कुचिपुड़ी

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कुचिपुड़ी
కూచిపూడి
Kuchipudi Performer DS.jpg
नृत्यांगना वैदेही कुलकर्णी द्वारा कुचिपुड़ी नृत्य
Genre भारतीय शास्त्रीय नृत्य
कुचिपुड़ी नायिका एक भंगिमा प्रदर्शित करती हुई
कुचिपुड़ी नृत्य
कुचिपुड़ी नृत्य में श्री कृष्ण का अंक

कुचिपुड़ी (तेलुगू : కూచిపూడి) आंध्र प्रदेश, भारत की प्रसिद्ध नृत्य शैली है। यह पूरे दक्षिण भारत में मशहूर है। इस नृत्य का नाम कृष्णा जिले के दिवि तालुक में स्थित कुचिपुड़ी गाँव के ऊपर पड़ा, जहाँ के रहने वाले ब्राह्मण इस पारंपरिक नृत्य का अभ्यास करते थे। परम्‍परा के अनुसार कुचीपुडी नृत्‍य मूलत: केवल पुरुषों द्वारा किया जाता था और वह भी केवल ब्राह्मण समुदाय के पुरुषों द्वारा। ये ब्राह्मण परिवार कुचीपुडी के भागवतथालू कहलाते थे। कुचीपुडी के भागवतथालू ब्राह्मणों का पहला समूह 1502 ईसवी के आसपास निर्मित किया गया था। उनके कार्यक्रम देवताओं को समर्पित किए जाते थे। प्रचलित कथाओं के अनुसार कुचिपुड़ी नृत्य को पुनर्परिभाषित करने का कार्य सिद्धेन्द्र योगी नामक एक कृष्ण-भक्त संत ने किया था।[1][2]

कुचीपुडी के पंद्रह ब्राह्मण परिवारों ने पांच शताब्दियों से अधिक समय तक परम्‍परा को आगे बढ़ाया है। प्रतिष्ठित गुरु जैसे वेदांतम लक्ष्‍मी नारायण, चिंता कृष्‍णा मूर्ति और ता‍देपल्‍ली पेराया ने महिलाओं को इसमें शामिल कर नृत्‍य को और समृद्ध बनाया है। डॉ॰ वेमापति चिन्‍ना सत्‍यम ने इसमें कई नृत्‍य नाटिकाओं को जोड़ा और कई एकल प्रदर्शनों की नृत्‍य संरचना तैयार की और इस प्रकार नृत्‍य रूप के क्षितिज को व्‍यापक बनाया। यह परम्‍परा तब से महान बनी हुई है जब पुरुष ही महिलाओं का अभिनय करते थे और अब महिलाएं पुरुषों का अभिनय करने लगी हैं।

प्रदर्शन एवं मंचन[संपादित करें]

कुचिपुड़ी नृत्य पर भारत सरकार द्वारा जारी डाक टिकट

नृत्य का प्रदर्शन एक खास परंपरागत तरीके से होता है। मंच पर परंपरागत पूजन के पश्चात् प्रत्येक कलाकार मंच पर प्रवेश करता है और एक ख़ास लयबद्ध रचना धारवु के द्वारा अपना पात्र-परिचय देता है। पात्रों के परिचय और नाटक का मूड सेट हो जाने के बाद मुख्य नाट्य आरम्भ होता है। नृत्य के साथ कर्नाटक संगीत में निबद्ध गीत मृदंगम्, वायलिन, बाँसुरी और तम्बूरा इत्यादि वाद्ययंत्रों के साथ नृत्य में सहयोगी भूमिका निभाता है और कथानक को भी आगे बढ़ाने में सहायक होता है। नर्तकों द्वारा पहने जाने वाले आभूषण परंपरागत होते हैं जिन्हें एक ख़ास किस्म की हलकी लकड़ी बूरुगु से निर्मित किये जाने की परंपरा लगभग सत्रहवीं सदी से चली आ रही है।

शैली[संपादित करें]

भरत मुनि, जिन्होंने नाट्य शास्त्र की रचना की, इस प्रकार के नृत्य के कई पहलुओं की व्याख्या प्रस्तुत करते हैं। बाद में कोई १३वीं सदी के दौरान सिद्धेन्द्र योगी ने इसे एक अलग विशिष्ट शैली का रूप प्रदान किया। माना जाता है कि वे नाट्यशास्त्र में पारंगत थे और कुछ ख़ास नाट्यशास्त्रीय तत्वों को चुन कर इस नृत्य के रूप में समायोजित किया। उन्होंने पारिजातहरणम् नामक नाट्यावली की रचना की।[3]

