गोर्खालैंड क्षेत्रीय प्रशासन

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गोर्खालैंड क्षेत्रीय प्रशासन
—  भारत के स्वशासित प्रदेश  —
समय मंडल: आईएसटी (यूटीसी+५:३०)
देश Flag of India.svg भारत
राज्य पश्चिम बंगाल
' 2012
राजधानी दार्जीलिंग
आधिकारिक भाषा(एँ) नेपाली

निर्देशांक: 27°02′N 88°10′E / 27.03°N 88.16°E / 27.03; 88.16 गोर्खालैंड क्षेत्रीय प्रशासन (अंग्रेज़ी: Gorkhaland Territorial Administration) भारत के पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग पहाड़ी क्षेत्र का एक अर्ध-स्वायत्त प्रशासनिक निकाय है। दार्जिलिंग गोर्खा पार्वत्य परिषद जो १९८८ में स्थापित किया गया था जिसका प्रशासन २३ वर्षों तक दार्जिलिंग क्षेत्र में चलता रहा के बदले में गो०क्षे०प्र० को पारित किया गया। गो०क्षे०प्र० के अधिकार में हाल में तीन पहाड़ी प्रमण्डल दार्जिलिंग, कलिम्पोंग और कर्सियांग तथा सिलिगुड़ी डिविजन के कुछ क्षेत्र हैं।

पृष्ठभूमि[संपादित करें]

पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग और दवार्स क्षेत्र में रहने वाले नेपालियों/गोर्खाओं ने अपने लिए एक अलग राज्य गोर्खालैंड बनाने के लिए प्रस्ताव रखा था। सन् १९८० में गोर्खा राष्ट्रीय मुक्ति मोर्चा (Gorkha National Liberation Front) पार्टी के नेता सुभाष घिसिंग ने एक अलग राज्य गोर्खालैंड के लिए एक हिंसात्मक आंदोलन छेड़ा था। इस आंदोलन के फलस्वरुप १९८८ में दार्जिलिंग गोर्खा हिल काउंसिल का गठन हुआ। दा०गो०हि०का० एक नया राज्य बनाने के लिए उसके लक्ष्यों को पुरा न कर सका, जो सुभाष घिसिंग के पतन के साथ खत्म हो गया और २००७ में बिमल गुरुंगग के साथ एक नये पार्टी गोर्खालैंड जनमुक्ति मोर्चा (गो०ज०मु०मो०) का उत्थान हुआ। इन्होने गोर्खालैंड राज्य के निर्माण के लिए एक दूसरा आन्दोलन छेड़ा। गो०ज०मु०मो० ने गोर्खालैंड राज्य के निर्माण के लिए तीन साल तक आन्दोलन किया, आन्दोलन के तीन साल बाद गो०ज०मु०मो० दार्जिलिंग पहाड़ी क्षेत्र पर अर्ध-शासन चलाने के लिए राज्य सरकार के साथ एक समझौते पर पहुँची। २ सितम्बर २०११ को गो०क्षे०प्र० के निर्माण के लिए पश्चिम बंगाल वैधानिक सभा (West Bengal Legislative Assembly) में एक ज्ञापन पत्र पेश किया गया। गो०क्षे०प्र० के पास प्रशासनिक शक्ति, कार्यकारी शक्ति और आर्थिक शक्ति होगी लेकिन वैधानिक शक्ति नही होगी। उच्च न्यायालय के अवकाश प्राप्त न्यायाधीश के उपस्थिति में एक १० सदस्यीय साझा सत्यापन समिती ने दवार्स और तराई को गो०क्षे०प्र० के अधीन लाने के लिए गोर्खा निवासित क्षेत्र कि जाँच की।

समझौता संस्मरण पत्र[संपादित करें]

केन्द्रीय गृह मन्त्री पी० चिदम्बरम, पश्चिम बंगाल की मुख्य मंत्री ममता बनर्जी और गोर्खा जनमुक्ति मोर्चा की नेता के उपस्थिति में, सिलिगुड़ी के नजदीक पिंटैल गाँव में १८ जुलाई २०११ को गो०क्षे०प्र० के समझौता संस्मरण पत्र पर हस्ताक्षर किया गया। पश्चिम बंगाल के केन्द्रीय गृह सचिव जी० डी० गौतम, केन्द्रीय गृह मन्त्री के संयुक्त सचिव के०के० पाठक और गो०ज०मु०मो० के महासचिव रौशन गिरी के द्बारा समझौता पत्र पर हस्ताक्षर किया गया।

