मैनपुरी षड्यन्त्र

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पं० गेंदालाल दीक्षित (मैनपुरी काण्ड के नेता) का चित्र

परतन्त्र भारत में स्वतन्त्रता संग्राम के दौरान अंग्रेजों को देश से बाहर निकालने के लिये उत्तर प्रदेश के जिला मैनपुरी में सन् १९१५-१६ में एक क्रान्तिकारी संस्था की स्थापना हुई थी जिसका प्रमुख केन्द्र मैनपुरी ही रहा। मुकुन्दी लाल, दम्मीलाल, करोरीलाल गुप्ता, सिद्ध गोपाल चतुर्वेदी, गोपीनाथ, प्रभाकर पाण्डे, चन्द्रधर जौहरी और शिव किशन आदि ने औरैया जिला इटावा निवासी पण्डित गेंदालाल दीक्षित के नेतृत्व में अंग्रेजों के विरुद्ध काम करने के लिये उनकी संस्था शिवाजी समिति से हाथ मिलाया और एक नयी संस्था मातृवेदी की स्थापना की। इस संस्था के छिप कर कार्य करने की सूचना अंग्रेज अधिकारियों को लग गयी और प्रमुख नेताओं को पकड़कर उनके विरुद्ध मैनपुरी में मुकदमा चला। इसे ही बाद में अंग्रेजों ने मैनपुरी षडयन्त्र कहा। इन क्रान्तिकारियों को अलग-अलग समय के लिये कारावास की सजा हुई।

मैनपुरी षडयन्त्र की विशेषता यह थी कि इसकी योजना प्रमुख रूप से उत्तर प्रदेश के निवासियों ने ही बनायी थी। यदि इस संस्था में शामिल मैनपुरी के ही देशद्रोही गद्दार दलपतसिंह ने अंग्रेजी सरकार को इसकी मुखबिरी न की होती तो यह दल समय से पूर्व इतनी जल्दी टूटने या बिखरने वाला नहीं था। मैनपुरी काण्ड में शामिल दो लोग - मुकुन्दीलाल और राम प्रसाद 'बिस्मिल' आगे चलकर सन् १९२५ के विश्वप्रसिद्ध काकोरी काण्ड में भी शामिल हुए। मुकुन्दीलाल को आजीवन कारावास की सजा हुई जबकि राम प्रसाद 'बिस्मिल' को तो फाँसी ही दे दी गयी क्योंकि वे भी मैनपुरी काण्ड में गेंदालाल दीक्षित को आगरा के किले से छुडाने की योजना बनाने वाले मातृवेदी दल के नेता थे। यदि कहीं ये लोग अपने अभियान में कामयाब हो जाते तो न तो सन् १९२७ में राजेन्द्र लाहिडी व अशफाक उल्ला खाँ सरीखे होनहार नवयुवक फाँसी चढते और न ही चन्द्रशेखर आजाद जैसे नर नाहर तथा गणेशशंकर विद्यार्थी सरीखे प्रखर पत्रकार की सन् १९३१ में जघन्य हत्याएँ हुई होतीं।

पृष्ठभूमि[संपादित करें]

अंग्रेजों के अत्याचारों एवं घोर दमन नीति के कारण भारत वर्ष में भीषण असंतोष के बादल मँडराने लगे थे। नौजवानों का रक्त विदेशी सत्ता के विरुद्ध खौलने लगा था। उनमें विदेशी शासन के उन्मूलन का जोश उमड़ रहा था। उन दिनों के ब्रिटिश भारत (हिन्दुस्तान) का एकमात्र संयुक्त प्रान्त (संयुक्त प्रान्त आगरा व अवध) भी, जिसे १९४७ के बाद उत्तर प्रदेश नाम दे दिया गया, इस जोश में किसी से पीछे नहीं रहा। उत्तर प्रदेश में क्रान्तिकारी आन्दोलन का प्रारम्भ बनारस में रहने वाले कुछ बंगाली क्रान्तिकारियों ने अवश्य किया था किन्तु सुप्रसिद्ध क्रान्तिकारी व लेखक मन्मथनाथ गुप्त के अनुसार मैनपुरी काण्ड स्वत:स्फूर्त आन्दोलन था जिसकी प्रेरणा से उत्तर प्रदेश में बहुत से किशोर देशभक्त इस प्रकार की सशस्त्र क्रान्ति की ओर आकर्षित हुए। शाहजहाँपुर, आगरा, मैनपुरी, इटावा एवं एटा आदि उत्तर प्रदेश के अनेक जिले इसकी आग से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सके। सन् १९१८ के मैनपुरी षडयन्त्र के रूप में इसका विस्फोट हुआ।