कुचिपुड़ी नर्तक चपल और द्रुत गति से युक्त, एक ख़ास वर्तुलता लिये क्रम में भंगिमाओं का अनुक्रम प्रस्तुत करते हैं और इस नृत्य में पद-संचालन में उड़ान की प्रचुर मात्रा होती है जिसके कारण इसके प्रदर्शन में एक विशिष्ट गरिमा और लयात्मकता का सन्निवेश होता है। कर्नाटक संगीत के साथ प्रस्तुत किया जाने वाला यह नृत्य कई दृष्टियों से भरतनाट्यम के साथ समानतायें रखता है। एकल प्रसूति में कुचिपुड़ी में जातिस्वरम् और तिलाना का सन्निवेश होता है जबकि इसके नृत्यम् प्रारूप में कई संगीतबद्ध रचनाओं द्वारा भक्त के भगवान में लीन हो जाने की आभीप्सा का प्रदर्शन होता है। इसके एक ख़ास प्रारूप तरंगम् में नर्तकी थाली, जिसमें दो दीपक जल रहे होते हैं, के किनारों पर नृत्य करती है और साथ ही हाथों में एक जलपात्र किन्दी को भी संतुलित रखती है।

नृत्य की वर्तमान शैली कुछ मानक ग्रंथों पर आधारित है। इनमें सबसे प्रमुख है - नंदिकेश्वर रचित "अभिनय दर्पण" और "भरतार्णव"।

प्रमुख कलाकार[संपादित करें]

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. Kothari, Sunil; Pasricha, Avinash (2001) (अंग्रेजी में). कुचिपुड़ी. अभिनव प्रकाशन. प॰ 31. https://books.google.co.in/books?id=Xa8FamiJJKgC&lpg=PP1&dq=%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%9A%E0%A4%BF%E0%A4%AA%E0%A5%81%E0%A4%A1%E0%A4%BC%E0%A5%80&pg=PA31#v=onepage&q=%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%9A%E0%A4%BF%E0%A4%AA%E0%A5%81%E0%A4%A1%E0%A4%BC%E0%A5%80&f=false. अभिगमन तिथि: 29 अक्टूबर 2015. 
  2. Banham, edited by James R. Brandon ; advisory editor, Martin (1993). The Cambridge guide to Asian theatre (Pbk. सं॰). Cambridge, England: Cambridge University Press. प॰ 96. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 9780521588225. http://books.google.co.in/books?id=ttnH5W9qoBAC&dq=kuchipudi&source=gbs_navlinks_s. 
  3. Banham, Sunil Kothari, Avinash Pasricha (2001). Kuchipudi. New Delhi, India: Shakti Malik, Abhinav Publications. https://books.google.co.in/books?id=Xa8FamiJJKgC&printsec=frontcover&dq=kuchipudi&hl=en&sa=X&redir_esc=y#v=onepage&q=orphan&f=false.. 
  4. https://books.google.co.in/books?id=BJx6BwAAQBAJ&lpg=PA43&ots=H1wlOdfbHI&dq=%E0%A4%B2%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A5%80%20%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%A3%20%E0%A4%B6%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80%20%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%9A%E0%A4%BF%E0%A4%AA%E0%A5%81%E0%A5%9C%E0%A5%80&pg=PA43#v=onepage&q=%E0%A4%B2%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A5%80%20%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%A3%20%E0%A4%B6%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80%20%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%9A%E0%A4%BF%E0%A4%AA%E0%A5%81%E0%A5%9C%E0%A5%80&f=false
  5. "Back in time". दि हिन्दू. http://www.thehindu.com/features/friday-review/dance/back-in-time/article2455871.ece. अभिगमन तिथि: 15 फ़रवरी 2015. 
  6. प्रसिद्द कुचिपुड़ी नर्तक:भावालय.कॉम पर

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]

सुझावित ग्रन्थ और सामग्री[संपादित करें]

  • Kuchipudi Bhartam. Sri Satguru Publications/Indian Books Centre, Delhi, India, in Raga-Nrtya Series.