उसमान बिन अफ़्फ़ान

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उसमान बिन अफ़्फ़ान
عثمان بن عفان
ज़ुन्नूरैन (दो दीप वाले) (ذو النورين)
"अल-ग़नी" ("दान धनी")
अमीरुल मूमिनीन
राशिदून ख़लीफ़ा में से 3 वें ख़लीफ़ा
शासनकाल 6 नवम्बर 644 – 17 जून 656
पूर्वाधिकारी उमर
उत्तराधिकारी अली इब्न अबी तालिब
जीवनसाथी
  • "उम् अम्र"
  • रुक़य्या बिन्त मुहम्मद
  • उम् कुलसुम बिन्त मुहम्मद
  • फ़खीता बिन्त ग़ज़वान
  • उम् अल बनीन
  • फ़ातिमा बिन्त अल-वलीद
  • खालिद बिन असीद की पुत्री
  • उम् अम्र उम् नज्म बिन जुन्दुब
  • रमला बिन शैबा
  • नाइला बिन अल फुराफ़िसा
संताने
अबान बिन उस्मान
पूरा नाम
उसमान बिन अफ़्फ़ान (‘Uthmān Ibn ‘Affān)

अरबी: عثمان بن عفان

जाति क़ुरैश (बनू उमय्या)
पिता अफ्फ़ान इब्न अबी अल-आस
माता अरवा बिन्त कुरैज़
जन्म 576 ई (47  हिज्री पूर्व)
ताइफ़, अरेबिया
मृत्यु 17 जून 656  ई (18 ज़ुल हज्जा 35 हिज्री)[1][2][3] (आयु 79)
मदीना, अरब, राशिदून ख़िलाफ़त
कब्र जन्नतुल बकी, मदीना

उसमान बिन अफ़्फ़ान (579-656) उमर बिन खत्ताब के बाद मुसल्मानों के तीसरे ख़लीफ़ा चुने गये। पहले वो एक धनी व्यापारी हुआ करते थे लेकिन बाद में वह मुहम्मद साहिब के दामाद और उनके प्रमुख साथी बने। अपने खलीफ़ा बनने के बाद उन्होने क़ुरान को संकलित कर पुस्तक का रूप दिया। इस धार्मिक पुस्तक में मिलावट के आरोप में और मिस्र के वासियों से दग़ा करने के आरोप में ८० साल की उम्र में उनका मदीना में भीड़ ने क़त्ल कर दिया। इन आरोपों को इतिहास में विवादित माना जाता है, लेकिन प्रमाणित नहीं। ख़ास कर शिया मुस्लिम इन आरोपों पर अधिक विश्वास करते हैं।

अपने धन के कारण उनको अल-ग़नी भी कहते हैं - इनके पिता मक्का के प्रभावशाली व्यापारी थे, जबकि ये ख़ुद कारोबारी सिलसिले में इथियोपिया में रहने लगे थे। इनके परिवार के अन्य सदस्यों ने अगले ७० सालों के इस्लामी साम्राज्य-विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। बाद के उमय्या वंश के शासक इनके वंश से संबंधित थे। कुख्यात अरब जनरल अबू सुफ़ियान, और बाद में स्पेन में राज करने वाले मूसा भी इनके ख़ून के रिश्तेदार थे।

उस्मान का चुनाव[संपादित करें]

हजरत उमर, अपने मौत के वक़्त पर, अगले खलीफा को अपने बीच में से चुनने के लिए छह लोगों की एक समिति का गठन किया। यह समिति थी:

  • अली
  • उथमान इब्न अफान
  • अब्दुर रहमान बिन अवेफ
  • सैद इब्न अबी वकाकस
  • अल-ज़ुबाय्र
  • तलहा

हजरत उमर ने कहा कि, उनकी मृत्यु के बाद, समिति तीन दिनों के भीतर एक अंतिम निर्णय ले, और अगले ख़लीफ़ा को चौथे दिन कार्यालय की शपथ लेनी चाहिए। तलहा इस अवधि के भीतर समिति में शामिल हो गए, तो वे विचार-विमर्श में हिस्सा लेना चाहते थे, लेकिन वे इस अवधि के भीतर मदीना वापस नहीं आए, तो समिति के अन्य सदस्य इस फैसले से आगे बढ़ सकते थे। अब्दुर रहमान बिन औफ़ ने मध्यस्थ के रूप में कार्य करने के लिए खलीफा के रूप में नियुक्त किए जाने के लिए अपनी पात्रता वापस ले ली और समिति के प्रत्येक सदस्य से अलग से मुलाकात करके अपना कार्य शुरू किया। उन्होंने उनसे पूछा कि किसके लिए वे अपना वोट देंगे। जब हजरत अली से पूछा गया, उन्होंने जवाब नहीं दिया। जब हजरत उथमान से पूछा गया, उन्होंने हजरत अली के लिए मतदान किया, जुबैर ने अली या उथमान के लिए कहा और साद ने उथमान के लिए कहा।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]