पगहा जोरी-जोरी रे घाटो

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पगहा जोरी-जोरी रे घाटो  
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पगहा जोरी-जोरी रे घाटो का मुखपृष्ठ
लेखक रोज केरकेट्टा
देश भारत
भाषा हिंदी
विषय आदिवासी साहित्य
प्रकाशक देशज प्रकाशन, रांची (झारखंड)
प्रकाशन तिथि 2011
पृष्ठ 144
आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 9788190895927

पगहा जोरी-जोरी रे घाटो (कतार में लौटती हुई चिड़िया) 2011 में प्रकाशित सुख्यात हिंदी कथाकार रोज केरकेट्टा की कहानियों का पहला संग्रह है। वर्ष 2012 में ‘अयोध्या प्रसाद खत्री स्मृति सम्मान’[1] से पुरस्कृत इस कथा संग्रह में लेखिका ने आदिवासियों के उस भाव-संसार को बुना है जिसे बौद्धिक व साहित्यिक जगत में ‘ट्राइबल इथोज’ के रूप में जाना जाता है। हिंदी कथा साहित्य में आदिवासी कहन की यह एक अनुपम बानगी है जो पाठकों को नागर साहित्य से इतर एक भिन्न किस्म का आदिम आस्वाद देती है।

पगहा जोरी-जोरी रे घाटो की कहानियां[संपादित करें]

उल्लेख्य कथा संग्रह में कुल कहानियां हैं। ‘भंवर’, ‘घाना लोहार का’, ‘केराबांझी’, ‘कोंपलों को रहने दो’, ‘छोटी बहू’, ‘गंध’, ‘आंचल का टुकड़ा’, ‘भाग्य’, ‘बाही’, ‘से महुआ गिरे सगर राति’, ‘लत जो छूट गई’, ‘मैना’, ‘संगीत प्रेम ने प्राण लिए’, ‘बीत गई सो बात गई’, ‘दुनिया रंग रंगीली बाबा’ और ‘पगहा जोरी-जोरी रे घाटो’। इनमें से ‘भंवर’ का तेलुगू में अनुवाद हुआ है जबकि ‘मैना’ कहानी अंतरराष्ट्रीय महात्मा गांधी हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के पाठ्यक्रम में शामिल है।

संपादक-समीक्षक किशन कालजयी के अनुसार ‘रोज़ केरकेटा की कहानियां प्रतिरोध की कहानियां हैं और उनका यह कहानी संग्रह हिंदी के एक नये इलाके का द्वार खोलता है।’ वहीं वरिष्ठ आदिवासी कथाकार वाल्टर भेंगरा ‘तरुण’ भी अपनी टिप्पणी में यही मानते हैं कि ‘रोज का साहित्य आदिवासी जीवन की वास्तविक अनुभूतियों से निकला साहित्य है।’[2]

आलोचक वीरेन नंदा के अनुसार, पगहा जोरी-जोरी रे घाटो ‘झारखंडी जनमानस खासकर नारी संवेदना की अभिव्यक्ति का अनूठा दस्तावेज है और इसमें आदिवासी समाज का प्रामाणिक एवं मर्मस्पर्शी चित्रण है। वह आदिवासी इलाकों में जाकर लिखने वालों में से नहीं हैं, बल्कि इसी समाज में पली बढ़ी होने के कारण आदिवासी समाज की अंतरात्मा और भावना की समझ रखती हैं।’[3]

कहानियों का कथ्य, शिल्प और भाषा[संपादित करें]

संग्रह की अधिकांश कहानियों के केन्द्र में आदिवासी महिलाएं हैं। आदिवासी समाज और उनका जीवन संघर्ष है। परंपराएं हैं और कहन आदिवासी शब्दावलियों व मुहावरों से लैस है। इस संग्रह की कहानियों में लेखिका ने अभिव्यक्ति की जिस शैली का प्रयोग किया है, उसका एक अलग अंदाज और मजा है। हिंदी में लिखे जाने के बावजूद संग्रह की कहानियों में अलग किस्म की ‘आदिवासी हिंदी’ है जिसका भाव और सौंदर्यबोध मुख्यधारा के हिंदी साहित्य से बिल्कुल जुदा है। इसीलिए चर्चित उपन्यासकार रणेन्द्र कहते हैं, ‘आदिवासी पात्रों के संवाद, खास अन्दाजे बयां, कहन की खूबसूरती देखनी हो तो रोज केरकेट्टा के संग्रह ‘पगहा जोरी-जोरी रे घाटो‘ की कहानियों को पढ़ना चाहिए।’ [4]

