जाधव

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यादव जाति : एक परिचय :- (1) यदोवनशं नरः श्रुत्त्वा सर्वपापैः परमुच्यते। यत्राव्तीर्णं कृष्णाख्यं परंब्रह्म निराकृति।। (श्री विष्णु पुराण) ************** (2) वर्णयामि महापुण्यं सर्वपापहरं नृणां। यदोर्वन्शं नरः श्रुत्त्वा सर्वपापैः प्रमुच्यते। यत्र-अवतीर्णो भग्वान् परमात्मा नराकृतिः। यदोसह्त्रोजित्क्रोष्टा नलो रिपुरिति श्रुताः।। (श्रीमदभग्वत् -महापुराण) अर्थ: (यदु वंश परम पवित्र वंश है। यह मनुष्य के समस्त पापों को नष्ट करने वाला है। इस वंश में स्वयम भगवान परब्रह्म ने मनुष्य के रूप में अवतार लिया था जिन्हें श्रीकृष्ण कहते है। जो मनुष्य यदुवंश का श्रवण करेगा वह समस्त पापों से मुक्त हो जाएगा. यादव भारत एवं नेपाल में निवास करने वाला एक प्रमुख जाति है, जो चंद्रवंशी राजा यदु के वंशज हैं। इस वंश में अनेक शूरवीर एवं चक्रवर्ती राजाओं ने जन्म लिया है, जिन्होंने अपने बुद्धि, बल और कौशल से कालजयी साम्राज्य की स्थापना किये। भाफ्वान श्री कृष्ण इनके पूर्वज माने जाते हैं। प्रबुद्ध समाजशास्त्री एम्. एस ए राव के अनुसार यादव एक हिन्दू जाति वर्ण, आदिम जनजाति या नस्ल है, जो भारत एवं नेपाल में निवास करने वाले परम्परागत चरवाहों एवं गड़ेरिया समुदाय अथवा कुल का एक समूह है और अपने को पौराणिक राजा यदु के वंशज मानते हैं। इनका मुख्य व्यवसाय पशुपालन और कृषि था। यादव जाति की जनसंख्या भारत की कुल जनसंख्या के लगभग 16% है। अलग-अलग राज्यों में यादवों की आबादी का अनुपात अलग-अलग है। 1931 ई० की जनगणना के अनुसार बिहार में यादवों की आबादी लगभग 11% एवं उत्तर प्रदेश में 8.7% थी। यादव भारत की सर्वाधिक आबादी वाली जाति है, जो कमोबेश भारत के सभी प्रान्तों में निवास करती है। नेपाल में भी यादवों के आबादी लगभग 20% के आसपास है। नेपाल के तराई क्षेत्र में यादव जाति की बहुलता अधिक है, जहाँ इनकी आबादी 25 से 30% है। वर्त्तमान एवं आधुनिक भारत में यादव समुदाय को भारत की वर्त्तमान सामाजिक एवं जातिगत संरचना के आधार पर मुख्य रूप से तीन जाति वर्ग में विभक्त किया जा सकता है। ये तीन प्रमुख जाति वर्ग है – 1. अहीर, ग्वाला, आभीर या गोल्ला जाति 2. कुरुबा, धनगर, पाल, बघेल या गड़ेरिया जाति तथा 3. यदुवंशी राजपूत जाति

4. जाधव (यादव राजाओं के वंशज) 1. अहीर, ग्वाला, आभीर - वर्तमान में अपने को यादव कहनेवाले ज्यादातर लोग इसी जाति वर्ग से आते हैं। यह योद्धा जाति रही है, परन्तु राज्य के नष्ट हो जाने पर जीवकोपार्जन हेतु इन्होनें कृषि एवं पशुपालन का व्यवसाय अपना लिया। इनका इतिहास बहुत ही संघर्षपूर्ण रहा है। अलग-अलग कालखंडों में इनकी सामाजिक स्थिति अलग -अलग रही है। प्राचीन काल में ये क्षत्रिय वर्ण के अंतर्गत आते थे, परन्तु कालांतर में आर्थिक स्थिति ख़राब हो जाने एवं पशुपालन व्यवसाय के अपनाने के कारण इन्हें शुद्र भी कहा गया है। इस जाति का गौपालन के साथ पुराना रिश्ता रहा है। अहीरों की तीन मुख्य शाखाएं है – यदुवंशी, नंदवंशी एवं ग्वालवंशी | अहीर, ग्वाला, गोप आदि यादव के पर्यायवाची है। पाणिनी, कौटिल्य एवं पंतजलि के अनुसार अहीर जाति के लोग हिन्दू धर्म के भागवत संप्रदाय के अनुयायी हैं। अमरकोष में गोप शब्द के अर्थ गोपाल, गोसंख्य, गोधुक, आभीर, वल्लब, ग्वाला व अहीर आदि बताये गए हैं। प्राकृत-हिन्दी शब्दकोश के अनुसार भी अहिर, अहीर, आभीर व ग्वाला समानार्थी शब्द हैं। हिन्दी क्षेत्रों में अहीर, ग्वाला तथा यादव शब्द प्रायः परस्पर समानार्थी माने जाते हैं। वे कई अन्य नामो से भी जाने जाते हैं, जैसे कि गवली, घोसी या घोषी, तथा बुंदेलखंड में दौवा अहीर। गंगाराम गर्ग के अनुसार अहीर प्राचीन अभीर समुदाय के वंशज हैं, जिनका वर्णन महाभारत तथा टोलेमी के यात्रा वृतान्त में भी किया गया है। उनके अनुसार अहीर संस्कृत शब्द अभीर का प्राकृत रूप है। अभीर का शाब्दिक अर्थ होता है- निर्भय या निडर| वे बताते हैं कि बर्तमान समय में भी बंगाली एवं मराठी भाषा में अहीर को अभीर ही कहा जाता है। अहीरों की ऐतिहासिक उत्पत्ति को लेकर विभिन्न इतिहासकर एकमत नहीं हैं। परंतु महाभारत या श्री मदभागवत गीता के युग में भी यादवों के आस्तित्व की अनुभूति होती है तथा उस युग में भी इन्हें आभीर, अहीर, गोप या ग्वाला ही कहा जाता था।[20] कुछ विद्वान इन्हे भारत में आर्यों से पहले आया हुआ बताते हैं, परंतु शारीरिक गठन के अनुसार इन्हें आर्य माना जाता है।[21] पौराणिक दृष्टि से, अहीर या आभीर यदुवंशी राजा आहुक के वंशज है। संगम तंत्र में उल्लेख मिलता है कि राजा ययाति के दो पत्नियाँ थीं-देवयानी व शर्मिष्ठा। देवयानी से यदु व तुर्वशू नामक पुत्र हुये। यदु के वंशज यादव कहलाए। यादव राजाओं के वंशज जाधव भी कहलाते हैं।