गौतम धर्मसूत्र

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
Jump to navigation Jump to search

गौतम धर्मसूत्र अब तक उपलब्ध धर्मसूत्रों में प्राचीनतम है। यद्यपि सभी धर्मसूत्र ग्रंथ बिना किसी शाखाभेद के संपूर्ण आर्यजन को सामान्य रूप से मान्य हैं, तथापि कुमारिल (तंत्रवार्तिक, काशी, पृ. 179) के अनुसार गौतम धर्मसूत्र और गोभिल गृह्यसूत्र छंदोग (सामवेद) अध्येताओं के द्वारा विशेष रूप से परिगृहीत हैं। गौतम धर्मसूत्र के आंतरिक साक्ष्य से कुमारिल के मत की पुष्टि होती है। इस ग्रंथ का संपूर्ण 26वां अध्याय सामवेद के ब्राह्मण सामविधान से गृहीत है। सामवेदीय गोभिलगृह्यसूत्र में गौतम के प्रमाणों के उद्धरण हैं। परंपरा के अनुसार सामवेद की शाखा राणायनीय का एक सूत्रचरण गौतम था और संभवत: इसी सूत्रचरण में गौतमधर्मसूत्र की रचना हुई। यह कल्पना भी दूरारूढ़ नहीं कि धर्मसूत्र के अतिरिक्त गौतमसूत्रचरण के गृह्य और श्रौतस्त्र थे जो अब उपलब्ध नहीं।

सामयाचारिक अथवा स्मार्त धर्म का विवेचन करनेवाले इस धर्मसूत्र में 28 अध्याय हैं, जिनमें वर्ण, आश्रम और निमित्त (प्रायश्चित्त) धर्मों का विस्तृत तथा गुणधर्म (राजधर्म) का अपेक्षतया संक्षिप्त विधान है। धर्मप्रमाण, प्रमाणों का पौर्वापर्य, उपनयन, शौच (अ. 1-2), ब्रह्मचारी, भिक्षु और बैखानस आश्रमों की विधि (अ.-3), गृहस्थाश्रम से संबद्ध संस्कार और कर्तव्य (अ. 4-6), ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र के कर्तव्य (अ. 9-10), राजधर्म (अ. 11), दंड (अ. 11-13), शौच (अ. 14), स्त्रीधर्म (अ. 18), प्रायश्चित्त (अ. 18-27), दायभाग (अ. 27, 28) एवं पुत्रों के प्रकार (अ. 28) का विवेचन है।

इस धर्मसूत्र का उपलब्ध रूप अनेक प्रक्षेपों से युक्त है। उदाहरण के लिये 19वें अध्याय में कर्मविपाक का अंश बाद में जोड़ा गया है। इसपर न तो मस्करी का भाष्य और न हरदत्त की व्याख्या है। बौधायन (2, 2, 4, 17) द्वारा उद्धृत गौतमधर्मसूत्र के वचन तथा प्रस्तुत धर्मसूत्र के आंतरिक साक्ष्य पर अध्याय 6 का छठा सूत्र भी परवर्ती प्रक्षेप प्रतीत होता है।

इसमें अन्य धर्मसूत्रों के समान बीच बीच में फुटकर पद्य नहीं हैं। संपूर्ण गौतमधर्मसूत्र गद्य में है, यद्यपि कुछ सूत्र वत्तगंधिशैली में लिखे गए हैं और अनुष्टुप् के अंश प्रतीत होते हैं, अन्य धर्मसूत्रों की अपेक्षा इसकी भाषा पाणिनीय व्याकरण की अधिक अनुयायिनी है, किंतु यह संस्कार भी बाद का प्रतीत होता है।

क्योंकि इस धर्मसूत्र में सामविधान ब्राह्मण का एक अंश गृहीत है और वसिष्ठ और बौधायन धर्मसूत्रों में इस धर्मसूत्र के मतों का नामपूर्वक उल्लेख है, अत: इसकी रचना सामविधान ब्राह्मण के बाद और वसिष्ठ और बौधायनधर्मसूत्रों के पूर्व हुई होगी। इस तथ्य तथा बौद्ध धर्म के द्वारा की गई वर्णाश्रम धर्म की आलोचना के अनुल्लेख तथा उसकी प्रत्यालोचन के अभाव के आधार पर इस धर्मसूत्र का रचनाकाल 600-400 ई. पूर्व माना गया है।

इसपर हरदत्त की "मिताक्षरा" व्याख्या और मस्करी का "भाष्य" है।

कर्त्ता[संपादित करें]

