कैबिनेट (सरकार)

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किसी सरकार के उच्चस्तरीय नेताओं के समूह को कैबिनेट (cabinet) कहते हैं। प्रायः उन्हें 'मंत्री' (मिनिस्टर) कहा जाता है किन्तु कहीं-कहीं उन्हें 'सेक्रेटरी' भी कहा जाता है। कैबिनेट, इंग्लैंड की शासन व्यवस्था से विकसित शासन-व्यवस्था का प्रमुख एवं महत्वपूर्ण अंग है। इसका प्रचलन प्राय: उनसभी देशों में है जो ब्रिटिश कामनवेल्थ के सदस्य हैं। कुछ अन्य देशों में भी यह व्यवस्था प्रचलित है। भारत के केंद्रीय एवं प्रादेशिक शासन का भी यह अंग है।

सामान्य रूप में संसद की लोकसभा (अथवा प्रादेशिक शासन में विधानसभा) में जिस दल का बहुमत हो या जो बहुमत प्राप्त कर सकता हो, उस दल या दलों के समूह के सदस्यों में से चुने हुए राजनीतिज्ञों का यह एक निकाय है। इसको सदन नहीं चुनता, बल्कि वे प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री द्वारा मनोनीत होते हैं। लोकसभा (अथवा विधानसभा) के द्वारा जनमत सरकार पर नियंत्रण रखता है और अपने बहुमत द्वारा लोकसभा (अथवा विधानसभा) सरकार पर नियंत्रण रखती है। किन्तु सरकार, कैबिनेट से बड़ा शासन निकाय है। सरकार में मंत्री, पार्लामेंटरी सचिव आदि वे सब सम्मिलित हैं जिनकी कार्यावधि राजनीतिक है। कैबिनेट अपेक्षाकृत महत्वपूर्ण मंत्रियों का अधिक छोटा समुदाय है जो देश (अथवा प्रदेश) के शासन के संबंध में सारे महत्वपूर्ण मामलों में नीति का निर्धारण और निर्णय करता है। इसका आकार सरकार के विविध विभागों के कार्यभार के अनुसार घटता बढ़ता और देश-देश में बदलता रहता है।

कैबिनेट के सभी सदस्य संसद् (व्यवस्थापिका सभा) के सदस्य होते हैं या नियुक्ति के थोड़े समय के बाद ही उन्हें सदस्य निर्वाचित हो जाना अनिवार्य होता है। भारत में कभी-कभी विधान परिषद् में सरकार द्वारा मनोनीत सदस्यों को भी मंत्रीमंडल में ले लिया जाता है पर यह अपवाद स्वरूप ही। सरकार तब तक ही पदस्थ रह सकती है जबतक लोकसभा (अथवा विधानसभा) में उसे बहुमत का बल प्राप्त हो। यदि किसी महत्वपूर्ण समस्या पर उसकी पराजय हो जाए या वह व्यवस्थापिका सभा का विश्वास खो दे तो उसके लिये पदत्याग करना आवश्यक है। दलों के सुसंगठित होने ओर कठोर अनुशासन का पालन करने के कारण कैबिनेट का उत्तरदायित्व घट गया है। शासित होने के स्थान पर कैबिनेट बहुमत के द्वारा व्यवस्थापिका सभा पर शासन करती है; तथापि जनता के मन को अभिव्यक्त करने के मंच के नाते, लोकसभा (विधानसभा) का महत्व बना हुआ है। किन्तु देखा जाता है कि जनमत का कैबिनेट पर अधिक सीधा नियंत्रण है। कैबिनेट को व्यवस्थापिका सभा के प्रति अपील का अधिकार है- दूसरे शब्दों में सभा को भंग करने का अधिकार है। किन्तु, इस अधिकार का उपयोग किसी विशेष अवसर पर जनमत की अनुकूल लहर का लाभ उठाने के लिये अथवा निश्चित समय से पहले ही आम चुनाव कराने के लिये होता है।

