बन्दी छोड़ दिवस

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बन्दी छोड़ दिवस सिख त्योहार है जो कि दीपावली के दिन पड़ता है। दीपावली त्यौहार सिख समुदाय द्वारा ऐतिहासिक रूप से मनाया जाता है। । 20वीं सदी से सिख धार्मिक नेताओं द्वारा दिवाली को बन्दी छोड़ दिवस कहा जाने लगा। शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी द्वारा इसे मान लिया गया। इस नाम का सम्बद्ध गुरु हरगोबिन्द की रिहाई से है जिन्हें जहाँगीर द्वारा स्वतंत्र किया गया था। बन्दी छोड़ दिवस को दिवाली के समान ही मनाया जाता है, जिसमें घरों और गुरुद्वारों को रोशन किया जाता है, उपहार देना और परिवार के साथ समय बिताना होता है।

बन्दी छोड़ दिवस का इतिहास[संपादित करें]

बन्दी छोड़ दिवस सिख इतिहास का बहुत ही महत्वपूर्ण दिन है। यह दिन उसी दिन होता है जिस दिन दिवाली का त्योहार होता है। इसे मनाने की प्रक्रिया भी दिवाली की भांति ही घी के दीये जला कर की जाती है। इसे मुख्य रूप से अमृतसर मे मनाया जाता है।

क्यो मनाया जाता है बन्दी छोड़ दिवस?[संपादित करें]

सिख इतिहास मे इस दिन सिख धर्म के छेवें गुरु श्री हर गोबिन्द साहिब जी मुगल बादशाह जहाँगीर के ग्वालियर के किले से 52 हिन्दू राजाओं के साथ रिहा होकर वापिस अमृतसर गये थे। इस दिन अमृतसर के वासियो समेत पूरे सिख समुदाय ने अपने घरो मे घी के दीये जला कर रोशनी कर गुरु जी का स्वागत किया । इसी दिन भारत मे दिवाली का पर्व मनाया जा रहा था। तभी से दिवाली और बन्दी छोड़ दिवस एक ही दिन मनाया जाता है।

आखिर क्यों बन्दी थे गुरु हरगोबिन्द साहिब ?[संपादित करें]

बन्दी दिवस के महत्व को समझने के लिए इसके पीछे का इतिहास जानना बहुत जरूरी है। यह तो आपको सब को पता लग ही गया है कि गुरु जी कैद मुक्त हुये थे, लेकिन उनको जहाँगीर ने ग्वालियर के किले मे बन्दी बनाया क्यों था ?यह जानना भी जरूरी है।

जैसा कि आप सभी जानते है कि उन दिनों मुगलो हम सब पर जुल्म कर रहे थे। इन्ही मुगलो की वजह से सिखों के पांचवें गुरु अर्जुन देव जी इन के जुल्मो का सामना शांतमयी ढंग से करते हुये सहादत प्राप्त कर गए थे।

अत्याचार को रोकने के लिए हथियार उठाना[संपादित करें]

गुरु जी की सहादत के बाद ये बात तो स्पष्ट हो गयी थी कि अब शांत रहने से मुगलो का सामना नही किया जा सकता। मुगलो के अत्याचार को रोकने के लिए हथियार उठाने ही होंगे।

इसी बात के कारण गुरु हरगोबिन्द जी ने सिखों की गुरु गद्दी की परंपरा को जरूरत के अनुसार बदलते हुये गुरु गद्दी ग्रहण करते समय नीरी और पीरी नामक 2 तलवारें धारण की।

हरिमंदिर साहिब मे अकाल तख्त की स्थापना[संपादित करें]

गुरु जी ने अमृतसर में हरिमंदिर जी के सामने ही श्री अकाल तख्त साहिब का निर्माण करवाया। जहां रोजाना दीवान सजाये जाने लगे। वहाँ रोजाना गुरबानी कीर्तन होने लगा।

