नमक कोह

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मियाँवाली ज़िले में नमक कोह का नज़ारा
नमक कोह के दुसरे सबसे ऊँचे पहाड़, टिल्ला जोगियाँ (यानि 'योगियों का टीला') पर हिन्दू मंदिर

नमक कोह या नमक सार या नमक पर्वत (سلسلہ کوہ نمک‎, सिलसिला कोह-ए-नमक; Salt Range, सॉल्ट रेन्ज) पाकिस्तान के पंजाब प्रान्त के उत्तरी भाग में स्थित एक पर्वत शृंखला है। यह पहाड़ झेलम नदी से सिन्धु नदी तक, यानि सिंध-सागर दोआब कहलाने वाले क्षेत्र में, फैले हुए हैं। नमक कोह के पहाड़ों में सेंधे नमक के बहुत से भण्डार क़ैद हैं, जिनसे इस शृंखला का नाम पड़ा है। नमक कोह का सबसे ऊँचा पहाड़ १,५२२ मीटर ऊँचा सकेसर पर्वत (سکیسر‎, Sakesar) और दूसरा सबसे ऊँचा पहाड़ ९७५ मीटर ऊँचा टिल्ला जोगियाँ (ٹِلّہ جوگیاں‎, Tilla Jogian) है। यहाँ खबिक्की झील (کھبکی‎, Khabikki Lake) और ऊछाली झील (اوچھالی‎, Uchhalli Lake) जैसे सरोवर और सून सकेसर जैसी सुन्दर वादियाँ भी हैं जो हर साल पर्यटकों को सैर करने के लिए खेंचती हैं। इन पहाड़ियों में बहुत सी नमक की खाने भी हैं जिनसे नमक खोदकर निकाला जाता है। इन खानों में खेवड़ा नमक खान मशहूर है लेकिन वरचा, कालाबाग़ और मायो की खाने भी जानीमानी हैं। यहाँ का नमक हज़ारों सालों से पूरे उत्तरी भारतीय उपमहाद्वीप में भेजा जाता रहा है और इसका ज़िक्र राजा हर्षवर्धन के काल में आए चीनी धर्मयात्री ह्वेन त्सांग ने भी अपनी लिखाईयों में किया था।[1][2]

हिन्दू धार्मिक महत्व[संपादित करें]

ऐतिहासिक रूप से माना जाता है कि अपने देश-निकाले के दिनों में महाभारत के पांडवों ने यहीं शरण ली थी।[3] इन पहाड़ियों में बहुत-से बड़े-छोटे क़िलों और हिन्दू मंदिरों के खँडहर हैं जो छठी सदी ईसवी के बाद हिन्दू शाही ज़माने में बनने शरू हुए और इस क्षेत्र के इस्लाम के आगमन से पूर्व की कहानी बताते हैं। यह मंदिर कश्मीरी शैली के माने जाते हैं और कश्मीर से बाहर इस तरह के मंदिर सिर्फ़ यहीं दिखते हैं।[4] इनमें नमक कोह की उत्तरी ढलान पर स्थित कटासराज मन्दिर प्रसिद्ध हुआ करते थे। हिन्दू-मान्यता के अनुसार सति की मृत्यु पर शिव जब रोये तो उनके अश्रुओं से एक ताल राजस्थान में पुष्कर में बना और दूसरा नमक कोह में कटासराज में।[5] नमक कोह शृंखला के दुसरे सबसे ऊँचे पहाड़, टिल्ला जोगियाँ, के नाम का अर्थ पंजाबी भाषा में 'योगियों का टीला' है। इसकी ऊँचाई के कारण श्रद्धालु इस पर चढ़ा करते थे और योगी अक्सर यहाँ अपना डेरा लगते थे क्योंकि यहाँ सुबह के वक़्त सूरज की किरणें सबसे पहले पड़ती हैं। इसके महत्व के कारण सम्राट अकबर भी एक दफ़ा इसका दौरा करने आए थे।[6]

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. The Cambridge Economic History of India: c.1200-c.1750, Tapan Raychaudhuri, Irfan Habib, Dharma Kumar, CUP Archive, 1982, ISBN 978-0-521-22692-9, ... Quite surprisingly, in spite of the Salt range ('Koh-i Jud') being frequently mentioned in our authorities, there is no description of the mines until Abu'l Fazl offers one c. 1595. Since, however, the mines are mentioned by Yuan Chwang, it is quite likely that they continued to be worked during the time of the sultans ...
  2. The Mihran of Sind and its tributaries, Henry George Raverty, Sang-e-Meel Publications, 1979, ... In the year 643 H., which commenced on the 28th May, 1245 AD, he invaded the Dihli Kingdom by way of the Koh-i-Jud, Namak-Sar, or Salt' Range, and the Sind-Sagar Do-abah, keeping along its western frontier ...
  3. The Encyclopædia Britannica: A Dictionary of Arts, Sciences, Literature and General Information, Volume 15, Cambridge University Press, 1911, ... Hindu tradition represents the Salt Range as the refuge of the five Pandava brethren during the period of their exile ...
  4. Encyclopaedia of Religion and Ethics, Elibron.com, 2001, ISBN 978-1-4021-9433-7, ... The leading styles of Brahmanical temple architecture are six in number, namely, four northern and two southern. ... The Kashmiri style is restricted to the valley of Kashmir and the Salt Range country in the Panjab, between the Indus and the Jhelum ...
  5. Handbook of the Punjab, western Rajputana, Kashmir, and upper Sindh, Edward Backhouse Eastwick, John Murray (Publisher), 1883, ... Kataksh is on the N. side of the Salt Range, 16 m. from Pind Dadan, at a height of more than 2,000 ft. above the sea ... Shiva wept so, on the death of his wife Sati, that his tears formed the sacred pool of Pushkara near Ajmir and Kataksh, in the Sindh Sagar Doab ...
  6. Culture and customs of Pakistan, Iftikhar Haider Malik, Greenwood Publishing Group, 2006, ISBN 978-0-313-33126-8, ... The temple and adjacent complex at Tilla Jogian ... was a bustling religious center ... Tilla Jogian, like Pir Kattas, was a Brahminical seminary with extensive residences around, and had been visited by Emperor Akbar ...