गौतम धर्मसूत्र के रचियता ऋषि गौतम मुनि माने जाते हैं। गौतम नाम का उल्लेख प्राचीन शास्त्रों में अनेकत्र पाया जाता है। यथा न्याय दर्शन के प्रणेता भी अक्षपाद गौतम माने जाते हैं। कठोपनिषद में गौतम का प्रयोग नचिकेता तथा उसके पिता वाजश्रवस् के लिए हुआ है। इसी प्रकार छान्दोग्य उपनिषद* में हारिद्रुम नाम के आचार्य का उल्लेख हुआ है। अथर्ववेद* में भी गौतम नाम है। ऋग्वेद* के ऋषि रहूगण गौतम हैं। इनमें से किसने धर्मसूत्र का प्रणयन किया है, यह अनिश्चित है। चरणव्यूह की टीका के अनुसार गौतम सामवेद की राणायनी शाखा के एक विभाग के आचार्य थे।*

गौतम धर्मसूत्र का स्वरूप[संपादित करें]

गौतम धर्मसूत्र में केवल तीन प्रश्न हैं। प्रथम तथा द्वितीय प्रश्न में नौ–नौ अध्याय तथा तृतीय प्रश्न में दस अध्याय हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण गौतम धर्मसूत्र 28 अध्यायों में विभक्त है, जिसमें एक सहस्त्र सूत्र है। यह ग्रंथ केवल गद्य में है तथा सभी धर्मसूत्रों में प्राचीनतम है। इस ग्रंथ में वेदों के मन्त्रांशों को सूत्र रूप में उद्धृत किया गया है। यद्यपि इन सूत्रों में यजुर्वेद के मन्त्र भी उद्धृत हैं[1] तथापि इस ग्रंथ का सम्बन्ध सामवेद से माना जाता है, क्योंकि इसमें न केवल सामवेद के अनेक विषयों को ही ग्रहण कर लिया गया है, अपितु सामवेद के कई सूक्तों का निर्देश भी है। साथ ही इस ग्रंथ के तृतीय प्रश्न के अष्टम अध्याय में अनेक सूत्र सामवेद के सामविधान ब्राह्मण से उद्धृत है। इसी प्रकार तृतीय प्रश्नपत्र के प्रथम अध्याय के बारहवें सूत्र में सामवेद के नौ मन्त्रों का निर्देश है। प्रथम प्रश्न के प्रथम अध्याय के सूत्र 52वें तथा तृतीय प्रश्न के सप्तम अध्याय के 8वें सूत्र में पाँच महाव्याहृतियों का उल्लेख किया गया है।[2] इन व्याहृतियों का सम्बन्ध भी सामवेद से ही है। इन प्रमाणों के आधार पर गौतम धर्मसूत्र का सम्बन्ध सामवेद से स्पष्ट है। म. म. काणे ने गौतम धर्मसूत्र का सम्बन्ध गौतमकल्प से माना है, किन्तु साथ ही उन्होंने इसकी स्वतन्त्र रचना का मत भी प्रतिपादित किया है।*

गौतम धर्मसूत्र में प्रक्षेप[संपादित करें]

समय समय पर गौतम धर्मसूत्र में प्रक्षेप भी होते रहे हैं। ऐसा प्रायः अनेक ग्रंथों के साथ हुआ है। गौतम धर्मसूत्र भी इसका अपवाद नहीं है। प्रमाण रूप में कहा जा सकता है कि बौधायन धर्मसूत्र में गौतम के नाम से यह मत उद्धृत किया गया है कि ब्राह्मण को क्षत्रिय की वृत्ति स्वीकार नहीं करनी चाहिए।* किन्तु वर्तमान गौतम धर्मसूत्र में यह मत उपलब्ध नहीं होता, अपितु इसके स्थान पर यह कहा गया है कि आपत्काल में ब्राह्मण क्षत्रिय तथा वैश्य की वृत्ति को भी अपना सकता है।* इसी प्रकार वसिष्ठ धर्मसूत्र में भी गौतम के नाम से यह विचार व्यक्त किया गया है कि यदि कोई आहिताग्नि यात्रा में मर जाए तो उसके सपिण्ड घास–फूस के पुतले का पुनर्दाह करें, किन्तु वर्तमान गौतम धर्मसूत्र में ऐसा कोई सूत्र नहीं है। गौतम धर्मसूत्र में अनेक पाठ–भेद भी उपलब्ध होते हैं तथा कई पाण्डुलिपियों में कर्मविपाक पर एक पूरा प्रकरण जोड़ दिया गया, जिस पर हरदत्त की व्याख्या नहीं है। इन प्रमाणों के आधार पर विद्वानों की धारणा है कि गौतम धर्मसूत्र में समय समय पर अनेक परिवर्तन होते रहे हैं। कुन्दलाल शर्मा जी का विचार हैः– 'इस प्रकार के पाठ–भेद या प्रक्षेप कुमारिल से पूर्व ही किए गए थे क्योंकि 'तन्त्र वार्त्तिक'* में इस प्रकार के पाठभेदों की चर्चा की गई है। मिताक्षरा, स्मृतिचन्द्रिका तथा अन्य ग्रंथों में उद्धृत इस रचना के अनेक सूत्र वर्तमान संस्करणों में उपलब्ध नहीं हैं।'

