फ़ारस की खाड़ी का राष्ट्रीय दिवस

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फारस की खाड़ी
फारस की खाड़ी - अंतरिक्ष से फारस की खाड़ी का दृश्य
अंतरिक्ष से फारस की खाड़ी का दृश्य
स्थिति मध्य पूर्व एशिया
सागर प्रकार Gulf
प्राथमिक स्रोत ओमान का सागर
तटवर्ती क्षेत्र ईरान, इराक, कुवैत, सउदी अरब, क़तार, बैहरैन, संयुक्त अरब अमीरात और ओमान
अधिकतम लंबाई 989 कि.मी. (615 मील)
अधिकतम चौड़ाई  (min)
सतही क्षेत्र 2,51,000 कि.मी. (97,000 वर्ग मील)
औसत गहराई 50 मी. (160 फुट)
अधिकतम गहराई 90 मी. (300 फुट)

ईरान में 30 अप्रैल का दिन फ़ारस की खाड़ी का राष्ट्रीय दिवस के तौर पर मनाया जाता है। इस दिन पूरे ईरान में विभिन्न प्रकार के कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। फारस की खाड़ी, मध्य पूर्व एशिया क्षेत्र में हिन्द महासागर का एक विस्तार है, जो ईरान और अरब प्रायद्वीप के बीच तक गया हुआ है।[1] [2]

30 अप्रैल 1622 को शाह अब्बास की सेना हुर्मुज़ बंदरगाह में पुर्तगालियों को पराजित करने में सफ़ल हुई। ईरान की ग़ैर सरकारी संस्थाओं ने वर्ष 2004 में 30 अप्रैल के दिन को “फ़ारस की खाड़ी का राष्ट्रीय दिवस” के तौर पर मनाने का निर्णय लिया। ईरान की सरकार ने भी इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। वास्तव में 30 अप्रैल को दो महत्वपूर्ण घटनाएं हुई। एक तो देश से पुर्तगाली उपनिवेशकवाद का निष्कासन हुआ और दूसरे यह कि इस दिन यह निर्णय लिया गया कि फ़ारस की खाड़ी के ऐतिहासिक तथा प्राचीन नाम को देखते हुए हर साल 30 अप्रैल का दिन “फ़ारस की खाड़ी का राष्ट्रीय दिवस” के तौर पर मनाया जाए। यह नाम तथा शब्द विश्व की समस्त भाषाओं में 2400 वर्ष पूर्व से लेकर 1964 तक सरकारी व अंतर्राष्ट्रीय नाम रहा है। किन्तु अरब देशों ने 1964 में गुप्त तौर पर निर्णय लिया कि फ़ारस की खाड़ी का नाम बदल कर अरब की खाड़ी रख दिया जाए।

ईरानी लोग इस निर्णय को अरब भेद भाव व क़ौमपरस्ती के एक नमूने के तौर पर देखते हैं। उन का मानना है कि जमाल अब्दुल नासिर के दौर तक किसी अरबी दस्तावेज़ या पत्र में अरब की खाड़ी शब्द का प्रयोग नहीं किया गया है और अरब दुनिया की सांस्कृतिक धरोहर कही जाने वाली समस्त महत्वपूर्ण पुस्तकों में “फ़ारस सागर’’ या “फ़ारस की खाड़ी’’ जैसे शब्द ही पाए जाते हैं। इसीलिए ईरानियों ने इस दिन को “फ़ारस की खाड़ी का राष्ट्रीय दिवस” का नाम दिया है ताकि इस ऐतिहासिक तथा प्राचीन नाम को बदलने के लिए की जा रही कोशिशों को रोका जा सके। ईरानियों का कहना है कि यदि सागरों के नाम ही बदले जाने हैं तो फिर अरब सागर का नाम बदल कर मकरान सागर किया जाना चाहिए क्योंकि इस के चारों ओर लगभग सौ करोड़ से अधिक ग़ैर अरब लोग आबाद हैं और इस नाम का उपयोग भी पुर्तगाली उपनिवेशवाद के दौर में ही शुरु हुआ था।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. Working Paper No. 61, UNITED NATIONS GROUP OF EXPERTS ON GEOGRAPHICAL NAMES, dated March 28, April 4, 2006 ([1]); accessed February 09, 2007
  2. IRIB

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]

निर्देशांक: 26°54′17″N 51°32′51″E / 26.90472°N 51.54750°E / 26.90472; 51.54750

  • مستند خلیج فارس 1 سیما[2]
  • سمینار خلیج فارس 10 اردیبهشت 1390 در 1390. ؟[3]
  • Documents on the Persian Gulf's name : the eternal heritage of ancient time

Author: Ajam, Muḥammad.]] [4]

  • دریای پارس

[5]