कृष्णराज वोडेयार चतुर्थ

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कृष्णराज वोडेयार चतुर्थ
मैसूर के महाराजा
Maharaja Sir Sri Krishnaraja Wodiyar 1906 by 1906 K Keshavayya.jpg
शासन 1902 - 1940
जन्म 4, जून 1884
जन्म स्थान मैसूर
मृत्यु 3,अगस्त 1940
मृत्यु स्थान बंगलौर
पूर्वाधिकारी चमराजेन्द्र वोडेयार
उत्तराधिकारी जयचमराजा वोडेयार बहादुर
जीवन संगी लक्ष्मीविलास सन्निधन श्री प्रताप कुमारी अम्मानी अवरू
राज घराना वोडेयार
पिता चमारराज वोडेयार
माता महारानी केम्पा नेनजामानी वाणी विलास सन्निधना

कृष्ण राज वाडियार चतुर्थ (4 जून 1884 - 3 अगस्त 1940 कन्नड़: ನಾಲ್ವಡಿ ಕೃಷ್ಣರಾಜ ಒಡೆಯರು बेंगलोर पैलेस), नलवडी कृष्ण राज वाडियार कन्नड़: ನಾಲ್ವಡಿ ಕೃಷ್ಣರಾಜ ಒಡೆಯರು के नाम से भी लोकप्रिय थे, वे 1902 से लेकर 1940 में अपनी मृत्यु तक राजसी शहर मैसूर के सत्तारूढ़ महाराजा थे। जब भारत ब्रिटिश शासन के अधीन था तब भी वे भारतीय राज्यों के यशस्वी शासकों में गिने जाते थे। अपनी मौत के समय, वे विश्व के सर्वाधिक धनी लोगों में गिने जाते थे, जिनके पास 1940 में $400 अरब डॉलर की व्यक्तिगत संपत्ति थी जो 2010 की कीमतों के अनुसार $56 बिलियन डॉलर के बराबर होगी[1].

वे एक दार्शनिक सम्राट थे, जिन्हें पॉल ब्रन्टॉन ने प्लेटो के रिपब्लिक में वर्णित आदर्श को अपने जीवन में उतारने वाले व्यक्ति के रूप में देखा गया था। अंग्रेजी राजनीतिज्ञ लॉर्ड सैम्यूल ने उनकी तुलना सम्राट अशोक से की है। महात्मा गांधी उन्हें राजर्षि या "संत जैसा राजा" कहते थे और उनके अनुयायी उनके राज्य को राम राज्य के रूप में वर्णित करते थे, जो भगवान राम द्वारा शासित साम्राज्य के समान था।

कृष्णा चतुर्थ मैसूर के वाडियार राजवंश के 24वें शासक थे जिसने मैसूर राज्य पर 1399 से 1950 तक शासन किया।

प्रारंभिक वर्ष[संपादित करें]

कृष्णराज वाडियर IV का अपने ग्यारहवें जन्मदिन से कुछ महीनों के पहले 2 फ़रवरी 1895 पर लिया गया एक तस्वीर.

कृष्णा का जन्म 4 जून 1884 को मैसूर के शाही महलमें हुआ था। वे महाराजा चमराजेन्द्र वोडेयार और महारानी वाणी विलास सन्निधना के ज्येष्ठ पुत्र थे। 1894 में कलकत्ता में उनके पिता की मौत के बाद, कृष्णा के बालिग होने तक उनकी माता ने कार्यवाही शासक के रूप में राज्य पर शासन किया।

महाराजा ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा और प्रशिक्षण लोकरंजन महल में पी. राघवेंद्र राव के निर्देशन में प्राप्त की। पश्चिमी शिक्षा के अतिरिक्त कृष्णा को संस्कृत और कन्नड़ भाषा, घुड़सवारी तथा भारतीय और पश्चिमी शास्त्रीय संगीत की भी शिक्षा दी गई। उन्हें प्रशासनिक सेवा का प्रारंभिक प्रशिक्षण बंबई सिविल सर्विस के सर स्टुअर्ट फ्रेजर ने प्रदान किया था। न्यायशास्त्र के सिद्धांतों और राजस्व प्रशासन के तरीकों का अध्ययन उन्होंने राज्य के व्यापक दौरे के दौरान किया, जिसमें उन्होंने उस देश की प्रकृति का विस्तृत ज्ञान प्राप्त किया जिसपर उन्हें बाद में शासन करना था।

