रोज केरकेट्टा

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रोज केरकेट्टा
Rose Kerketta.jpg
जन्म5 दिसम्बर 1940 (1940-12-05) (आयु 78)
कइसरा, बोलबा सिमडेगा, झारखंड, भारत
व्यवसायशिक्षा, लेखक और राजनीति
राष्ट्रीयताभारतीय
विधाकहानी, नाटक, निबंध और कविता
विषयआदिवासी-हिन्दी साहित्य
साहित्यिक आन्दोलनझारखंड आंदोलन
उल्लेखनीय कार्यsखड़िया लोक कथाओं का साहित्यिक और सांस्कृतिक अध्ययन (शोध ग्रंथ), प्रेमचंदाअ लुङकोय (प्रेमचंद की कहानियों का खड़िया अनुवाद), सिंकोय सुलोओ (खड़िया कहानी संग्रह), हेपड़ अवकडिञ बेर (खड़िया कविता एवं लोक कथा संग्रह), पगहा जोरी-जोरी रे घाटो (हिंदी कहानी संग्रह), सेंभो रो डकई (खड़िया लोकगाथा) खड़िया विश्वास के मंत्र (संपादित), अबसिब मुरडअ (खड़िया कविता संग्रह) और स्त्री महागाथा की महज एक पंक्ति (वैचारिक निबंधों का संग्रह)
सन्तानवंदना टेटे और सोनल प्रभंजन टेटे
जालस्थल
http://kharia.in

रोज केरकेट्टा (5 दिसंबर, 1940) आदिवासी भाषा खड़िया और हिन्दी की एक प्रमुख लेखिका, शिक्षाविद्, आंदोलनकारी और मानवाधिकारकर्मी हैं। आपका जन्म सिमडेगा (झारखंड) के कइसरा सुंदरा टोली गांव में खड़िया आदिवासी समुदाय में हुआ। झारखंड की आदि जिजीविषा और समाज के महत्वपूर्ण सवालों को सृजनशील अभिव्यक्ति देने के साथ ही जनांदोलनों को बौद्धिक नेतृत्व प्रदान करने तथा संघर्ष की हर राह में आप अग्रिम पंक्ति में रही हैं। आदिवासी भाषा-साहित्य, संस्कृति और स्त्री सवालों पर डा. केरकेट्टा ने कई देशों की यात्राएं की है और राज्य एवं राष्ट्रीय स्तर पर अनेक पुरस्कारों से सम्मानित हो चुकी हैं।

पारिवारिक जीवन[संपादित करें]

रोज केरकेट्टा खड़िया आदिवासी समुदाय से हैं जो झारखंड की पांच प्रमुख आदिवासी समुदायों में से एक है। उनकी मां का नाम मर्था केरकेट्टा और पिता का नाम एतो खड़िया उर्फ प्यारा केरकेट्टा है जो एक लोकप्रिय शिक्षक, समाज सुधारक, राजनीतिज्ञ और सांस्कृतिक अगुआ थे।

क्रिस्टोफर केरकेट्टा और प्रदीप कुमार सोरेंग (दिवंगत) उनके दो भाई हैं और रोशनी केरकेट्टा (दिवंगत), ग्लोरिया सोरेंग, शशि केरकेट्टा और सरोज केरकेट्टा चार बहने हैं। अपने पिता प्यारा केरकेट्टा की तरह ही रोज ने भी आजीविका के लिए शिक्षकीय जीवन को अपनाया।

उनका विवाह सुरेशचंद्र टेटे से हुआ था। जिनसे उनके वंदना टेटे और सोनल प्रभंजन टेटे दो बच्चे हैं। वंदना टेटे अपने नाना प्यारा केरकेट्टा और मां की तरह झारखंड आंदोलन से जुड़ी हैं और पिछले 30 वर्षों से सामाजिक-सांस्कृतिक व साहित्यिक क्षेत्र में सक्रिय हैं।

शिक्षा[संपादित करें]

  • प्रारंभिक शिक्षा कोंडरा (जिला गुमला), खुँटी टोली एवं सिमडेगा (जिला सिमडेगा) से
  • बी. ए. सिमडेगा कॉलेज, सिमडेगा से
  • एम. ए. रांची विश्वविद्यालय, रांची (झारखंड) से
  • रांची विश्वविद्यालय, रांची (झारखंड) से ‘खड़िया लोक कथाओं का साहित्यिक और सांस्कृतिक अध्ययन’ विषय पर डा. दिनेश्वर प्रसाद के मार्गदर्शन में पीएच. डी.

