गोर्खालैंड

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज
गोरखालैंड
गोर्खाल्याण्ड
—  प्रस्तावित राज्य  —
देश  भारत
राज्य गोरखालैंड
प्रस्तावित राजधानी दार्जीलिंग
शासन
 • नेता

गोरखालैंड एक प्रस्तावित राज्य का नाम है, जिसे दार्जीलिंग और उस के आस-पास रहने वाले भारतीय गोरखाओं द्वारा बंगालियों से भिन्न भाषा और संस्कृति होने के आधार पर पश्चिम बंगाल से अलग लेकिन भारत के अंतर्गत ही एक अलग राज्य बनाने की मांग है। यह मांग हड़ताल, रैली और आंदोलन के रूप में अब भी समय समय पर उठता रहता है।

गोरखा राष्ट्रीय मुक्ति मोर्चा के नेतृत्व में गोरखालैंड के लिए दो जन आंदोलन (१९८६-१९८८) में हुएं और गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के नेतृत्व में (२००७ से अब तक) आंदोलन हुएं।

क्षेत्र का इतिहास[संपादित करें]

जनसंख्या के हिसाब से गोरखालैंड के बड़े शहर
शहर का नाम जनसंख्या
दार्जीलिंग
132
कालिम्पोंग
49
कुर्सियांग
42
मिरिक
11

सिक्किम अधिराज्य की स्थापना १६४२ ई० में हुआ था, तब दार्जीलिंग सिक्किम अधिराज्य का एक क्षेत्र हुआ करता था। जब ईस्ट इंडिया कम्पनी भारत में अपना पैर पसार रहा था, उसी समय हिमालयी क्षेत्र में भी गोरखा नामक अधिराज्य पड़ोस के छोटे-छोटे राज्यों को एकीकरण कर अपना राज्य विस्तार कर रहा था।

सन १७८० में गोरखाओं ने सिक्किम पर अपना प्रभुत्व जमा लिया और अधिकांश भाग अपने राज्य में मिला लिया जिसमें दार्जीलिंग और सिलीगुड़ी शामिल थें। गोरखाओं ने सिक्किम के पूर्वी छोर टिस्टा नदी तक और इसके तराई भाग को अपने कब्जे में कर लिया था। उसी समय ईस्ट इंडिया कम्पनी उत्तरी क्षेत्र के राज्यों को गोरखाओं से बचाने में लग गए और इस तरह सन १८१४ में गोरखाओं और अंग्रेजों के बीच एंग्लो-गोरखा युद्ध हुआ। इस युद्ध में गोरखाओं कि हार हुई फलस्वरूप १८१५ में वे एक संधि जिसे सुगौली संधि कहते हैं पर हस्ताक्षर करने के लिए मजबूर हो गए। सुगौली संधि के अनुसार गोरखाओं को वह सारा क्षेत्र ईस्ट इंडिया कम्पनी को सौंपना पड़ा जिसे गोरखाओं ने सिक्किम के राजा चोग्याल से जीता था। गोरखाओं को मेची से टिस्टा नदी के बीच के सारे भू-भाग ईस्ट इंडिया कंपनी को सौंपना पड़ा।

बाद में १८१७ में तितालिया संधि के द्वारा ईस्ट इंडिया कंपनी ने गोरखाओं से लिये सारे भू-भाग सिक्किम के राजा चोग्याल को वापस सौंप दिए और उनके राज्य के स्वाधीनता की गारंटी दी।

बात यहीं खत्म नही हुई। १८३५ में सिक्किम के द्वारा १३८ स्क्वायर मील (३६० किमी²) भूमि जिसमें दार्जीलिंग और कुछ क्षेत्र शामिल थे को ईस्ट इंडिया कंपनी को अनुदान में सौंप दिया गया। इस तरह दार्जीलिंग १८३५ में बंगाल प्रेसीडेंसी का हिस्सा हो गया।

नवम्बर १८६४ में भूटान और ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच सिंचुला संधि हुई जिसमें बंगाल डुआर्स जो असल में कूच बिहार राज्य के हिस्से थें जिसे युद्ध मे भूटान ने कूच बिहार से जीत लिया था के साथ-साथ भूटान के कुछ पहाड़ी क्षेत्र और कालिम्पोंग को सिंचुला संधि के अंतर्गत ईस्ट इंडिया कंपनी को देने पड़ें।

१८६१ से पहले और १८७०-१८७४ तक दार्जीलिंग जिला एक अविनियमित क्षेत्र (Non-Regulated Area) था अर्थात यहां अंग्रेजों के नियम और कानून देश के दूसरे हिस्से की तरह स्वतः लागू नही होते थें, जबतक की विशेष रूप से लागू नहीं किया जाता था। १८६२ से १८७० के बीच इसे विनियमित क्षेत्र (Regulated Area) समझा जाता रहा। १८७४ में इसे अविनियमित क्षेत्र से हटाकर इसे अनुसूचित जिला (Schedule district) का दर्जा दे दिया गया और १९१९ में इसे पिछड़ा क्षेत्र (Backward tracts) कर दिया गया। १९३५ से लेकर भारत के आजादी तक यह क्षेत्र आंशिक रूप से बाहरी क्षेत्र (Partially Excluded area) कहलाया।

भारत के आजादी के बाद १९५४ में एक कानून पास किया गया "द अब्जॉर्बड एरियाज (कानून) एक्ट १९५४" जिसके तहत दार्जीलिंग और इस के साथ के क्षेत्र को पश्चिम बंगाल में मिला दिया गया।

