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जगनेर

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जगनेर
उँचाखेड़ा
जगनेर is located in उत्तर प्रदेश
जगनेर
जगनेर
उत्तर प्रदेश में स्थिति
निर्देशांक: 26°51′47″N 77°36′07″E / 26.863°N 77.602°E / 26.863; 77.602निर्देशांक: 26°51′47″N 77°36′07″E / 26.863°N 77.602°E / 26.863; 77.602
देश भारत
राज्यउत्तर प्रदेश
ज़िलाआगरा ज़िला
जनसंख्या (2011)
  कुल11,575
भाषाएँ
  प्रचलितहिन्दी
समय मण्डलभारतीय मानक समय (यूटीसी+5:30)
पिनकोड283115

जगनेर (Jagner) भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के आगरा ज़िले में स्थित एक नगर है।[1][2] जगनेर आगरा से लगभग 40 किलोमीटर दूर एक छोटा सा शहर और एक नगर पंचायत है। यहां लगभग 1000 वर्ष पुराना जगनेर का ऐतिहासिक दुर्ग है।

जगनेर, आगरा जनपद का सीमावर्ती कस्बा है जो राजस्थान सीमा से लगा है। यह आगरा से कागारौल के रास्ते में तांतपुर जाने वाली सड़क पर स्थित है। जगनेर अपने इतिहास के लिए जाना जाता है। यहां पर कई शासकों ने शासन किया परंतु उनमें महाराजा जगन सिंह का नाम प्रमुख रूप से लिया जाता है जो 'आल्ह खंड' के रचयिता एवं 13वीं शताब्दी के शासक थे। उनकी पत्नी का नाम रानी जमुना कंवर था।

‘आगरा गजेटियर’ के अनुसार जगनेर को पहले इस क्षेत्र को 'ऊँचाखेड़ा' कहते थे। कर्नल टाड के अनुसार ‘नेर’ का अर्थ है चारों ओर से प्राचीरबद्ध नगर जैसे बीकानेर, सांगानेर, चंपानेर, अजमेर, बाड़मेर अत्यंत संरक्षित नगर थे और जिन्हें बाद में किले का स्वरुप प्रदान किया।

जगनेर एक पहाड़ी दुर्ग के चारों ओर फैला हुआ है तथा पत्थर के खदान और सरसों तेल निकासी के लिए भी प्रसिद्ध है। वर्तमान समय में यह दुर्ग भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के संरक्षण में है।[3]

जगनेर दुर्ग

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यह दुर्ग भूस्तर से 122 मीटर की उंचाई पर एक तेज़ पहाड़ी पर स्थित है। अरावली के पर्वतों के बीच ऊंचे टीले पर निर्मित इस विशाल दुर्ग को समय के थपेड़ों ने धूमिल कर दिया है। इसके भग्नावेष की प्रथम दृष्टि डालते ही ऐसा लगता है कि यह किला अपने अन्दर कोई बड़ा इतिहास छुपाये बैठा है। किले की सुनियोजित वास्तु- प्रणाली कर दिग्दर्शन से ऐसा लगता है कि महोबा नरेश आल्हा-ऊदल के मामा राजा राव जयपाल ने 12वीं शताब्दी में इसे बहुत ही सुरुचिपूर्ण ढंग से इसे बनवाया था। यहां लाल पत्थर की शिला पर उत्कीर्ण है कि इसे जगन पंवार ने बनवाया था।

इस दुर्ग की निर्माणशैली कुछ-कुछ राजस्थान के सिरमौर गढ़ चित्तौड़ से मिलती जुलती है। पश्चिम छोर से पहाड़ी पर चढ़ा जा सकता है जहाँ एक बावड़ी भी है। अन्य दिशाओं से यह दुर्गम प्रतीत होता है। जगनेर बस्ती की ओर से लम्बी घुमावदार पत्थर की अनगढ़ सीढि़यों की शृंखला प्रतीत होती है। हिन्दू भवननिर्माण शैली की विशेषताओं से युक्त इस किले में मन्दिर के अतिरिक्त शासकीय आवास, सैन्य गृह एवं सैन्य सामग्री प्रकोष्ठ के भग्नावेष भी देखे जा सकते हैं।