गौतम धर्मसूत्र का काल[संपादित करें]

गौतम धर्मसूत्र का काल ईसा पूर्व 400–600 के पहले माना जाता है। इस अवधारणा में हेतु यह है कि अनेक ग्रंथों में गौतम का उल्लेख प्राप्त होता है। जिससे स्वतः सिद्ध है कि गौतम धर्मसूत्र उनसे पूर्ववर्ती है। इसी प्रकार गौतम धर्मसूत्र में भी अन्य साहित्य का उल्लेख प्राप्त होता है। अतः इस सूत्रग्रंथ को उस साहित्य से परवर्ती ही मानना होगा। दोनों पक्ष इस प्रकार हैं–

गौतम धर्मसूत्र में किसी भी धर्मसूत्रकार के नाम का उल्लेख प्राप्त नहीं होता, अपितु 'इत्येके', 'एकाषाम्', 'एके' आदि शब्दों के द्वारा ही अपने से पूर्ववर्ती आचार्यों का उल्लेख इसमें किया गया है। गौतम धर्मसूत्र* में मनु के नाम से एक मत दिया गया है।* गौतम धर्मसूत्र की व्याख्या करते समय मस्करी ने अपनी व्याख्या की पुष्टि में अनेक उदाहरण मनुस्मृति से दिए हैं। शोधकों ने गौतम धर्मसूत्र मथा मनुस्मृति के पदों में 500 से अधिक समानताएं खोज लीं हैं तो भी इससे यह सिद्ध नहीं होता कि वर्तमान मनुस्मृति गौतम धर्मसूत्र का मुख्य स्रोत है।* गौतम धर्मसूत्र* में ‘लोकवेदवेदांगवित्’ कहकर वेद–वेदांग तथा* में ‘वाकोवाक्येतिहासपुराणकुशलः’ कहकर पुराण आदि की चर्चा भी की है। साथ ही गौतम धर्मसूत्र* में उपनिषद्–वेदान्त आदि का उल्लेख भी किया है।* इसी प्रकार 2–2–28 में निरूक्त* की ओर भी संकेत हैं।* इन प्रमाणों के आधार पर गौतम धर्मसूत्र इन ग्रंथों में से परवर्ती प्रतीत होता है।

बौधायन धर्मसूत्र में दो बार गौतम का उल्लेख हुआ है।* सामवेद के श्रौतसूत्र लाट्यायन* एवं द्राह्यायण* भी गौतम को उद्धृत करते हैं। सामवेदीय गोभिलगृह्यसूत्र* भी गौतम धर्मसूत्र को प्रामाणिक मानता है। वसिष्ठ धर्मसूत्र* में गौतम को उद्धृत किया गया है। गौतम धर्मसूत्र का 19वां अध्याय ही वसिष्ठ धर्मसूत्र में 22वें अध्याय के रूप में है। मनुस्मृति* में गौतम को उतथ्य का पुत्र कहा गया है तथा याज्ञवल्क्य–स्मृति में* गौतम की गणना धर्मशास्त्रों में की गई है। शंकराचार्य ने वेदान्तसूत्र–भाष्य* में गौतम धर्मसूत्र* को उद्धृत किया है।* इन प्रमाणों के आधार पर गौतम धर्मसूत्र इन रचनाओं के पश्चात् ठहराता है। डॉ॰ जॉली गौतम धर्मसूत्र को आपस्तम्ब धर्मसूत्र से शताब्दियों पूर्व मानते हैं।* म. म. काणे का विचार है कि गौतम धर्मसूत्र के समय पाणिनि का व्याकरण या तो था ही नहीं और यदि था तो वह अपनी महत्ता स्थापित नहीं कर सका था। निष्कर्ष स्वरूप गौतम धर्मसूत्र का रचना काल 600 ई. पू. में रखा जा सकता है।

