नाई

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भारत में नाई जाति का इतिहास अतिप्राचीन है। हिन्दू धर्म की सबसे प्राचीन पुस्तक वेदों में सविता ऋषि के रूप में इस जाति का इतिहास प्राप्त होता है। बौद्धकाल में भगवान बुद्ध के परम् शिष्य विनयधर उपालि जो की विनयपिटक के रचनाकार भी भी नाई जाति से सम्बंधित थे। आगे चलकर इसी वंश के महापद्मनंद ने महान मगध साम्राज्य में नन्द वंश की स्थापना की और भारतवर्ष में एक विशाल साम्राज्य की स्थापना की। प्रमाणों के आधार पर कहा जाता है कि उस समय सिकन्दर की सेना नंदो के डर से ही भारत से लौट गई।कुछ ऐतिहासिक प्रमाण मौर्य वंश को भी नंदो का उत्तराधकारी बताते हैं। कर्नल कूट के अनुसार यह एक चिकित्सक जाति है जिसने सदियों से प्लास्टिक सर्जरी जैसी विद्याओं में माहिर थी। दक्षिण भारत के नाई मुख्यतः तीन पेशों में वर्गीकृत हैं_बाल काटना,मंदिरों में वाद्ययंत्र बजाने वाले नाडा ब्राह्मणऔर चिकित्सक। यहाँ पर यह स्वयं को भगवान धन्वंतरि की संतान बताते हैं। वर्तमान में भारत में यह जाति पिछड़ी जाति की श्रेणी में आती है जो अपने राजनितिक उत्थान के लिए संघर्षरत है। इस समाज का एक तबका आज बाल काटने के व्यवसाय को पेशे के तौर कर रहा है। हिन्दू संस्कारों में यह प्रमुख सहायक के रूप में सक्रिय हैं।