कैबिनेट प्रणाली में महत्वपूर्ण स्थिति प्रधानमंत्री (प्रदेशों में मुख्यमंत्री) की है। लास्की के शब्दों में वे बड़े अधिकारियों से उच्चतर किंतु निरंकुश शासक से कम है। सरकार के गठन का वह केंद्र है, उसके जीवन का केंद्र है, वह जो कुछ है उसके अनुरूप ही कैबिनेट को अपना रूप निर्धारित करना पड़ता है और वह उसके निर्देश में कार्य करती है।

सर्वत्र प्रधानमंत्री (मुख्य मंत्री) वैधानिक प्रधान द्वारा मनोनीत होता है, वह चाहे राजा हो या राष्ट्रपति, गवर्नर जनरल हो या गवर्नर। व्यावहारिक रूप में यह मनोनयन राजनीतिक परिस्थितियों द्वारा है। मनोनीत व्यक्ति को अपने सहयोगियों को प्राप्त करने या लोकसभा को मान्य सरकार बनाने में समर्थ होना आवश्यक है। सामान्यत: बहुमतवाले दल के माने हुए नेता को सरकार बनाने के लिये निमंत्रित किया जाता है। उसमें वैधानिक प्रधान की रूचि-अरूचि का प्रश्न नहीं होता। किंतु विशेष परिस्थितियों में वैधानिक प्रधान सीमित निर्णय का ही प्रयोग कर सकता है। यह तब होता है जब प्रधानमंत्री (मुख्यमंत्री) अवकाश ग्रहण करता है या त्यागपत्र देता हे अथवा जब लोकसभा (विधानसभा) में कोई एक दल बहुमत में नहीं होता या राष्ट्रीय संकट के अवसर पर, जब एक दल की अपेक्षा सामान्त: मिली जुली सरकार अच्छी मानी जाती है। किंतु ऐसी अवस्थाओं में भी वैधानिक प्रधान का निर्णय नियंत्रित ही होता है। मनोनीत व्यक्ति के लिये ऐसी स्थिति में होना आवश्यक है कि वह ऐसी सरकार बना सके जो व्यवस्थापिका का समर्थन प्राप्त कर सके।

कैबिनेट के सदस्यों से सर्वत्र अपेक्षा की जाती है कि वे संयुक्त रूप में काम करें। वह व्यवस्थापिका के, देश के और वैधानिक प्रधान के सामने अपने को एक संयुक्त रूप में प्रस्तुत करे। अत: पारस्परिक मतभेद कैबिनेट की बैठकों में गुप्त रूप से ठीक कर लिए जाते हैं। समस्त सदस्यों से अपेक्षा की जाती है कि वे कैबिनेट के सभी निर्णयों का अनुमोदन, यदि आवश्यक हो तो, भाषण और मतदान द्वारा करें। कैबिनेट का उत्तरदायित्व सामूहिक माना जाता है, यदि कोई मंत्री यदि अपने सहयोगियों के मत की अवहेलना कर स्वतंत्र रूप से कार्य करता है तो वह हटा दिया जाता है और त्यागपत्र देने पर विवश किया जाता है। कैबिनेट की एकता का प्रतीक और वैधानिक प्रधान से संपर्क रखने में मुख्य सूत्र प्रधान मंत्री (मुख्य मंत्री) को किसी सहयोगी से त्यागपत्र माँगने ओर कैबिनेट की एकता अक्षुण्ण बनाए रखने का अधिकार है।

