राजा बीरबल

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राजा बीरबल
बीरबल
बीरबल
जन्मपण्डित महेश दास भट्ट
1528
सीधी मध्यप्रदेश, भारत
निधन16 फरवरी 1586 (उम्र 57-58)
स्वात घाटी, आज पाकिस्तान
जीवनसंगीउर्वशी देवी
संतानसौदामणि दूबे (पुत्री)
धर्महिन्दू धर्म, दीन ए इलाही
पेशाअकबर के साम्राज्य में दरबारी और सलाहकार

महेश दास, (1528 — 16 फरवरी 1586) जो बीरबल के नाम से अधिक प्रसिद्ध हैं, मुगल बादशाह अकबर के दरबार में प्रमुख वज़ीर और अकबर के परिषद के नौ सलाहकारों (नवरत्नोंमें से एक थे। उनका जन्म महर्षि कवि के वंशज जिझौतिया भट्ट ब्राह्मण परिवार में हुआ था वह बचपन से ही तीव्र बुद्धि के थे। प्रारम्भ में ये पान का सौदा बेचते थे। जिसे सामान्यतः "पनवाड़ी" (पान बेचने वाला) कहा जाता है। बचपन में उनका नाम महेश दास था। उनकी बुद्धिमानी के हजारों किस्से हैं जो बच्चों को सुनाए जाते हैं। माना जाता है कि 16 फरवरी 1586 को अफगानिस्तान के युद्ध में एक बड़ी सैन्य मंडली के नेतृत्व के दौरान बीरबल की मृत्यु हो गयी।

बचपन[संपादित करें]

इनके बचपन का नाम महेश दास था। बचपन से ही वो बहुत ही चतुर एवं बुद्धिमान थे। उनके जन्म के विषय मे मतभिन्नता है। कुछ विद्वान उन्हें आगरा के निवासी, कोई कानपुर के घाटमपुर तहसील के, कोई दिल्ली के निवासी और कोई मध्य प्रदेश के सीधी जिले का निवासी बताते हैं पर ज्यादातर विद्वान मध्य प्रदेश के सीधी जिले के घोघरा गाँव को ही बीरबल का जन्मस्थान स्वीकार करते हैं।[कृपया उद्धरण जोड़ें]

अकबर से मिलन[संपादित करें]

अकबर से मिलन संबंधी अनेक कथाएं प्रचलित है। सबसे प्रचलित कथा के अनुसार, एक बार बादशाह अकबर ने अपने एक पान का बीड़ा लगाने वाले नौकर को एक "पाओभर" (आज का लगभग 250 ग्राम) चूना लेकर आने को कहा। नौकर किले के बाहर दुकान करने वाले पनवाड़ी से पाओभर चूना लेने गया। इतना सारा चूना ले जाते देख पनवाड़ी को कुछ शक होता है। इसलिए बीरबल नौकर से पूरा घटनाक्रम जानता है, और कहता है कि बादशाह यह चूना तुझको ही खिलवायेगा। तेरे पान में लगे ज्यादा चूने से बादशाह की जीभ कट गई है, इसलिए यह सब चूना तुझे ही खाना पड़ेगा। इसलिए इतना ही घी भी ले जा, जब बादशाह चूना खाने को कहे तो चूना खाने के बाद घी पी लेना।

नौकर दरबार मे चूना लेकर जाता है, और बादशाह नौकर को वह सारा पाओभर (250 ग्राम) चूना खाने का आदेश देता है। नौकर वह सारा चूना खा लेता है, लेकिन उस पनवाड़ी बीरबल की सलाह के अनुसार घी भी पी लेता है। अगले दिन जब बादशाह का वह नौकर पुनः जब राज दरबार पहुचता है, तो अकबर उसे जीवित देख आश्चर्य से उसके जीवित बचने का कारण जानता है। नौकर सारी बात बादशाह को बताता है, कि कैसे किले के बाहर के पनवाड़ी की समझ-बूझ से वह बच सका। बादशाह उस पनवाड़ी की बुद्धिमत्ता से प्रभावित हो उसे दरबार मे बुलवाते है। इस प्रकार बादशाह अकबर और बीरबल का पहली बार आमना सामना होता है। और अकबर ऐसे बुद्धिमान व्यक्ति को अपने दरबार मे स्थान देते हैं।

अकबर के दरबार में[संपादित करें]

अकबर के दरबार में अकबर ने इन्हें "बीरबल" का खिताब दिया, चलते चलते वह बीरबल होगया।[कृपया उद्धरण जोड़ें]

राजा बीरबल को कई बार बादशाह अकबर दरबार में ऐसे सवाल पूछ लिया करते थे जिनका जवाब देना बहुत कठिन हो जाता था परंतु राजा बीरबल अपनी बुद्धिमानी से प्रसिद्ध थे इस कारण वह सभी प्रश्नों का उत्तर आसानी से दे देते थे।

अकबर के दरबार में बीरबल का ज्यादातर कार्य सैन्य और प्रशासनिक थे तथा वह सम्राट का एक बहुत ही करीबी दोस्त भी था, सम्राट अक्सर बुद्धि और ज्ञान के लिए बीरबल की सराहना करते थे। ये कई अन्य कहानियो, लोककथाओं और कथाओ की एक समृद्ध परंपरा का हिस्सा बन गए हैं।[1][2]

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. S.R. Sharma (1 January 1999). Mughal Empire in India: A Systematic Study Including Source Material. Atlantic Publishers & Dist. पृ॰ 787. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-81-7156-819-2. मूल से 9 अक्तूबर 2013 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 29 June 2013.
  2. G. George Bruce Malleson (2001). Akbar and the Rise of the Mughal Empire. Cosmo Publications. पपृ॰ 131, 160, 161. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-81-7755-178-5. मूल से 9 अक्तूबर 2013 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 29 June 2013.