फौज की तैयारी[संपादित करें]

गुरु जी के दर्शनों को दूर दूर से संगते आने लगी। गुरु जी ने सभी श्रद्धालुओ को आदेश दिया कि आते समय अच्छी किस्म के घोड़े और शस्त्र अपने साथ लाएं। इसी के साथ गुरु जी ने नौजवानो की फौज तैयार कर उन्हे युद्ध की ट्रेनिंग देने लगे।

जहाँगीर से शिकायत और गुरु जी को नजरबंद किया[संपादित करें]

इस तरह गुरु जी की फौज को तैयार होते देख कुछ विरोधियों ने इस बात की शिकायत ग्वालियर के बादशाह जहाँगीर से कर दी। इसी शिकायत की वजह से गुरु जी पर बगावत का झूठा आरोप लगाते हुये ग्वालियर के किले में नजरबन्द कर दिया गया । गुरु साहिब जी की बन्दी से पूरा धर्म निराश हुया ।

ग्वालियर किले का माहौल[संपादित करें]

गुरु साहिब के किले मे पहुँचने से वहाँ का माहौल एक दम बादल सा गया । वहाँ सुबह शाम कीर्तन होने लगा । किले की काल कोठरियों से गुरबानी कीर्तन की मीठी धुनें सुनाईं देने लगी। गुरु साहिब के उपदेशों से सभी बंधियों मे एक अलग ही चमक सी आ गयी।

गुरु साहिब से मिलने गयी संगत[संपादित करें]

उधर गुरु साहिब जी को नजर बंद हुये काफी दिन हो जाने के कारण संगत परेशान होने लगी। बाबा बुड्ढा साहिब जी की अगुवाई मे संगत का एक जत्था ग्वालियर किले के लिए रवाना हुआ। यह जत्था कीर्तन करता हुआ गुवालियर किले मे पहुंचा।

लेकिन जहाँगीर ने संगत को गुरु साहिब से मिलने की इजाजत नही दी । तब संगत ने कीर्तन करते हुये किले की परिकर्मा कर गुरु साहिब जी के प्रति अपनी श्रद्धा का परिचय देते हुये वापिस आ गए।

रिहाई का आदेश[संपादित करें]

संगत की गुरु साहिब जी के प्रति श्रद्धा देख बादशाह भी आश्चर्यचकित हुआ और संत साई मियां मीर जी ने गुरु साहिब जी के बारे मे सही जानकारी जहाँगीर को दी। तब बादशाह जहाँगीर ने गुरु साहिब को रिहा करने का आदेश दे दिया ।

लेकिन गुरु जी ने अकेले रिहा होने से इंकार कर दिया । गुरु जी चाहते थे कि उनके साथ किले मे नजर बंद 52 राजपूत (हिन्दू ) राजाओ को भी उनके साथ ही रिहा किया जाए।

गुरु साहिब और 52 राजपूत (हिन्दू) राजाओ की रिहाई[संपादित करें]

गुरु साहिब जी से परभावित होकर जहाँगीर इस बात को मानने को मजबूर हो गया । गुरु साहिब की कृपा से 52 राजाओ को नजरबंदी से मुक्ति मिली । इस दिन से गुरु साहिब को “बन्दी-छोड़-दाता “ के नाम से भी जाना जाने लगा।

जब गुरु साहिब रिहा होकर संगतों के साथ अमृतसर पहुंचे थे तो उस दिन दिवाली का दिन था। उस दिन सबने गुरु साहिब का स्वागत अपने घरो मे देसी घी के दीये जला कर किया । इसी दिन से सिख समुदाय दिवाली के दिन ही बन्दी छोड़ दिवस मनाता है।

द्वारा लिखा गया :- सुखाविंदर सिंह रंधावा (WWW.ABCJANKARI.IN)

।।वाहेगुरु जी का खालसा वाहेगुरु जी की फतेह।।[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]