कैबिनेट प्रणाली वहाँ अधिक सफलतापूर्वक काम करती है जहाँ दो सुसंगठित दल हों- एक सत्तारूढ़ हो ओर दूसरा विरोध में हो और यह अनुभव करे कि यदि सरकार का पतन हुआ तो सरकार चलाने का उत्तरदायित्व उसपर आ सकता है। अत: वह पूरे उत्तरदायित्व के साथ शासन की कमजोरियों का उद्घाटन करता रहे। विरोधी पक्ष आलोचना के लिये आलोचना में नहीं पड़ता, प्रत्युत शासन का सुधार करने के विचार से ओर जनमत को अपने पक्ष में करने के लिये ताकि निर्वाचकों से दूसरे अवसर पर अपील करने में सफलता प्राप्त करे। विरोधी पक्ष के इस स्वरूप को संयुक्त राजशाही में मान्यता प्राप्त है और वह शासन तंत्र का उतना ही महत्वपूर्ण अंग है जितना बहुमतप्राप्त दल। परिणामत: वह 'हर मैजेस्टी' के विरोधी दल के नाम से पुकारा जाता है और उसके नेता को मान्यताप्राप्त जनसेवा का उत्तरदायित्वपूर्ण ढंग से निर्वाह करने के लिये सरकारी खजाने से नियमित वेतन मिलता है। इस परंपरा को भारत में भी अपनाया गया है ओर विरोध पक्ष के नेता को मंत्री के समान वेतन प्राप्त होता है।

कैबिनेट सरकार वहाँ स्थायी नहीं हो पाती जहाँ दलों का बाहुल्य हो अथवा जहाँ ऐसे समूह हों जिन्हें 'स्प्लिंटर ग्रूप्स' कहा जाता है।

इतिहास[संपादित करें]

कैबिनेट शासनपद्धति का विकास यद्यपि इंग्लैंड में हुआ किंतु उसका सृजन वहाँ के किसी कानून द्वारा नहीं हुआ। १९३७ ई. तक तो पार्लमेंट के किसी भी ऐक्ट में इसका उल्लेख नहीं है। १९३७ में जो 'मिनिस्टर्स ऑव द क्राउन ऐक्ट' बना उसमें केवल इस बात की व्याख्या है कि कैबिनेट में कौन मंत्री रहेंगे। संयुक्त राजशाही में आज भी कैबिनेट का काम पूर्णत: परंपराओं पर चलता है। अन्य कामनवेल्थ देशों में तथा अन्यत्र यह मौलिक विधान का अंग बन गई है।

इंग्लैंड में कैबिनेट शासन प्रणाली विकासक्रम का एक लंबा इतिहास है। वह निरंतर विकसित ओर बदलती अवस्थाओं के अनुसार अपने को उसके अनुकूल बनाती रही। परिणामस्वरूप यह प्रणाली जिन देशों में प्रचलित है उनमें सबकी कार्यपद्धति एक सी नहीं है।

कैबिनेट प्रणाली को समझने के लिये हमें १६६० ई. के रेस्टोरेशन पर विचार करना होगा जिसके अनुसार प्रभुत्व का रूप तो राजा का रहा किन्तु वास्तविक शासन सत्ता पार्लमेंट को हस्तांतरित कर दी गई। चार्ल्स द्वितीय ने पचास सदस्यों की प्रिवी कौंसिल को महत्वपूर्ण मामलों में गोपनीयता के साथ फुर्ती से काम निपटाने में अक्षम देखकर मंत्रियों के उस छोटे से समूह पर निर्भर रहना आरंभ किया जो उसके विश्वासभाजन थे और पार्लमेंट में अपने पक्ष को प्रबल करने का जोड़तोड़ तक सकते थे। ये लोग राजा से एक छोटे बंद चैंबर या कैबिनेट में मिला करते। किंतु १७वीं शताब्दी में कैबिनेट पार्लमेंट द्वारा संदेह की दृष्टि से देखा जाता रहा।

विलियम तृतीय ने अपने शासनकाल के अंतिम दिनों में अर्ल ऑव संडरलैंड की सलाह मानकर १६९२ में केवल एक दल से अपने मंत्री चुने। १६६५ के चुनाव के बाद, जिसमें ह्विग दल का हाउस ऑफ कामन्स में बहुमत था, उसने दोनों दलों से मंत्री नियुक्त करने के बजाय पार्लमेंट के ह्विग सदस्यों में से ही संसृष्ट आधार पर मंत्रिमंडल का गठन किया। इस मंत्रिमंडल को लोगों ने 'जंदा' नाम से पुकारा क्योंकि यह गुप्त रूप से और एक समूह की भाँति काम करता था। पार्लमेंट ने इसके प्रति बहुत असंतोष व्यक्त किया- उन्हें दंड नहीं दिया जा सकता क्योंकि उनके कामों का पता नहीं चलता।