अलग प्रशासनिक इकाई की मांग[संपादित करें]

दार्जीलिंग में अलग प्रशासनिक इकाई की मांग १९०७ से चली आ रही है, जब हिलमेन्स असोसिएशन ऑफ दार्जीलिंग ने मिंटो-मोर्ली रिफॉर्म्स को एक अलग प्रशासनिक क्षेत्र बनाने के लिए ज्ञापन सौंपी।

१९१७ में हिलमेन्स असोसिएशन ने चीफ सेक्रेटरी, बंगाल सरकार, सेक्रेटरी ऑफ स्टेट ऑफ इंडिया और वाइसरॉय को एक अलग प्रशासनिक इकाई बनाने के लिए ज्ञापन सौंपा जिसमें दार्जीलिंग जिला और जलपाईगुड़ी जिले को शामिल करने के लिए कहा गया था।

१९२९ में हिलमेन्स असोसिएशन ने फिर से उसी मांग को सायमन कमिसन के समक्ष उठाया।

१९३० में हिलमेन्स असोसिएशन, गोर्खा ऑफिसर्स असोसिएशन और कुर्सियांग गोर्खा लाइब्रेरी के द्वारा एक जॉइंट पेटिशन भारत राज्य के सेक्रेटरी सैमुएल होर के समक्ष एक ज्ञापन सौंपा गया था जिसमें कहा गया था इन क्षेत्रों को बंगाल प्रेसिडेंसी से अलग किया जाय।

१९४१ में रूप नारायण सिन्हा के नेतृत्व में हिलमेन्स असोसिएशन ने सेक्रेटरी ऑफ स्टेट ऑफ इंडिया, लॉर्ड पथिक लॉरेन्स को एक ज्ञापन सौंपा जिसमें कहा गया था दार्जीलिंग और साथ के क्षेत्रों को बंगाल प्रेसिडेंसी से निकाल कर एक अलग चीफ कमिश्नर्स प्रोविन्स बनाया जाय।

१९४७ में अनडिवाइडेड कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (सीपीआई) ने एक ज्ञापन कांस्टिट्यूट असेम्बली जिसमें से एक प्रति जवाहर लाल नेहरू, दी वाईस प्रेसिडेंट ऑफ द अंतरिम गवर्नमेंट और लियाक़त अली खान, फाइनेंस मिनिस्टर ऑफ अंतरिम गवर्नमेंट को सौंपा जिसमें सिक्किम और दार्जीलिंग को मिलाकर एक अलग राज्य गोरखास्थान निर्माण की बात कही गई थी।

स्वतन्त्र भारत में अखिल भारतीय गोरखा लिग वह पहली राजनीतिक पार्टी थी जिसने पश्चिम बंगाल से अलग एक नये राज्य के गठन के लिए पंडित जवाहर लाल नेहरू को एनबी गुरुंग के नेतृत्व में कालिम्पोंग में एक ज्ञापन सौंपा था।

१९८० में इंद्र बहादुर राई (दार्जीलिंग के प्रांत परिषद) के द्वारा तब के प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को लिखकर एक अलग राज्य की गठन की बात कही।

१९८६ में गोर्खा नेशनल लिब्रेशन फ्रंट के द्वारा एक हिंसक आंदोलन की शुरुआत हुई जिसका नेतृत्व सुभाष घीसिंग के हाथ में था। इस आंदोलन के फलस्वरूप १९८८ में एक अर्ध स्वायत्त इकाई का गठन हुआ जिसका नाम था "दार्जीलिंग गोर्खा हिल काउंसिल"।

२००७ में फिर से एक नई पार्टी गोर्खा जन मुक्ति मोर्चा के द्वारा एक अलग राज्य की मांग उठाई गई। २०११ में गोर्खा जन मुक्ति मोर्चा ने एक त्रिपक्षीय समझौते पर हस्ताक्षर किया जिसमें गोर्खा जन मुक्ति मोर्चा, बंगाल सरकार और केंद्र सरकार शामिल थी। इस समझौते ने पुराने दार्जीलिंग गोर्खा हिल काउंसिल को नए अर्ध स्वायत्त इकाई गोर्खा टेरिटोरियल एडमिनिस्ट्रेशन में परिवर्तित कर दिया।

गोर्खा जन मुक्ति मोर्चा के नेतृत्व में २०१७ में भी ८ जून से फिर से गोरखालैंड की मांग की आवाज़ उठ खड़ी हुई है, जब पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली सरकार ने बंगाली भाषा को अनिवार्य भाषा के रूप में पश्चिम बंगाल के हर क्षेत्र में लागू करने का फैसला किया। दार्जीलिंग और उस के आस पास रहने वाले गोरखाओं को लगा कि पश्चिम बंगाल की सरकार उन पर बंगाली भाषा जबरन थोपने की कोशिश कर रही है। इसी कारण से उन्होंने इस का विरोध शुरू कर दिया और फिर अलग राज्य की मांग में रैलियाँ और नारे लगाने लगे। परिणाम स्वरूप पश्चिम बंगाल पुलिस और गोर्खा जन मुक्ति मोर्च के बीच झड़प हो गई और आंदोलन हिंसक रूप ले लिया। इस आंदोलन में कुछ लोग मारे भी गये हैं।

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]