ब्रह्माण्ड (हिन्दू धर्म)

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ब्रह्माण्ड शब्द का अर्थ खगोल से लिया जाता है। अगर हम‌ भौतिक रूप से ब्रह्माण्ड को समझना चाहें तो हम ब्रह्माण्ड को सरल भाषा में ऐसे परिभाषित कर सकते हैं कि ब्रह्माण्ड वो है जिसके क्षेत्र में सम्पूर्ण ग्रह, उपग्रह्, तारे आदि स्थित हैं और इस क्षेत्र के अस्तित्व का मूल आधार वो सारे तत्व हैं, जिनके द्वारा ब्रह्माण्ड में स्थित सम्पूर्ण ग्रह, उपग्रह्, तारे आदि निर्मित हैं। ब्रह्माण्डीय क्षेत्र और सम्पूर्ण ग्रह, उपग्रह्, तारों आदि के मध्य मात्र इतना सा अन्तर है कि ब्रह्माडीय क्षेत्र, तत्वों के "मूल" रूप से निर्मित है जोकि स्वतन्त्र हैं, जबकि सम्पूर्ण ग्रह, उपग्रह्, तारे आदि इन्हीं तत्वों के किसी कारणवश आपस में जुडने और जुड़ कर टुटने से निर्मित हैं।

हिन्दू धर्म अनुसार[संपादित करें]

विष्णु पुराण के अनुसार वर्णन[संपादित करें]

  • यह ब्रह्माण्ड कपित्थ (कैथे) के फ़ल की भांति, अण्डकटाह से घिरा हुआ है।
  • यह कटाह अपने से दस गुने परिमाण के जल से घिरा हुआ है।
  • यह जल अपने से दस गुने परिमाण के अग्नि से घिरा हुआ है।
  • यह अग्नि अपने से दस गुने परिमाण के वायु से घिरा हुआ है।
  • यह वायु अपने से दस गुने परिमाण के आकाश से घिरा हुआ है।
  • यह आकाश अपने से दस गुने परिमाण के तामस अंधकार से घिरा हुआ है।
  • यह तामस अंधकार अपने से दस गुने परिमाण के महत्तत्व से घिरा हुआ है।
  • महत्तत्व अपरिमेय, असीमित

तत्वों के वृहद् से वृहद्तर रूप से निर्मित सम्पूर्ण ग्रह, उपग्रह्, तारे आदि जो ब्रह्माण्ड के एक एक अंग हैं, इनका वर्गिकरण मानव ने इनकी प्रकृति के अनुसार किया हैं। भारत के ॠषियों ने इन तारों और ग्रहों के विषय में खगोल शास्त्र के माध्यम से लगभग २२०० साल पहले ही पता लगा लिया था। भागवत पुराण के अनुसार ॠषि बाराहमिहिर ने २७ नक्षत्र, ७ ग्रहों तथा ध्रुव तारे को वेधने के लिये एक जलाशय में मेरु स्तम्भ का निर्माण करवाया था। इस मेरु स्तम्भ में ७ ग्रहों के लिये ७ मंजिल और २७ नक्षत्रों के लिये २७ रोशनदानों का निर्माण काले पत्थरों से करवाया गया था तथा इसके चारों तरफ़ मन्दिर स्वरूपी २७ वेधशालायें स्थापित की गयीं थीं

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]