गो०आ० क्षे०प्र० (GATA) की माँग[संपादित करें]

२९ अक्टूबर २०११ को गोर्खा जनमुक्ति मोर्चा और अखिल भारतीय आदिवासी विकास परिषद (अ०भा०आ०वि०प०) (ABAVP), डुवर्स इकाई ने मोंगपोंग में एक १८ बिन्दुओं वाली समझौता पत्र पर हस्ताक्षर किया, जिसके बाद गो०क्षे०प्र० के बदले में इन संगठनों ने एक नयी प्रशासनिक संरचना का एक साथ प्रस्ताव रखा, जिसे गोर्खा और आदिवासी क्षेत्रिय प्रशासन नाम दिया गया है। अ०भा०आ०वि०प० डुवर्स के १९६ मौजा और तराई क्षेत्र के १९९ मौजा को गो०आ० क्षे०प्र० में सम्मिलित करने के लिए सहमत हो गया।

राष्ट्रपति कि मंजूरी और उच्च-शक्ति समिती का ज्ञापन पत्र[संपादित करें]

भारत के राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने ७ मार्च २०१२ को पश्चिम बंगाल के प्रस्तावित गो०क्षे०प्र० के बिल पर अपनी मंजूरी दे दी है। पश्चिम बंगाल कि सरकार ने १४ मार्च २०१२ को गो०क्षे०प्र० के लिए एक गैजेट नोटिफिकेशन जारी किया। गो०ज०मु०मो० के नेता और पश्चिम बंगाल कि सरकार के बीच २४ मार्च २०१२ को हुई बैठक में गो०क्षे०प्र० के मतदान कि तैयारी का संकेत मिला। बैठक में यह निश्चय किया गया था कि गो०क्षे०प्र० का मतदान २०१२ के जुन या जुलाई महिने के अन्त में होगा। न्यायाधिश सेन कि समिती ने गो०क्षे०प्र० में तराई और डुअर्स के क्षेत्र को सम्मिलित करने के लिए जुन २०१२ से पहले अपना रिपोर्ट पेश करने के लिए निवेदन किया है। पश्चिम बंगाल कि सरकार ने २६ मई २०१२ को गो०क्षे०प्र० के लिए एक सूचि जारी किया है जिसमें ४५ निर्वाचन क्षेत्र शामिल हैं। जिसका मतदान जुलाई २०१२ में होगा। पश्चिम बंगाल कि सरकार द्वारा गठित अवकाश प्राप्त श्यामल कुमाल सेन कि अध्यक्षता में उच्च शक्ति समिती ने गो०क्षे०प्र०में सिर्फ पाँच मौजा को शामिल करने के लिए सलाह दिया है यद्यपि गोरखा जनमुक्ति मोर्चा ने तराई और डुअर्स के क्षेत्र से ३९८ मौजों को प्रस्तावित गो०क्षे०प्र० में सम्मिलित करने कि माँग कि है। गोरखा जनमुक्ति मोर्चा द्वारा रिपोर्ट को खारिज़ करने के बाद पश्चिम बंगाल सरकार ने न्यायाधिश सेन समिती के सलाह को ध्यान में रखते हुए एक त्रि-सदस्यीय “तथ्य-सत्यापन समिती” का उदघोष किया। गो०क्षे०प्र० के विधि मान्यता को चुनौती देते हुए गोरखा राष्ट्रिय मुक्ति मोर्चा के नेता सुभाष घिसिंग ने कलकत्ता उच्च न्यायालय में १९ जून २०१२ को मुकदमा दायर किया। न्यायाधिश दिपांकर दत्ता ने गो०क्षे०प्र० के समझौता पत्र पर तीन हस्ताक्षर लेने के लिए कहा —केन्द्रीय सरकार, राज्य सरकार और गोरखा जनमुक्ति मोर्चा का — to file affidavits stating their stand on Ghisingh’s contention.