शिक्षण कार्य[संपादित करें]

  • माध्यमिक विद्यालय लड़बा (1966),
  • सिमडेगा कॉलेज, सिमडेगा (1971-72),
  • पटेल मौन्टेसरी स्कूल, एच. ई. सी. रांची (1976),
  • बी. एन. जालान कॉलेज, सिसई (1977-82),
  • जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग, रांची विश्वविद्यालय, रांची (झारखंड) (1982-दिसंबर 2000)

शिक्षा क्षेत्र में विशेष भागीदारी[संपादित करें]

ग्रामीण, पिछड़ी, दलित, आदिवासी, बिरहोड़ एवं शबर आदिम जनजाति महिलाओं के बीच शिक्षा एवं जागरूकता के लिए विशेष प्रयास। बिहार एवं झारखंड शिक्षा परियोजना की महिला समाख्या का नेतृत्व और उसकी रिसोर्स पर्सन

मूल्यांकन कार्य[संपादित करें]

  • झारखंड शिक्षा परियोजना सहित अनेक शैक्षणिक एवं सामाजिक संस्थाओं का मूल्यांकन
  • झारखंड पब्लिक सर्विस कमीशन (जे. पी. एस. सी.)
  • युनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन (यू. जी. सी.)
  • अब तक पांच पीएच. डी. शोध उपाधियों (2 संताली, कुड़ुख, खड़िया और नागपुरी एक-एक) का निदेशन
  • शांति निकेतन विश्वविद्यालय में इंटरव्यूवर

सामाजिक क्षेत्र में भागीदारी, कार्य एवं संबद्धता[संपादित करें]

विगत 50 वर्षों से भी अधिक समय से शिक्षा, सामाजिक विकास, मानवाधिकार और आदिवासी महिलाओं के समग्र उत्थान के लिए व्यक्तिगत, सामूहिक एवं संस्थागत स्तर पर सतत सक्रिय। अनेक राज्य स्तरीय, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं के साथ जुड़ाव। आदिवासी, महिला, शिक्षा और साहित्यिक विषयों पर आयोजित सम्मेलनों, आयोजनों, कार्यशालाओं एवं कार्यक्रमों में व्याख्यान व मुख्य भूमिका के लिए आमंत्रित।

आदि अनेक संगठनों व संस्थाओं से जुड़ाव।

मुद्दों पर कार्य[संपादित करें]

आदिवासी महिलाओं का विस्थापन, पलायन, उत्पीड़न, शिक्षा, जेन्डर संवेदनशीलता, मानवाधिकार एवं सम्पत्ति पर अधिकार.

राज्य स्तर पर भागीदारी[संपादित करें]

  • झारखंड आदिवासी महिला सम्मेलन की संस्थापक और 1986 से 1989 तक अन्य संस्थाओं एवं संगठनों के सहयोग से उसका संयोजन-संचालन
  • झारखंड गैर-सरकारी महिला आयोग की अध्यक्ष (2000 से 2006 तकद्ध

राष्ट्रीय स्तर पर भागीदारी[संपादित करें]

  • राष्ट्रीय नारी मुक्ति संघर्ष सम्मेलन, पटना, रांची और कोलकाता में
  • रांची सम्मेलन का संयोजन
  • मानवाधिकार पर मुम्बई, बंगलोर, दिल्ली, कोलकाता और छत्तीसगढ़ में

अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भागीदारी[संपादित करें]

  • एशिया पैसिफिक वीमेन लॉ एंड डेवलेपमेंट कार्यशाला, चेन्नई 1993 में
  • बर्लिन में आयोजित आदिवासी दशक वर्ष के उद्घाटन समारोह 1994 में
  • वर्ल्ड सोशल फोरम में
  • इंडियन सोशल फोरम में

भाषायी-साहित्यिक योगदान[संपादित करें]

  • पाठ्यक्रम निर्माण, जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग, रांची विश्वविद्यालय
  • खड़िया प्राइमर निर्माण, एन. सी. ई. आर. टी., नई दिल्ली
  • खड़िया भाषा ध्वनिविज्ञान, भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर

प्रमुख प्रकाशित पुस्तकें[संपादित करें]

विगत कई वर्षों से झारखंडी महिलाओं की त्रैमासिक पत्रिका ‘आधी दुनिया’ का संपादन।

इसके अतिरिक्त विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं, समाचार पत्रों, दूरदर्शन तथा आकाशवाणी से सभी सृजनात्मक विधाओं में हिन्दी एवं खड़िया भाषाओं में सैंकड़ों रचनाएँ प्रकाशित एवं प्रसारित। आपकी रचनाओं का अन्य भारतीय भाषाओं में भी अनुवाद हो चुका है।

सम्मान[संपादित करें]

2008 में मध्य प्रदेश सरकार द्वारा प्रथम रानी दुर्गावती राष्ट्रीय सम्मान और समय-समय पर अनेक क्षेत्रीय व राज्य स्तरीय पुरस्कारों-सम्मानों से सम्मानित।

संप्रति[संपादित करें]

जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग, राँची विश्वविद्यालय, राँची से सेवानिवृत्ति के पश्चात् स्वतंत्र लेखन एवं विभिन्न नागरिक संगठनों में सक्रिय भागीदारी।

और जानकारी[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. Zealous Reformers, Deadly Laws
  2. The Master Speaks
  3. Reinventing Revolution: New Social Movements and the Socialist Tradition in India (Google eBook)
  4. डॉ रोज केरकेट्टा को मिला रानी दुर्गावती सम्मान
  5. डॉ रोज केरकेट्टा के कहानी संग्रह पगहा जोरी-जोरी रे घाटो .का विमोचन
  6. आदिवासी लेखिका रोज केरकेट्टा को अयोध्या प्रसाद खत्री सम्मान
  7. रोज केरकेट्टा को प्रभावती सम्मान

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]