एतिहासिकता

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जगनेर दुर्ग के भग्नावशेष

इस दुर्ग का की नींव 12वीं शताब्दी में राजा जयपाल सिंह ने रखी थी। यह आल्हा और ऊदल के सगे मामा भी थे। आल्हा और ऊदल का समय 12वीं शताब्दी का माना जाता है, जो राजा परमाल के शासनकाल में चंदेल राजाओं के सेनापति थे। आल्हा चन्देल राजा परमर्दिदेव (परमल ) के एक महान सेनापति थे, जिन्होंने 1182 ई० में पृथ्वीराज चौहान से लड़ाई लड़ी थी, जो “आल्हा-खण्ड” ग्रन्थ में अमर हो गए। आल्हा ऊदल का, असली मामा श्री उनके राजा जयपाल सिंह थे जो बहुत उदार थे।

राजपूत काल में जगनेर परमारों और चंदेलों के अधिकार में था। किन्तु जगनेर के स्वतंत्र शासक बैनीसिंह ने पृथ्वीनाथ चैहान निरन्तर युद्ध किया । गुर्जर प्रतिहारों के पतन के पश्चात् परमारों और चन्देलों का अभ्युदय हुआ। उनकी शक्ति प्रतिदिन बढ़ती गयी। निरन्तर युद्ध और प्रतिस्पर्धा का शिकार जगनेर का किला भी बना रहा। मेवाड़ के शासकों ने परमार को पराजित कर बिजौली की ओर खदेड़ कर उनके द्वारा पुनः अधिकार करने का प्रयास किया।

कुतुबद्दिन ऐबक और इल्तुमिश ने राजस्थान पर विजय कर जगनेर के शासक को अपनी अधीनता स्वीकार करने के लिए बाध्य किया। किन्तु यहाँ के वीर राजपूत अपनी अस्मिता के लिए निरन्तर युद्धरत् रहे। 1510 ई0 में इसे मुगलों ने जीत कर अकबर ने जगनेर के दुर्ग पर मुस्लिम सूबेदार नियुक्त किया। जिसके द्वारा इस किले में ‘लाल पत्थर का मेहराबदार द्वार’ बनवाया। किले में उत्कीर्ण एक लेख से ज्ञात होता है कि अकबर ने राजस्थान विजय के लिए जगनेर को ही केन्द्र बनाया। यहाँ पर्याप्त मात्रा में अस्त्र-शस्त्र सैनिक एवं खाद्य सामग्री रखी जाती थी।

मुगल साम्राज्य के पश्चात जगनेर के दुर्ग ने जाट, मराठे और अग्रेजों का सत्ता-सघर्ष देखा।

ग्वाल बाबा मन्दिर व छतरी

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किले में एक जाग मन्दिर है। यह एक लोकप्रिय तीर्थ स्थल है, जहां ग्वाल बाबा की समाधि है। सदियों पहले गुफा में रहते के नाम पर इस घर का नाम पर ‘’ग्वाल बाबा’’ नाम रखा गया है ।[4] जहां ग्वाल बाबा का मशहूर मंदिर भी है। यह आगरा जिले के दक्षिण राजस्थान में की नोक पर आगरा शहर से ही लगभग 57 किमी दूर स्थित है। किले में ही राजा जयपाल सिंह ने संत ग्वाल बाबा की छत्री और समाधि का निर्माण करवाया था जो आज भी यहां मौजूद है और हर वर्ष संत ग्वाल बाबा की याद में यहां ब्राह्मण समाज द्वारा मेले का अयोजन कराया जाता है, जिसमें सभी वंश, कुल धर्म के लोग श्रद्धा से ग्वाल बाबा के समाधि पर मत्था टेकते है।

सन्दर्भ

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