विवाह[संपादित करें]

6 जून 1900 को उनका विवाह राणा श्री बाने सिंहजी साहिब की कनिष्ठ पुत्री महामही (हर हाइनेस) महारानी लक्ष्मीविलास सन्निधन श्री प्रताप कुमारी अम्मानि अवारु (जन्म 1889) के साथ सम्पन्न हुआ, राणा साहब काठियावाड़ क्षेत्र के वाना के शासक थे जो वर्तमान समय में गुजरात राज्य में पड़ता है।

राम राज्य[संपादित करें]

महाराजा नलवाडी कृष्णराज वाडियर

1876-77 के अकाल और महाराजा चामराजा वोडेयार IX, की मृत्यु के पश्चात् कृष्णराज वोडेयार IV जो तब तक मात्र ग्यारह साल के बालक थे 1895 में सिंहासन पर आरुढ़ हुए. 8 फ़रवरी 1902 को कृष्णराजा वाडेयार के सत्ता संभालने तक उनकी माता महारानी केमपराजाम्मान्नियावारु ने उनके प्रतिनिधि के रूप में शासन किया।[2] 8 अगस्त 1902 को जगन मोहन महल (अब जयचामाराजेंद्र आर्ट गैलरी) में आयोजित एक समारोह में वायसराय लॉर्ड कर्जन द्वारा कृष्णा चतुर्थ को मैसूर के महाराजा के रूप में सम्पूर्ण शासनाधिकार सौंपे गए।

अपने शासन के अंतर्गत, कृष्णराज वोडेयर ने मैसूर को उस समय के एक सबसे प्रगतिशील और आधुनिक राज्य में बदलने का कार्य आरंभ कर दिया. उनके समय में मैसूर ने उद्योग, शिक्षा, कृषि और कला आदि कई दिशाओं में उन्नति की। इस अवधि में शिक्षा के बुनियादी ढांचे में किए गए अग्रणी काम ने 20 वीं सदी में भारत के प्रमुख प्रौद्योगिकी केंद्र के रूप में इसकी स्थिति मजबूत बनाने में कर्नाटक की बहुत मदद की है।[3] राजा एक निपुण संगीतकार थे और अपने पूर्ववर्तियों की तरह ललित कलाओं के विकास को काफी प्रोत्साहित किया।[4] इन सभी कारणों के लिए, उनके शासन को अक्सर 'मैसूर के स्वर्णयुग' के रूप में वर्णित किया गया है।[5] कृष्णा राजा वाडियार बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय और मैसूर विश्वविद्यालय के पहले कुलपति थे। जिनमें से पहला किसी भारतीय राज्य द्वारा चार्टर्ड पहला विश्वविद्यालय था। बेंगलोर का भारतीय विज्ञान संस्थान जिसकी पहल कार्यकारी शासक के रूप में उनकी माता के कार्यकाल में की गई थी, 1911 में 371 एकड़ (1.5 वर्गकिमी.) भूमि और निधियों के उपहार के साथ उनके शासनकाल में आरंभ हुआ। वे भारतीय (कर्नाटक और हिंदुस्तानी दोनों) और पश्चिमी शास्त्रीय संगीत के संरक्षक थे।

मैसूर ऐसा पहला भारतीय राज्य था, जिसके पास 1881 में एक प्रतिनिधि सभा, एक लोकतांत्रिक मंच था। कृष्णराज वाडियार चतुर्थ के शासनकाल के दौरान, विधानसभा का विस्तार किया गया और 1907 में परिषद विधान के गठन के बाद द्विसदनीय बन गई। यह प्रवरों का एक सदन था जिसने राज्य में कई नए कानून बनाए. उनके शासनकाल के दौरान मैसूर एशिया में पनबिजली पैदा करनेवाला पहला भारतीय राज्य और मैसूर सड़कों पर रोशनी वाला पहला एशियाई शहर बन गया, जिन्हें 5 अगस्त 1905 को पहली बार जलाया गया था।