प्रतिपाद्य विषय[संपादित करें]

गौतम धर्मसूत्र में वर्णित विषयों की सूची इस प्रकार है–

प्रथम प्रश्नः[संपादित करें]

प्रथम अध्याय – धर्म, उपनयन, शुद्धि–प्रकरण, छात्रों के नियम।

द्वितीय अध्याय – ब्रह्चारी के नियम, आचरण और निषेध।

तृतीय अध्याय – गृहस्थाश्रम, सन्यास और वानप्रस्थ के नियम।

चतुर्थ अध्याय – गृहस्थ का धर्म, विवाह और पुत्रों के प्रकार।

पंचम अध्याय – पंच महायज्ञ और मधुपर्क।

षष्ठम अध्याय – अभिवादन के नियम और व्यक्तियों के प्रति आचरण।

सप्तम अध्याय – गुरुसेवा और ब्राह्मण के कर्त्तव्य।

अष्टम अध्याय – राजा और बहुश्रुत संस्कार।

नवम अध्याय – व्रत और आचरण के दैनिक नियम।

द्वितीय प्रश्न[संपादित करें]

प्रथम अध्याय – चारों वर्णों के कर्त्तव्य।

द्वितीय अध्याय – राजा के कर्त्तव्य और धर्म–निर्णय की प्रक्रिया। \

तृतीय अध्याय – अपराध और उनके दण्ड, ब्याज, ऋण।

चतुर्थ अध्याय – विवाद और उनके निर्णय, साक्षी और व्यवहार, सत्यभाषण, न्यायकर्त्ता।

पंचम अध्याय – मृत्यु और जन्मविषयक अशौच।

षष्ठम अध्याय – श्राद्धकर्म।

सप्तम अध्याय –वेदाध्ययन की विधि और अनध्याय।

अष्टम अध्याय – भक्ष्य और पेय पदार्थ।

नवम अध्याय – स्त्री के धर्म।

तृतीय प्रश्न[संपादित करें]

प्रथम अध्याय – प्रायश्चित्त।

द्वितीय अध्याय – त्याज्य व्यक्ति।

तृतीय अध्याय – पातक और महापातक।

चतुर्थ अध्याय से सप्तम अध्याय – प्रायश्चित्त।

अष्टम अध्याय – कृच्छ्र व्रत।

नवम अध्याय – चान्द्रायण व्रत और

दशम अध्याय – सम्पत्ति का विभाजन।

प्रतिपाद्य का विश्लेषण[संपादित करें]

प्रायः सभी धर्मसूत्रों का प्रतिपाद्य मनुष्य के व्यक्तिगत तथा सामाजिक आचार एवं कर्त्तव्य हैं। गौतम धर्मसूत्र में भी इनके सम्बन्ध में विशद विवेचन किया गया है। अन्य धर्मसूत्रों के समान गौतम धर्मसूत्र में भी मुख्यतः वर्णों एवं आश्रमों के नियमों तथा वर्णों के दैनिक धर्मकृत्यों का विधान किया गया है। वर्णाश्रम–व्यवस्था को गौतम धर्मसूत्र अत्यंत महत्व प्रदान करता है, यहाँ तक कि इसमें वर्णाश्रम से हीन, अपवित्र तथा पतितों के साथ सम्भाषण का भी निषेध है। ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वैखानस तथा भिक्षु के रूप में गौतम ने मनुष्य जीवन को चार आश्रमों में विभक्त करके चारों आश्रमवासियों के कर्त्तव्यों के विस्तार से उल्लेख किया है। गौतम गृहस्थाश्रम को महत्व देते हैं, क्योंकि सभी आश्रम इसी के आश्रित हैं। अन्य आश्रमों के अन्ग्रत भिक्षु नाम से सन्यासाश्राम को गौतम महत्वपूर्ण मानते हैं। वानप्रस्थ या वैखानस गृहस्थ तथा सन्यास के बीच की कड़ी है। गौतम ने उन सभी आश्रमों के कर्त्तव्यादि के विषय में विस्तार से विचार किया है।

अतिथि–सत्कार[संपादित करें]