फलत: १७१० ई. तक एकदलीय मंत्रीमंडल वाली बात पूर्णरूप से कार्यान्वित न हो सकी। महारानी ऐन के शासन के अंतिम वर्षों में ही कैबिनेट प्रणाली की दिशा में कुछ प्रगति हुई। मंत्री लोग परामर्श के लिये और सारे सरकारी कामों में निर्णय लेने के लिये जब भी आवश्यकता होती, ह्वाइट हॉल में सीनियर सेक्रेटरी ऑव स्टेट के दफ्तर में मिला करते और सामान्यत: सप्ताह में एक बार रानी के कैबिनेट में उपस्थित होते ओर राजकाज तथा अपने निर्णय से उसे अवगत कराते। प्रिवी कौंसिलों के अधिवेशनों में केवल औपचारिक कामकाज होते। तथापि बाद में होने वाली जाँच पड़ताल की संभावनाओं को ध्यान में रखते हुए, मंत्रियों ने यह बुद्धिमत्तापूर्ण सावधानी बरत रखी थी कि विवादास्पद बातों को प्रिवी कौसिल के सामने प्रस्तुत करते ओर उसपर उसका औपचारिक निर्णय प्राप्त करते।

१७१४ ई. में जार्ज प्रथम के राज्यारोहण होने ओर ह्विग दल के सत्तारूढ़ होने पर उसके ४६ वर्ष तक निरंतर अधिकार प्राप्त किए रहने के फलस्वरूप राजा के हस्तक्षेप के बिना मंत्रियों द्वारा शासनव्यापार चलाते रहने की प्रथा दृढ़ हो गई। राजा ने कैबिनेट के अधिवेशनों में जब अनुपस्थित रहना आरंभ कर दिया तब कैबिनेट का सारा दायित्व प्रधानमंत्री पर आ पड़ा और तब कैबिनेटरूपी संस्था का वास्तविक जन्म हुआ। १७२१-४२ में राबर्ट वालपोल ने सत्तारूढ़ होने पर अपना सम्माननीय पद स्थापित करने और शासन की सामान्य नीति निर्धारित करने का सफल प्रयास किया। उन्होंने अपने सहयोगियों से सहयोग प्राप्त कर राजा ओर पार्लमेंट के सामने संयुक्त मोर्चा बनाया ओर अपनी नीति का समर्थन न करने वाले टाउनसेंड और चेस्टरटन जैसे सहयोगियों को पदत्याग करने पर विवश किया। उन्होंने इस बात का आग्रह किया कि मंत्रियों का चुनाव उनपर छोड़ दिया जाए। उन्होंने पार्लमेंट का अवलंब लेकर शासन किया, किंतु तबतक दलों के संगठन और अनुशासन का विकास नहीं हुआ था, उन्हें अपने बल और संरक्षण का उपयोग करना पड़ा ओर पार्लमेंट पर अधिकार रखने के लिये घूसखोरी ओर भ्रष्टाचार की शरण लेनी पड़ी। किंतु जब १७४२ में उन्होंने पार्लामेंट का अवलंब नहीं मिल पाया तो उन्होंने पद त्याग कर दिया ओर हाउस ऑफ कामंस में राजित होने पर मंत्रिमंडल द्वारा पदत्याग करने की परंपरा की स्थापना की और पिट (कनिष्ठ) ने हाउस ऑव कामंस के विरूद्ध प्रधानमंत्री द्वारा निर्वाचकों से अपील कर सकने की परंपरा स्थापित की। किंतु महारानी विक्टोरिया के राज्य की लंबी अवधि (१८३७-१९०१) में जब संवैधानिक शासन स्थापित हुआ तब आधुनिक कैबिनेट प्रणाली के शासन ने क्रमश: अपना रूप स्थिर किया।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]