महाराजा के रूप में अपने 39 वर्ष के शासनकाल के दौरान, निम्नलिखित व्यक्ति कृष्णा चतुर्थ के प्रधानमंत्री रहे (जिन्हें दीवान कहा जाता था):

1. पी.एन. कृष्णमूर्ति (1901-1906)

2. वीपी राव माधव (1906-1909)

3. टी. आनंद राव (1909-1912)

4. सर एम. विश्वेश्वराय (1912-1919)

5. सर एम. कान्था राजे उर्स (1919-1922)

6. सर एल्बियन बनर्जी (1922-1926)

7. सर मिर्ज़ा इस्माइल (1926-1941)

अपने शासनकाल के दौरान उन्होंने गरीबी उन्मूलन और ग्रामीण पुनर्निर्माण, सार्वजनिक स्वास्थ्य, उद्योग और आर्थिक पुनरूत्थान, शिक्षा और ललित कला में सुधार लाने की दिशा में काम किया। उनके शासनकाल में मैसूर ने इस तरह प्रगति की जिससे गांधीजी इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने कहा कि महाराजा एक राजर्षि (एक संत जैसे राजा) थे।[6] ब्रिटिश दार्शनिक और प्राच्य विद्या विशारदपॉल ब्रन्टॉन, अमेरिकी लेखक जॉन गुंटर और ब्रिटिश राजनीतिज्ञ लॉर्ड सैम्यूल राजा की अत्यधिक प्रशंसा करनेवालों में थे। गोल मेज सम्मेलन के दौरान लार्ड सैंकी ने कहा, "मैसूर दुनिया का सर्वश्रेष्ठ रूप से प्रशासित राज्य" था। भारत के अन्य क्षेत्रों से राजकुमारों को प्रशासनिक प्रशिक्षण के लिए मैसूर भेजा जाता था। पंडित मदन मोहन मालवीय ने राजा का वर्णन "धार्मिक" के तौर पर किया है और लार्ड वेलिंगटन ने मैसूर के औद्योगिक विकास को "अविश्वसनीय" कहकर मानो इस भावना को प्रतिध्वनित किया है।'

कर्नाटक संगीत और ललित कला के संरक्षक[संपादित करें]

पूर्व उल्लेख के अनुसार राजा कर्नाटक और हिंदुस्तानी संगीत दोनों के पारखी थे और कुछ लोगों द्वारा उनके शासनकाल को "कर्नाटक के शास्त्रीय संगीत के स्वर्णयुग" के रूप में वर्णित किया है।

संस्कृत भाषा और साहित्य की शिक्षा को इतना प्रोत्साहन पहले कभी नहीं मिला था। श्री तिरुमलाई कृष्णामाचार्य के माध्यम से योग और चित्रकला को (विशेष रूप से उनके द्वारा संरक्षित, राजा रवि वर्मा द्वारा) समृद्ध किया गया था। वे आठ वाद्यों -बांसुरी, वायलिन, सैक्सोफोन, पियानो, मृदंगम, नादस्वर, सितार, और वीणा के दक्ष वादक थे।[तथ्य वांछित] वास्तव में वे सैक्सोफोन वादक के रूप में कर्नाटक संगीत बजानेवाले श्री लक्ष्मीनरसिम्हैया राजमहल संगीत दल (बैंड) का हिस्सा थे। कादरी गोपालनाथ उनसे प्रभावित होकर सैक्सोफोन में प्रवीण बने थे। नट्टन खान और उस्ताद विलायत हुसैन खान सहित आगरा घराने के कई विख्यात सदस्य मैसूर के महाराज के मेहमान बने थे। प्रसिद्ध अब्दुल करीम खान और गौहर जान भी उनके मेहमान रहे थे। भारत के एक महानतम सितार वादक बरकतुल्लाह खान 1919 से 1930 में अपनी मृत्यु तक महल के संगीतकार रहे. उनके दरबार में प्रसिद्धि प्राप्त करनेवाले कुछ महान संगीतकारों में वीणा शमन्ना, वीणा शेषान्ना, मैसूर कारीगिरी राव, वीणा शुभन्ना, बिदाराम कृष्णप्पा, मैसूर वासुदेवाचार्य, वीणा सुब्रमण्यम अय्यर, डॉ॰ मुथैया भगवतार, वीणा शिवरमैया, वीणा वेंकटागिरिप्पा, बेलकावाडी श्रीनिवास आयंगर, चिक्का रामा राव, मैसूर टी. चौवदियाह, बी. देवेंद्रप्पा, गोट्टुवाडयम नारायणा आयंगर और तिरुवय्यर सुब्रमाया अय्यर तथा अन्य शामिल हैं।