आश्रम–व्यवस्था के अन्तर्गत गौतम ने अतिथि–सत्कार को बहुत महत्व दिया है। गौतम धर्मसूत्र* के अनुसार संन्यासी को भी अतिथि सेवा करनी चाहिए तथा गृहस्थ को ‘देवपितृमनुष्यर्षिपूजक’ होना चाहिए। दुःखी, रोगी, निर्धन और विद्यार्थी की सहायता करना गृहस्थ का परम धर्म है। उसे अतिथि, बालक, रोगी, स्त्री, वृद्धों, सेवकों को भोजन देकर स्वयं भोजन करना चाहिए। गृहस्थ–धर्म के पालनार्थ गौतम ने पांच महायज्ञों का विधान किया है।* इसके साथ ही इस धर्म की शुद्धता के लिए अनेक नियम भी बनाए हैं। आश्रम–धर्म के प्रसंग में गौतम धर्मसूत्र में दया, क्षमा, परनिन्दाराहित्य आदि मानवीय गुणों पर बल दिया गया है।[3]

दान[संपादित करें]

इन गुणों के साथ दान देने का विधान भी यहाँ पर किया गया है, किन्तु गौतम धर्मसूत्र* के अनुसार दान पात्र की योग्यता के अनुसार देना चाहिए। गौतम का सत्यभाषण तथा सत्य आचरण पर बहुत बल है। सभी के लिए यह अनिवार्य है। इसीलिए सत्य भाषण को महान तप कहा गया है। सत्य बोलने से स्वर्ग तथा असत्य भाषण से नरक प्राप्ति की बात भी कही गई है। इन गुणों के साथ मनुष्य को अहिंसक, मृदु, सहिष्णु, क्षमाशील भी होना चाहिए।

इस प्रकार गौतम धर्मसूत्र में व्यक्तिगत तथा सामाजिक जीवन को श्रेष्ठ बनाने का प्रयत्न किया गया है। इसके साथ गौतम यह भी जानते हैं कि व्यक्ति अपनी स्वाभाविक कमज़ोरी के कारण कुपथ में प्रवृत्त हो जाता है। कभी–कभी पूरे समाज में ही अनैतिकता व्याप्त हो जाती है, किन्तु यदि यत्न किया जाए तो ये दुर्बलताएँ देर हो सकती हैं। इसलिए गौतम धर्मसूत्र में दण्ड स्वरूप अनेक प्रकार के प्रायश्चत्तों का विधान किया गया है जिनसे व्यक्ति शुद्ध होकर पुनः श्रेष्ठ जीवन व्यतीत कर सकता है। इस ग्रंथ में कहीं कहीं मांस–भक्षण का उल्लेख भी मिलता है, किन्तु वह प्रक्षिप्त प्रतीत होता है।

चारों वर्ण[संपादित करें]

गौतम धर्मसूत्र में आश्रम–व्यवस्था के साथ वर्ण–व्यवस्था पर भी पर्याप्त प्रकाश डाला गया है। इस प्रसंग में ब्राह्मण को सर्वोपरि स्थान प्रदान किया गया है। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र के रूप में चारों वर्णों के कर्त्तव्य एवं अधिकारों का यहाँ अच्छा विवेचन किया गया है। वर्ण–व्यवस्था के सुचारू संचालनार्थ यहाँ पर सवर्ण विवाह को ही मान्यता प्रदान की गई है। यदि कोई असवर्ण विवाह करता है तो उसकी सन्तान वर्णसंकर कहलाएगी। यहाँ पर यह भी कहा गया है कि निरन्तर सात पीढ़ियों तक चलने वाली वर्णसंकर सन्तान भी अपने अपने कार्यों के आधार पर उत्कृष्ट वर्ण या निष्कृट वर्ण की हो जाती है। प्रायश्चित्त, अपराध, दण्ड, मृत्यु तथा जन्मविषयक अशौच भी वर्णानुसार ही निर्धारित किए गए हैं।

सम्भवतः ब्राह्मण को उसकी विद्वता तथा श्रेष्ठ आचरण के कारण ही बंधनों से मुक्त रखा गया होगा। इसलिए गौतम धर्मसूत्र* में ‘तदपेक्षस्तद्वृत्तिः’ कहा गया है। गौतम धर्मसूत्र में शूद्रों की स्थिति अच्छी नहीं दिखाई देती है। उनके लिए धार्मिक संस्कार विहित नहीं हैं तथा केवल गृहस्थाश्रम ही उनके लिए विहित है। शूद्र का यही धर्म बतलाया गया है कि वह उच्च वर्ण के लोगों की सेवा करे।

नारी को महत्व[संपादित करें]

