पूर्वोत्तर हिन्दी अकादमी, शिलांग

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पूर्वोत्तर हिन्दी अकादमी मेघालय की राजधानी शिलांग स्थित एक हिन्दीसेवी संस्था है। इसकी स्थापना 1990 में हुई थी। अकादमी वहाँ के अहिन्दी भाषी लोगो के मन में हिन्दी के प्रति लगाव की भावना जगा कर उन्हें हिन्दी से जोड़ने के लिए प्रयासरत है। यह संस्था पूर्वोत्तर की स्थानीय भाषाओं जैसे खासी, बोरो, असमी, मणिपुरी और बांग्ला के विकास और समन्वय के लिए भी काम कर रही है।

भारतीयता के वृहद उद्देश्य से काम कर रही इस संस्था के उद्देश्यों में कला और संस्कृति का प्रचार भी शामिल है। अपने कार्यक्रमों के माध्यम से अकादमी उत्तर-पूर्व के राज्यों के साथ भारत के अन्य राज्यों में सांस्कृतिक आदान-प्रदान के द्वारा राष्ट्रीय एकता को भी विकसित कर रही है।

उद्देश्य एवं लक्ष्य[संपादित करें]

  1. हिन्दी भाषा, साहित्य तथा नागरी लिपि का भारत के पूर्वोत्तर में प्रचार-प्रसार करना
  2. अहिन्दी लोगों के कल्याण की विशिष्ट गतिविधियाँ हाथ में लेना तथा उन्हें हिन्दी के माध्यम से आधुनिक भारतीय भाषाओं, साहित्य, कला और संस्कृति के क्षेत्र में शिक्षित करना
  3. हिन्दी भाषा, साहित्य, कला और संस्कृति के उन्नयन के लिए अहिन्दी भाषी लोगों में अपनत्व का भाव उत्पन्न करना
  4. पुस्तकों, नियत अवधि की पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन तथा अन्य भाषाओं (खासी, गारो, असमिया, बोड़ो, मणिपुरी, बांग्ला आदि) के साहित्य का हिन्दी में अनुवाद करना
  5. अपने बहुभाषी कार्यों एवं अन्य कार्यकलापों के द्वारा भारत के सभी लोगों को एक मञ्च पर लाना
  6. लोगों के मस्तिष्क में भाईचारा और समानता की भावना का विकास करना
  7. असमान उद्देश्यों की पूर्ति में लगे हुए अन्य (गैर राजनीतिक) संगठनों के साथ सम्बद्ध होना
  8. हिन्दी भाषा, कला और सम्स्कृति के क्षेत्र में कार्य करने वाली नवीन मेधा के लिए मञ्च प्रदान करना
  9. हिन्दी भाषा तथा साहित्य के क्षेत्र में संलग्न वरिष्ट नागरिकों को उनके द्वारा किए गये कार्यों के लिए सम्मानित करना।

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]

  • Dr Akelabhai Progressive Foundation
    सम्मेलन 2018
    पूर्वोत्तर हिन्दी अकादमी का हिन्दी ब्लॉग
  • संस्थापक सचिव का संक्षिप्त परिचय: सचिव डा अकेलाभाइ का संक्षिप्त परिचय डा. अकेलाभाइ विगत 40 वर्षों से लेखन एवं पत्रकारिता के क्षेत्र से जुड़े हैं। इनकी पहली रचना 24 फरवरी 1974 को दिल्ली से प्रकाशित साप्ताहिक पत्रिका संजीवन में प्रकाशित हुई थी। 3 जून 1986 को आकाशवाणी गुवाहाटी  से जुड़े तथा 5 अप्रैल 1989 से आकाशवाणी शिलांग में वरिष्ठ उदघोषक के पद पर कार्यरत हैं। इसके अतिरिक्त 1990 में स्थापित पूर्वोत्तर हिंदी अकादमी के मानद सचिव के रूप में हिंदी भाषा एवं नागरी लिपि के प्रचार प्रसार में अपना योगदान दे रहें हैं। अब तक 300 से अधिक पत्र-पत्रिकाओं में हर विधा की हजारों रचानाएं प्रकाशित हो चुकी हैं। इन्होंने विभिन्न साप्ताहिक, मासिक एवं त्रैमासिक पत्र-पत्रिकाओं सहित कविता संग्रह आदि का संपादन भी किया है। रेडियो की लोकप्रियता को और मजबूत करने के लिए श्रोतागाइड के लेखन के साथ-साथ श्रोतादर्शन, श्रोतावाणी, पगडण्डियाँ पहाड़ की, घाटियों में गूँजते शब्द का संपादन किया है। इन्हें पूर्वोत्तर भारत के विभिन्न राज्यों में हिंदी का प्रचार-प्रसार और साहित्यिक योगदान के लिए विभिन्न संस्थाओं द्वारा राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय स्तर के 40 से अधिक पुरस्कार एवं सम्मान प्रदान किये गये हैं। पूर्वोत्तर हिंदी अकादमी द्वारा राष्ट्रभाषा हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए वर्ष 2003 से अबतक 250 से अधिक क्षेत्रीय, राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय कार्यक्रमों का आयोजन, पुस्तकों एवं पत्रिकाओं का प्रकाशन किया गया है। पूर्वोत्तर पर्वतीयविश्वविद्यालय से वर्ष 2008 में इन्हें ‘स्वातंत्र्योत्तर हिंदी साहित्य के विकास में आकाशवाणी का अवदान’ विषय पर शोध के लिए पी. एचडी की उपाधि प्रदान की गयी। इस शोधग्रन्थ को समय प्रकाशन नई दिल्ली ने ‘रेडियो, साहित्य और पत्रकारिता’ शीर्षक से वर्ष 2009 में पुस्तक रूप में प्रकाशित किया। विदेश मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा मॉरीशस में आयोजित 11वें विश्व हिंदी सम्मेलन में सरकारी प्रतिनिधि मण्डल के एक सदस्य के रूप में डा. अकेलाभाइ ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है।