एनकोमिया[संपादित करें]

  1. दार्शनिक, रहस्यवादी और पर्यटक पॉल ब्रन्टन (1898-1981) ने मैसूर में महाराजा की देखरेख में अनेक वर्ष बिताये औरद क्वेस्ट ऑफ आवरसेल्फ के समर्पण में उनके प्रति अपना आभार व्यक्त किया: "आपने एक दर्शनशास्त्र को उन लोगों से बचाया जो इसे निराशा से बचने का एक आश्रय मात्र बना देते और इसे सेवा के एक उच्च गतिशील प्रेरणा में परिवर्तित किया। अगर दुनिया के शासक महाराज का अनुकरण करें और अपने समय का एक अंश शुद्ध दर्शन को प्रदान करें, तो इसकी रोशनी से उन्हें बेहद समझदार नीतियों का लाभ प्राप्त होगा."
  1. डॉ॰ एस. राधाकृष्णन सर्वपल्ली राधाकृष्णन जिन्होंने अपने कैरियर के शुरुआती दिनों में, जब महाराजा वहां के शासक थे, मैसूर में महाराजा के कॉलेज में प्रोफेसर के रूप में कार्य किया, कहते हैं: "स्वर्गीय महाराजा कृष्णराज वाडियार ने राज्य की ठोस समस्याओं पर काम कर रहे होने के समय भी, एक दूरस्थ लेकिन सम्मोहक आत्मा का आभास दिया, जो गुप्त ऊंचाइयों पर रहती थी। लोग महसूस करते थे कि वे समाज के लिए अपना एक अंश मात्र दे रहे हैं।"
  1. महाराजा के बचपन के एक मित्र से उनके निजी सचिव तथा और बाद में दीवान (प्रधानमंत्री) बननेवाले, एक मुसलमान, सर मिर्ज़ा इस्माइल ने अपनी आत्मकथा में लिखा था: "आत्मा की शुद्धता, हृदय की दया, स्वभाव की उदारता, धैर्य और सहिष्णुता, व्यक्तियों एवं मामलों की बुद्धिमत्ता पूर्ण परख- वे गुण हैं जो महाराजा में अत्यधिक रूप से विद्यमान हैं। बहुत कम लोगों को प्राप्त होने वाले ये गुण उन्हें मिले है- जिससे वे दुश्मनों का बहिष्कार करने के लिए जीवन भर केवल दोस्त बनाते रहें. मुझे यकीन है कि इतिहास उन्हें भारत के इतिहास के महानतम लोगों की श्रेणी में रखेगा."

महात्मा गांधी और महाराजा[संपादित करें]

महात्मा गांधी ने 8 फ़रवरी 1925 के नवजीवन में लिखा था,"महामहिम मैसूर के महाराजा ने कताई का काम अपने हाथ में ले लिया है। यह खबर उनलोगों को हार्दिक प्रसन्नता देगी जो इसे एक पवित्र कर्तव्य समझते हैं ... मैं महाराजा को बधाई देता हूं और आशा करता हूं कि वे अपने जीवन में इस काम को नहीं छोड़ेंगे जिसे उन्होंने आरंभ किया है, इससे उनका और उनकी प्रजा का अत्यंत भला होगा."