गौतम धर्मसूत्र में नारी को पर्याप्त महत्व दिया गया है, क्योंकि वह सन्तान की जननी है। उसे श्रेष्ठ आचार्य कहा गया है। यद्यपि गृहसम्बन्धी तथा धार्मिक कार्यों में गृहिणी तथा सहधर्मिणी के रूप में वह प्रतिष्ठित पद पर आसीन है तथापि उसे धर्म के विषय में अस्वतन्त्र कहा है। कन्या का विवाह माता–पिता के अधीन है किन्तु यदि वे समय पर कन्या का विवाह नहीं करते, तो वह स्वयं अनुकूल युवक से विवाह कर सकती है। स्त्री के लिए पातिव्रत्य धर्म अनिवार्य है। अपने पति के अतिरिक्त उसे किसी और के विषय में सोचना भी नहीं चाहिए। अनैतिक यौन सम्बन्धों के लिए कठोरतम दण्ड का विधान किया गया है। गौतम धर्मसूत्र में दासी के रूप में नारी का निम्न स्वरूप ही दृष्टिगोचर होता है। एक सूत्र* में तो यहाँ तक कह दिया गया कि दासी यदि किसी पुरुष के पास बन्धक रखी गई है तो वह उसका उपभोग कर सकता है। इस कथन का औचित्य गौतम धर्मसूत्र के टीकाकार हरदत्त ने यह कहकर बतलाया है कि पास रखी उपभोग्य वस्तु पर कोई व्यक्ति कब तक संयम रख सकता है? हरदत्त का यह कथन नैतिकता की सीमा का उल्लंघन करता है। कारण कुछ भी हो, यह स्थिति समाज की हीन अवस्था की सूचक है।

राज्य–व्यवस्था[संपादित करें]

गौतम धर्मसूत्र में राज्य–व्यवस्था पर भी प्रकाश डाला गया है। गौतम* के अनुसार प्राणिमात्र की रक्षा करना तथा न्यायपूर्वक दण्ड देकर प्रजा को सुपथ में रखना राजा का कर्त्तव्य है। राजा विद्वान तथा सदाचारी ब्राह्मण की सहायता से राजकार्य करता है। धर्मसूत्रों में राजा निरंकुश नहीं है। उसके न्याय की प्रक्रिया भी जन–तान्त्रिक है। राज्य में ब्राह्मण धर्म का विधान करने वाला तथा राजा उसका पालन कराने वाला है।* इस प्रकार गौतम धर्मसूत्र में एक बहुत ही समन्वयपूर्ण लोक–व्यवस्था का प्रतिपादन किया गया है। समाज के विभिन्न वर्गों के प्रायः सभी प्रकार के कर्त्तव्यों का निर्धारण करके समाज को सही दिशा देने का प्रयत्न यहाँ पर किया गया है जिससे समाज उन्नति कर सके तथा लोगों में प्रेम, न्याय, दया, परोपकार आदि गुणों की वृद्धि हो। संक्षेप में कहा जाए तो गौतम ने अपने धर्मसूत्र के माध्यम से सम्पूर्ण समाज को ही नैतिक एवं सामाजिक दृष्टि से नियन्त्रित करने का प्रयत्न किया है।

व्याख्याकार[संपादित करें]

  • हरदत्त – इस धर्मसूत्र पर हरदत्त ने मिताक्षरा नाम की टीका लिखी है जो उपलब्ध है हरदत्त का समय 1100–1300 ई. के मध्य स्वीकार किया जाता है।

भर्त्तृयज्ञ – ये गौतम धर्मसूत्र के प्राचीन व्याख्याकार हैं जिनका उल्लेख कई लोगों ने किया है। इनकी व्याख्या इस समय पर उपलब्ध नहीं है। इनका काल 800 ई. से पूर्व का माना जाता है।

  • असहाय – अद्भुत सागर के लेखक अनिरुद्ध तथा भाष्यकार विश्वरूप ने सूचित किया है कि असहाय ने भी गौ. ध. सू. पर भाष्य लिखा था। मेधातिथि ने विश्वरूप का उल्लेख किया है। अतः इनका काल 750 ई. से उत्तरवर्ती नहीं है।
  • मस्करी – कल्पतरू के मोक्ष काण्ड में मस्करी को गौ. ध. सू. का व्याख्याता कहा गया है। वेंकटनाथ की शतदूषणी (पृ. 64) में भी ऐसा ही कहा गया है। वहाँ इसे ‘सर्वस्मृति निबन्धन’ का नाम दिया गया है।