घांची

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
Jump to navigation Jump to search

ef> इसमें लिखी जानकारी तथ्यों से परे हैं और क्षत्रिय राजपुत घाँची के इतिहास के साथ छेड़छाड़ हैं, इस पर भरोसा ना करें, सिर्फ और सिर्फ शोशल मीडिया आने से पहले की इतिहासकारों की लिखी पुरानी पुस्तको की जानकारी पर भरोसा करें, कुछ असामाजिक लोग क्षत्रिय घांची समाज के इतिहास के साथ खिलवाड़ कर अपने एजेंडा को इसमें घुसेड़ रहे हैं धन्यवाद

क्षत्रिय घांची लाटेचा राजपुत (लाट प्रदेश से आने की वजह से लाटेचा राजपुत कहा गया )' जो कि अहिलनवाड़ा की 8 क्षत्रिय कुल के 173 राजपुत सरदारो जो कि वर्णित निम्न दोहे द्वारा है -


【【< तवां चालक गुणतीस, बीस खट्‌ प्रमार बखाणु । राठोड़ पच्चीस , बेल बारेह बौराणा ॥ लाभ सोलेह गेहलोत, भाटी उगणीस भणिजे । सात पढिहार सुणोजे ॥ सुदेचा तीन बदव सही , कवि रुद्र कीरत करे । राजरे काज करवारी थू , साख साख जेता सरे ॥ ]]


भावार्थ -  गुणतिस 29 सौलंकी गोत्र के सरदार ! छब्बीस 26 परमार(पँवार) गोत्र के सरदार !  पच्ची 25 राठौड़ गोत्र के , बीस 20 गहलोत गोत्र के ,20 बोराणा सरदार , 19 भाटी गोत्र के सरदार ! बीस 20 चौहान गोत्र के 7 पढियार गोत्र  के व तीन 3 सुंदेचा (परिहारिया ) तीन भाई सरदार  थे कुल 173 सरदार थे जिसकी कविताए रूद्र करता है । ( रुद्र पाटण के राजदरबार के  राज राव थे )

कुल 173 राजपुत सरदारो ने कुमारपाल सिंह[सोलंकी] और वेलसिंह[भाटी] व जैसलसिंह [भाटी]के नेतृत्व में दारू और मांस को प्रतिबंध करके क्षत्रिय कर्म को प्रधान रखते हुए लाठेचा राजपुत (वर्तमान में क्षत्रिय घाँची) समाज की "विक्रम संवत 1191 ज्येष्ट शुक्ल पक्ष तीज वार रविवार,को नए समाज का अंगीकरण किया, उन 8 क्षत्रिय कुल के 173 राजपुत सरदारो को अपनी मातृभूमि पाटण छोड़ने का कारण केवल तत्कालीन महाराजा जयसिंह ने अपने वचन देने के बाद भी उन का दूसरे द्वारा अपमान किया और उन को तुकारो/रेकारों(इला) देने पर उन ने अपनी मातृभूमि छोड़कर 1191 से 1199 तक आबु नरेश विक्रमसिंह परमार के राज में ठहरे ओर 1199 में राजपुताना में प्रवेश करा जो कि मारवाड़ सिरोही ओर जालोर रियासतों में बस गए और 12 वी शताब्दी में जब अहिलनवाड़ा के राजा सिद्धराज जयसिंह सौलंकी की मर्त्यु के पचात उनके भतीजे विश्वेश्वर कुमारपाल सिंह जो कि क्षत्रिय घाँची समाज के संस्थापक थे उनको पुनः अहिलनवाड़ा भेजा गया था वहाँ के उत्तराधिकारी के रूप में कुमारपाल सिंह के राज्याभिषेक के बाद पुनः उन्होंने उन सभी 8 कुल के राजपुत सरदारो को अहिलनवाड़ा बुलाकर पुनः रजपूती में लौटने का आग्रह किया गया पर उनमें से कुछ सरदार पुनः अहिलनवाड़ा जाकर अपनी मूल पहचान ग्रहण कर ली व बाकी ने क्षत्रिय लाठेचा सरदारो ने (वर्तमान में क्षत्रिय घाँची) जाति के रूप में राजपुताना में ही रहना स्वीकार किया !जब कुमारपाल सिंह के राज्य की सीमा जैसलमेर तक लगने लगी तो उन्होंने अपने द्वारा अंगीकृत लाटेचा राजपुत सरदारो के लिए मारवाड़ रियासत के पाली कस्बे में इष्टदेव सोमनाथ महादेव मंदिर का निर्माण अपने राजकोषीय व्यय से करवाया ताकि लाटेचा राजपुत सरदार मारवाड़ में रहते हुए भी अपने इष्टदेव सोमनाथ को याद कर सके राजस्थान [1]



' [1]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. People of India Gujarat Vlume XXII Part One Editors R. B Lal, P.B.S.V Padmanabham, G Krishnan and M Azeez Mohideen pages 307 to 309