दीनानाथ मल्होत्रा

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दीनानाथ मल्होत्रा (जन्म 1923, लाहौर - १३ दिसम्बर २०१७) एक भारतीय प्रकाशक, भारतीय स्वतन्त्रता सेनानी थे। उन्होने 1958 में हिन्द पॉकेट बुक्स की स्थापना की जिसने १९५० और ६० के दशक में हिन्दी की पेपरबैक पुस्तकों का बाजार विकसित किया। उन्होंने अपने जीवनकाल में 6500 लेखकों की किताबों का प्रकाशन अपने संस्थान हिन्द पाकेट बुक्स के जरिये करके हिंदी साहित्य की अपूर्व सेवा की जो पूरी दुनिया में एक रिकार्ड है।[1] सन् 2000 में आपको भारत सरकार ने भारत में पुस्तक वाचन और प्रसारण के लिए पद्मश्री से सम्मानित किया गया।

दीनानाथ मल्होत्रा प्रसिद्ध आर्यसमाजी बलिदानी महाशय राजपाल के पुत्र थे। उन्होने सन १९४४ में लाहौर विश्वविद्यालय से एम ए किया और स्वर्ण पदक प्राप्त किया।[2]

दीनानाथ मल्होत्रा को सन् 1988 में युनेस्को का अन्तरराष्ट्रीय पुस्तक पुरस्कार प्राप्त हुआ। यह पुरस्कार पाने वाले वह पहले भारतीय थे। वे आरम्भ से ही राष्ट्रीय पुस्तक विकास परिषद के सदस्य रहे। सन् 1966 से युनेस्को के पुस्तक सलाहकार रहे। वह सन् 1992 में नई दिल्ली में आयोजित 24 वें अंतर्राष्ट्रीय प्रकाशक कांग्रेस के अध्यक्ष थे। कॉपीराइट विशेषज्ञ के रूप में वह युनेस्को और WIPO की संयुक्त अंतर्राष्ट्रीय कॉपीराइट समिति के पहले अध्यक्ष थे। वे फ़ैडरेशन ऑफ़ इंडियन पब्लिशर्स के प्रेसिडेंट एमेरिटस भी रहे।

13 दिसम्बर, 2017 को नई दिल्ली में 94 वर्ष की आयु में निधन हुआ।

60 से अधिक वर्षों तक प्रकाशन क्षेत्र से जुड़े रहे श्री मल्होत्रा ने अपने जीवन संस्मरणों पर आधारित अंग्रेजी में पुस्तक लिखी "डेयर टू पब्लिश" (छापने का जोखिम भरा साहस)। यह पुस्तक भारत की अधिकांश भाषाओं में प्रकाशित हुई।

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. "भारतीय साहित्य प्रकाशन की दुनिया में पेपर बैक क्रांति के जनक दीनानाथ मल्होत्रा नहीं रहे". मूल से 10 अगस्त 2019 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 10 अगस्त 2019.
  2. "Indian man waits six decades for university award". मूल से 10 अगस्त 2019 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 10 अगस्त 2019.