भूकम्पी संहिता

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भूकम्पी संहिता (Seismic codes या earthquake codes) उन भवन संहिताओं (building codes) को कहते हैं जो भूकम्प आने के कारण जीवन तथा भवनों की हानि को कम करने के लिये डिजाइन की जातीं हैं। एक प्रसिद्ध कहावत है कि लोगों को भूकम्प नहीं मारता बल्कि भवन मारते हैं।

भूकंपी डिज़ाइन कोडों की महत्ता[संपादित करें]

भूकंपों के दौरान उत्पन्न भू-कंपनों से इमारतों में बल और विरूपण पैदा होता है। इसलिए इमारतों को ऐसे बलों और विरूपणों का सामना करने की दृष्टि से तैयार करना आवश्यक है। इमारतों के व्यवहार को बेहतर करने में भूकंपी कोड मदद करते हैं ताकि वे भूकंप के प्रभावों को झेलने में सक्षम हो सकें तथा जान और माल की अधिक क्षति न हो। डिजाइन इंजीनियरों को इमारतों की योजना, डिज़ाइन, विस्तृतीकरण (डिटेलिंग) तथा निर्माण में सहायता उपलब्ध कराने के लिए विश्व भर के देशों में भूकंपी कोडों में क्रियाविधियों की रूपरेखाएं तैयार की गई हैं।

एक भूकंपरोधी इमारत में निम्नलिखित चार विशेषताएं होती हैं :

  • (क) अच्छा संरचनात्मक विन्यास - इमारत का आकार, आकृति तथा भार उठाने वाली संरचनात्मक प्रणालियां ऐसी होती हैं जो जड़त्व बलों के जमीन तक सीधे और निर्विघ्न प्रवाह को सुनिश्चित करती हैं।
  • (ख) पार्श्व सामर्थ्य : इमारत द्वारा झेला जा सकने वाला अधिकतम पार्श्व (क्षैतिज) बल इतना हो कि क्षतिग्रस्त होने की स्थिति में वह ढह न जाए।
  • (ग) पर्याप्त दुर्नम्यता : इमारत की पार्श्व उद्भार प्रतिरोधी (लोड रेजिस्टिंग) प्रणाली इस प्रकार हो कि भूकंप-प्रेरित विरूपणों द्वारा हल्के से लेकर मध्यम प्रकंपनों से उसके भाग क्षतिग्रस्त न हो जाएं।
  • (घ) अच्छी तन्यता : प्रचंड भूकंपी प्रकंपन के असर के बाद भी इमारत की बड़े विरूपणों को झेलने की क्षमता में वांछित डिज़ाइन और विस्तृतीकरण रणनीति के चलते सुधार आता है।

भूकंपी कोड इन सभी पहलुओं पर ध्यान केंद्रित करते हैं।

भूकंप के इतिहास वाले देशों में उच्च विकसित भूकंपी कोड तैयार किए गए हैं। अतः जापान, न्यूजीलैंड तथा अमेरिका जैसे देशों के पास विस्तृत भूकंपी कोड प्रावधान मौजूद हैं। भारत में इमारतों के लिए कोडों का विकास जल्दी ही आरंभ हो गया था। आज भारत में भूकंपी कोडों की एक अच्छी-खासी सूची मौजूद है जो विभिन्न प्रकार की इमारतों पर लागू होते हैं, जिनमें मिट्टी या कम मजबूत चिनाई वाले घरों से लेकर आधुनिक भवन तक शामिल हैं। लेकिन, भूकंपी सुरक्षा को सुनिश्चित करने की कुंजी एक ऐसी पुख्ता प्रणाली में छिपी है जो इन डिजाइन कोड प्रावधानों का वास्तविक निर्माणों में पालन करा सके और लागू करा सके।

भारतीय भूकंपी कोड[संपादित करें]

भूकंपी कोड किसी क्षेत्र विशेष या देश के लिए उसी के अनुरूप होते हैं। उनमें स्थानीय भूकंप विज्ञान, खतरे के स्वीकार्य स्तर, भवन प्रारूपताओं तथा निर्माण में प्रयुक्त सामग्रियों और विधियों को ध्यान में रखा जाता है। साथ ही, किसी देश द्वारा भूकंपी इंजीनियरी के क्षेत्र में की गई प्रगति के भी वे सूचक होते हैं। भारत में 1962 में आई एस 1893 नामक प्रथम औपचारिक भूकंपी कोड प्रकाशित हुआ था। वर्तमान में भारतीय मानक ब्यूरो (बी आई एस) के अंतर्गत निम्नलिखित भूकंपी कोड आते हैं।

  • आई एस 1893 (भाग-1), 2002, इंडियन स्टैंडर्ड क्राइटीरिया फॉर अर्थक्वेक रेजिस्टेंट डिजाइन ऑफ स्ट्रक्चर्स (संरचनाओं की भूकंपरोधी अभिकल्पना के लिए भारतीय मानक मानदंड, पांचवां संशोधन)
  • आई एस 4326, 1993, इंडियन स्टैंडर्ड कोड ऑफ पै्रक्टिस फॉर अर्थक्वेक रेजिस्टेंट डिजाइन एंड कंस्ट्रक्शन ऑफ बिल्डिंग्स (भूकंपरोधी अभिकल्पना और इमारतों के निर्माण के लिए व्यवहार में आने वाला भारतीय मानक कोड, दूसरा संसोधन)
  • आई एस 13827, 1993, इंडियन स्टैंडर्ड गाइडलाइंस फॉर इंप्रूविंग अर्थक्वेक रेजिस्टेंस ऑफ अर्थन बिल्डिंग्स (मृदा इमारतों के भूकंप प्रतिरोध को सुधारने हेतु भारतीय मानक दिशा-निर्देश)
  • आई एस 13828, 1993, इंडियन स्टैंडर्ड गाइडलाइंस फॉर इंप्रूविंग अर्थक्वेक रेजिस्टेंस ऑफ लो स्ट्रेंथ मेसोनरी बिल्डिंग्स (कम सामर्थ्य वाली चिनाईयुक्त इमारतों की भूकंपरोधी क्षमता को सुधारने हेतु भारतीय मानक दिशा-निर्देश)
  • आई एस 13920, 1993, इंडियन स्टैंडर्ड कोड ऑफ प्रैक्टिस फॉर डक्टाइल डिटेलिंग ऑफ रीइंफोर्स्ड कंक्रीट स्टक्चर्स सब्जेक्टेड टू सीस्मिक फोर्सेस (भूकंपी बलों के आरोपण के चलते प्रबलित कंक्रीट संरचनाओं की तन्य विस्तृतीकरण के लिए व्यवहार में आने वाला मान्य भारतीय मानक कोड)
  • आई एस 13935, 1993, इंडियन स्टैंडर्ड गाइडलाइंस फॉर रिपेयर एंड सीस्मिक स्ट्रेथनिंग ऑफ बिल्डिंग्स (इमारतों की मरम्मत और भूकंपी सशक्तिकरण के लिए भारतीय मानक दिशा-निर्देश)

इन मानकों में किए गए नियमन यह सुनिश्चित नहीं करते हैं कि सभी परिणामों वाले भूकंपों के दौरान संरचनाओं में कोई क्षति उत्पन्न नहीं होगी। लेकिन, एक संभव सीमा तक वे यह सुनिश्चित करते हैं कि संरचनात्मक क्षति के बिना संरचनाएं मध्यम तीव्रताओं के भूकंपों तथा पूर्ण रूप से ध्वस्त हुए बिना उच्च तीव्रताओं के भूकंपों के प्रति अनुक्रिया प्रदर्शित करने में सक्षम हैं।