महात्मा गांधी 1927 और 1936 में महाराजा के एक राजकीय अतिथि थे। स्वास्थ्य सुधार के लिए वे नंदी हिल में रुके थे। 1927 में राज्य महाराजा के राज्याभिषेक की रजत जयंती मना रहा था। गांधीजी को समारोह में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया गया था। गांधी जी ने 5 अगस्त,1927 को महाराजा को एक पत्र भेजा, जिसमें उन्होंने लिखा था: "प्रिय मित्र, यह मेरे लिए अत्यंत खुशी की बात है कि मैं जहां भी गया, वहां आपकी पवित्रता और परोपकार की प्रशंसा सुनने को मिली. मैं सोमवार को आपकी सभी महत् इच्छाओं की पूर्ति के लिए प्रार्थना करूंगा. "

उपाधियां[संपादित करें]

  • 1884-1894: युवराज श्री कृष्णराज वोडेयर बहादुर, मैसूर के युवराज
  • 1894-1907: महाराज महाराजा श्री कृष्णराज नलवाडी वोडेयर चतुर्थ बहादुर, मैसूर के महाराजा
  • 1907-1910: महाराज महाराजा श्री सर नलवाडी कृष्णराज वोडेयर चतुर्थ बहादुर, मैसूर के महाराजा, जीसीएसआई (GCSI)
  • 1910-1917: कर्नल महाराज महाराजा श्री सर नलवाडी कृष्णराज वोडेयर चतुर्थ बहादुर, मैसूर के महाराजा, जीसीएसआई (GCSI)
  • 1917-1940: कर्नल महाराज श्री महाराजा सर नलवाडी कृष्णराज वोडेयर चतुर्थ बहादुर, मैसूर के महाराजा जीसीएसआई (GCSI), जीबीई (GBE)

सम्मान[संपादित करें]

  • दिल्ली दरबार गोल्ड मेडल-1903
  • नाइट ग्रैंड कमांडर ऑफ़ द ऑर्डर ऑफ़ द स्टार ऑफ़ इंडिया जीसीएसआई (GCSI)- 1907
  • दिल्ली दरबार गोल्ड मेडल- 19
  • बैलिफ ग्रैंड क्रॉस ऑफ़ द ऑर्डर ऑफ़ सेंट जॉन जीसीएसटीजे (GCStJ)-1911
  • नाइट ग्रैंड क्रॉस ऑफ़ द ऑर्डर ऑफ़ द ब्रिटिश इम्पायर जीबीई (GBE)- 1917
  • किंग जॉर्ज V सिल्वर जुबली मेडल -1935
  • किंग जार्ज VI राज्याभिषेक पदक- 1937
कृष्णराज वोडेयार चतुर्थ
जन्म: 4 जून 1884 मृत्यु: 3 अगस्त 1940
राजसी उपाधियाँ
पूर्वाधिकारी
Chamaraja Wodeyar
Maharaja of Mysore
1894–1940
उत्तराधिकारी
Jayachamaraja Wodeyar Bahadur

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. वर्तमान जीवनी 1940, पृष्ठ833
  2. राम जॉइस, एम. 1984. भारत के प्राचीन कानूनी, न्यायिक और संवैधानिक व्यवस्था के कानूनी और संवैधानिक इतिहास. दिल्ली: यूनिवर्सल लॉ पब. कं. पृष्ठ597
  3. "The Mysore duo Krishnaraja Wodeya IV & M. Visvesvaraya". इंडिया टुडे. http://www.india-today.com/itoday/millennium/100people/durai.html. अभिगमन तिथि: 2007-10-23. 
  4. प्रणेश (2003), पृष्ठ 162
  5. "[Group portrait of the Maharaja [of Mysore] & his brothers and sisters."]. British Library. http://www.collectbritain.co.uk/personalisation/object.cfm?uid=019PHO0000015S4U00029000. अभिगमन तिथि: 2007-10-23. 
  6. पुत्तास्वामैह, के., 1980. कर्नाटक के आर्थिक विकास की निरंतरता और परिवर्तन में एक ग्रंथ. नई दिल्ली: ऑक्सफोर्ड और आईबीएच (IBH), पृष्ठ 3