइट हैं। ओसीएलसी का मानना है कि 70 हजार व्यावसायिक साइट हैं। इसके अलावा दो लाख साइट शिक्षा की आड़ में चलायी जा रही हैं। कुछ लोग यह मानते हैं कि वयस्क सामग्री अरबों खरबों पन्नों में है। सन् 2003 में ‘डोमेनसरफर’ द्वारा किए गए एक सर्वे से पता चला कि एक लाख सडसठ हजार इकहत्तर वेवसाइट ऐसी हैं जिसमें सेक्स पदबंध शामिल है। बत्तीस हजार नौ सौ बहत्तर में गुदा (अनल) पदबंध शामिल है। उन्नीस हजार दो सौ अडसठ में एफ (संभोग) पदबंध शामिल है। चार सौ सात में स्तन, तिरपन हजार चौरानवे में पोर्न, उनतालीस हजार चार सौ पिचानवे में एक्सएक्सएक्स पदबंध शामिल है। ‘अलटाविस्टा’ के अनुसार पोर्न के तीस लाख पन्ने हैं। असल संख्या से यह आंकड़ा काफी कम है। अकेले गुगल के ‘हिटलर’ सर्च में 1.7मिलियन पन्ने हैं। जबकि ‘कित्तिन’ में 1.2 मिलियन पन्ने हैं। ‘डाग’ में 17मिलियन पन्ने हैं।’सेक्स’ में 132 मिलियन पन्ने हैं। सन् 2003 में गुगल में 126 मिलियन पोर्न पन्ने थे। वयस्क उद्योग में कितने लोग काम करते हैं। इसका सारी दुनिया का सटीक आंकडा उपलब्ध नहीं है, इसके बावजूद कुछ आंकड़े हैं जो आंखें खोलने वाले हैं। आस्टे्रलिया इरोज फाउण्डेशन के अनुसार आस्ट्रेलिया में छह लाख छियालीस हजार लोग के वयस्क वीडियो के पता संकलन में थे।तकरीबन 250 दुकानें थीं जिनका सालाना कारोबार 100 मिलियन डालर था।इसके अलावा 800 वैध और 350 अवैध वेश्यालय, आनंद सहकर्मी, मेसाज पार्लर थे। सालाना 12 लाख लोग सेक्स वर्कर के यहां जाते हैं। यह आंकडा खाली आस्ट्रेलिया का है। इसी तरह वेब पर जाने वाले दस में चार लोग सेक्स या पोर्न वेब पर जरूर जाते हैं। सेक्स उद्योग के आंकड़ों के बारे में एक तथ्य यह भी है कि इसके प्रामाणिक आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं। इस क्षेत्र के बारे में अलग-अलग आंकड़े मिलते हैं। ”केसलॉन एनालिस्टिक प्रोफाइल: एडल्ट कंटेंट इण्डस्ट्रीज ” में आंकडों के इस वैविध्य को सामने रखा। सन् 2002 में एक प्रमोटर ने अनुमान व्यक्त किया कि वयस्क अंतर्वस्तु उद्योग 900 विलियन डालर का है। एक अन्य प्रमोटर ने कहा कि अकेले अमेरिका में ही इसका सालाना कारोबार 10 विलियन डालर का है। एक अन्य अमेरिकी कंपनी ने कहा कि वयस्क वीडियो उद्योग में सालाना 5 विलियन की वृद्धि हो रही है।

पोर्न की समस्या और सऊदी अरब[संपादित करें]

सऊदी अरब सरकार ने पोर्न साइट्स पर शिकंजा कसने के लिए बेहद कड़े कदम उठाए हैं।संचार और सूचना प्रौद्योगिकी आयोग ने पिछले दो सालों में 600,000 से अधिक पोर्न साइट्स को ब्लॉक किया है।

सऊदी अरब में अश्लील सामग्री शेयर और प्रमोट करने वाले लोगों को सरकार ने चेतावनी दी है कि ऐसा करने वाले को पांच साल जेल की सजा और 3 मिलियन सऊदी राशि का जुर्माना लगाया जाएगा।

संचार और सूचना प्रौद्योगिकी आयोग के प्रवक्ता फैज अल-ओताबी ने कहा कि आयोग ने विशेषज्ञों की एक टीम गठित की है, जो पोर्न साइट्स को खोज कर उन्हें ब्लॉक करती है। ऐसी किसी भी वेबसाइट को चलाने का मतलब देश के साइबर कानून की उल्लंघन करना है।

शूरा काउंसिल की सदस्य नोरा बिन्त अब्दुल्ला बिन इदवान ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय सर्वेक्षणों की रिपोर्ट के मुताबिक इन साइटों का इस्तमाल करने वाले 80 प्रतिशत युवा लड़कों की उम्र 15 से 17 साल के बीच है।

कुछ देशों में सर्च इंजन पर सामग्री को फिल्टर करने के लिए कानूनी प्रवधान हैं। इसी मामले को लेकर अमेरिका और यूरोप ने भी कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। बता दें कि पोर्न देखने से बच्चों के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर गहरा प्रभाव पड़ता है ।

पोर्न की समस्या का विकास[संपादित करें]

सन् 1800 के बाद से आधुनिक तकनीकी विकास, प्रिण्टिंग प्रेस, फिल्म, टीवी, इंटरनेट आदि के विकास के साथ-साथ जनतंत्र और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के उदय ने पोर्न को एक सामाजिक समस्या बना दिया है। मीडिया ने पोर्न और सेक्स को टेबू नहीं रहने दिया है। आज पोर्न सहज ही उपलब्ध है। सामान्य जीवन में पोर्नको जनप्रिय बनाने में विज्ञापनों की बड़ी भूमिका है। विज्ञापनों के माध्यम दर्शक की कामुक मानसिकता बनी है। कल तक जो विज्ञापन की शक्ति थी आज पोर्न की शक्ति बन चुकी है।आज पोर्न संगीत वीडियो से लेकर फैशन परेड तक छायी हुई है। वे वेबसाइड जो एमेच्योर पोर्न के नाम पर आई उनमें सेक्स के दृश्य देख्रकर लों में पोर्न के प्रति आकर्षण बढ़ा। स्कूल-कॉलज पढ़ने जाने वाली लड़कियां बड़े पैमाने ट्यूशन पढ़ने के बहाने अपने घर से निकलती थी। और छुपकर पोन्र का आनंद लेती थीं।इसके लिए वे वेबकॉम का इस्तेमाल करती थीं। वेबकास्ट की तकनीक का इस्तेमाल करने के कारण कम्प्यूटर पर प्रतिदिन अनेकों नयी वेबसरइट आने लगीं। लाइव शो आने लगे।इनमें नग्न औरत परेड करती दिखाई जाती है,सेक्स करते दिखाई जाती है। पोर्न के निशाने पर युवा दर्शक हैं। फे्रडरिक लेन (थर्ड) ने ”ऑवसीन प्रोफिटस:दि इंटरप्रिनर्स ऑफ पोर्नोग्राफी इन दि साइबर एज” में लिखा है कि पोर्न के विकास में वीसीआर और इंटरनेट तकनीक ने केन्द्रीय भूमिका अदा की है।

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. "पोर्न पर भी मंदी छाई, स्टार हुए बेहाल".
  2. H. Mongomery Hyde (1964) A History of Pornography: 1–26.
  3. https://www.independent.co.uk/life-style/gadgets-and-tech/news/porn-ban-pornhub-mirror-sex-websites-block-india-a8609071.html

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]

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