सुप्रसिद्ध आलोचक रविभूषण का कथन है, ‘पगहा जोरी जोरी रे घाटो की कहानियां आदिवासी जीवन की कहानियां है और यह कहानियां पाठकों के मन में जिज्ञासा उत्पन्न करती है। रोज केरकेट्टा ने हिंदी में ‘खड़िया’ भाषा के आदिवासी शब्दों का इस्तेमाल कर एक नया प्रयोग तो किया ही है, इसके अतिरिक्त उन्होंने इसमें हमारे खत्म होते ठेठ खेलों जैसे छुआ-छुई, कबड्डी, बाग बंदी आदि का भी उल्लेख किया गया है। [5]

आदिवासी साहित्य की अध्येता और समीक्षक डॉ. सावित्री बड़ाईक कहती हैं, पगहा जोरी-जोरी रे घाटो की ‘कहानियों में झारखण्ड के रस और गंध की उपस्थिति है। छोटानागपुर में बोले जाने वाले शब्दों का बाहुल्य है। पैला, गुंगू लरंग, गेंटी कंदा, चरकी, डेम्बू, ढेंकी, माड़ भात डोंगा, भदरा, टटका इंजोरिया, बोथल भात, माघ ढुँढुर, टोंगरी, छउवा, झटास आदि। ...इन कहानियों में झारखंड के आदिवासी समाज के खान-पान, रहन-सहन, खेती-बारी, पहनावा, पर्व-त्योहार आदि संस्कृति के कई पहलुओं को उजागर किया गया है।’ [6]जो अन्य रचनाकारों में नहीं दिखाई देतीं।

नारीवाद से भिन्न और आदिवासियत में पगी स्त्री-संघर्ष की कहानियां[संपादित करें]

आदिवासी साहित्य के आलोचक विद्वान डॉ. वीर भारत तलवार मानते हैं कि रोज केरकेट्टा की कहानियां आदिवासी जीवन को सघनता और संपूर्णता के साथ व्यक्त करती हैं। उन्होंने जो जिया है, उसे ही लिखा है। प्रतिरोध का राजनीतिक स्वर इसमें सबसे बड़ी बात है। डॉ. तलवार साहित्य में चल रहे स्त्री विमर्श से इस संग्रह की कहानियों को अलगाते हुए कहते हैं, रोज की कहानियां पुरुष के विरोध में नहीं, व्यवस्था के विरोध में खड़ी हैं। यहां अलग तरह का नारीवाद है।[7]

आदिवासी कथाकारों और रोज केरकेट्टा की कहानियों के संदर्भ में साहित्यकार और संस्कृतिकर्मी अश्विनी कुमार पंकज की स्पष्ट मान्यता है कि रोज केरकेट्टा जैसे आदिवासी लेखकों का साहित्य गैर-आदिवासियों द्वारा लिखे साहित्य से नितांत भिन्न भाव-भूमि और सौंदर्यबोध वाला है। उनकी टिप्पणी है, ‘आदिवासी लेखन में भिन्न-भिन्न भाषाओं के बावजूद उनकी दार्शनिक पृष्ठभूमि एक-सी है। विषय, कथ्य और प्रस्तुति शैली में जरूर अन्य क्षेत्रीय भाषायी समाजों का प्रभाव पड़ा है लेकिन दृष्टि आदिवासी ही है। हिंदी में लिखित पीटर पौल एक्का का बहुचर्चित उपन्यास ‘जंगल के गीत’ हो या डॉ. रोज केरकेट्टा के ‘पगहा जोरी-जोरी रे घाटो’ कथा-संग्रह की कहानियां, हिंदी में गैर-आदिवासियों द्वारा किए गए लेखन से बिलकुल अलग हैं। [8]


इन्हें भी देखें[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. "आदिवासी लेखिका रोज केरकेट्टा को अयोध्या प्रसाद खत्री सम्मान". 4 जुलाई 2017. अभिगमन तिथि 4 जुलाई 2017.
  2. "'पगहा जोरी जोरी रे घाटो' का लोकार्पण". 4 जुलाई 2017. अभिगमन तिथि 4 जुलाई 2017.
  3. "आदिवासी लेखिका रोज केरकेट्टा को अयोध्या प्रसाद खत्री सम्मान". 4 जुलाई 2017. अभिगमन तिथि 4 जुलाई 2017.
  4. “ईमाँ मुझे खैंचे है तो रोके है मुझे कुफ्र”, हाशिया ब्लॉग पर
  5. "'पगहा जोरी जोरी रे घाटो' का लोकार्पण". 4 जुलाई 2017. अभिगमन तिथि 4 जुलाई 2017.
  6. डा. सावित्री बड़ाईक, हिंदी की आदिवासी कथा लेखिकाएं, आदिवासी साहित्य (त्रैमासिक), अंकः 4-5, अक्टूबर 2015-मार्च 2016, नई दिल्ली, पृष्‍ठ 40
  7. "रोज ने जो जिया, वही लिखा". 4 जुलाई 2017. अभिगमन तिथि 4 जुलाई 2017.
  8. दलित साहित्य की वैचारिकी से भिन्न है आदिवासी दर्शन, फारवर्ड प्रेस, साहित्‍य वार्षिकी अंक, मई, 2014