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उत्तरमीमांसा

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उत्तरमीमांसा छः भारतीय दर्शनों में से एक है। उत्तरमीमांसा को 'शारीरिक मीमांसा' और 'वेदान्त दर्शन' भी कहते हैं। ये नाम महर्षि बादरायण कृत ब्रह्मसूत्र नामक ग्रन्थ के हैं।

'मीमांसा' शब्द का अर्थ है अनुसन्धान, गंभीर विचार, खोज। प्राचीन भारत में वेदों को परम प्रमाण माना जाता था। वेद वाङ्मय बहुत विस्तृत है और उसमें यज्ञ, उपासना और ज्ञान सम्बन्धी मंत्र पाए जाते हैं। वे मंत्र (संहिता), ब्राह्मण और आरण्यक, उपनिषद् नामक भागों में विभाजित किए गए हैं। बहुत प्राचीन (भारतीय विचारपद्धति के अनुसार अपौरुषेय) होने के कारण वेदवाक्यों के अर्थ, प्रयोग और परस्पर संबंध समन्वय का ज्ञान लुप्त हो जाने से उनके संबंध में अनुसंधान करने की आवश्यकता पड़ी। मंत्र और ब्राह्मण भागों के अंतर्गत वाक्यों का समन्वय जैमिनि ने अपने ग्रंथ मीमांसासूत्र (पूर्वमीमांसा दर्शन) में किया। मंत्र और ब्रह्मण वेद के पूर्वभाग होने के कारण उनके अर्थ और उपयोग की मीमांसा का नाम पूर्वमीमांसा पड़ा। वेद के उत्तर भाग आरण्यक और उपनिषद् के वाक्यों का समन्वय बादरायण ने ब्रह्मसूत्र नामक ग्रंथों में किया, अतएव उसका नाम 'उत्तरमीमांसा' पड़ा। उत्तरमीमांसा, 'शारीरिक मीमांसा' भी इस कारण कहलाता है कि इसमें शरीरधारी आत्मा के लिए उन साधनों और उपासनाओं का संकेत है जिनके द्वारा वह अपने ब्रह्मत्व का अनुभव कर सकता है। इस का नाम 'वेदान्त दर्शन' इस कारण पड़ा कि इसमें वेद के अन्तिम भाग के वाक्यों के विषयों का समन्वय किया गया है। इस का नाम 'ब्रह्ममीमांसा' अथवा 'ब्रह्मसूत्र' इस कारण पड़ा कि इस में विशेष विषय ब्रह्म और उसके स्वरूप की मीमांसा है, जबकि पूर्वमीमांसा का विषय यज्ञ और धार्मिक कृत्य हैं।

उत्तरमीमांसा में केवल वेद (आरण्यकों और उपनिषदों के) वाक्यों के अर्थ का निरूपण और समन्वय ही नहीं है, उसमें जीव, जगत्‌ और ब्रह्म संबंधी दार्शनिक समस्याओं पर भी विचार किया गया है। एक सर्वांगीण दर्शन का निर्माण करके उसका युक्तियों द्वारा प्रतिपादन और उससे भिन्न मतवाले दर्शनों का खण्डन भी किया गया है। दार्शनिक दृष्टि से यह भाग बहुत महत्वूपर्ण समझा जाता है।

सम्पूर्ण ब्रह्मसूत्र में चार अध्याय हैं और प्रत्येक अध्याय में चार पाद हैं। प्रथम अध्याय में प्रथम पाद के प्रथम चार सूत्र और दूसरे अध्याय के प्रथम और द्वितीय पादों में वेदान्त दर्शन संबंधी प्रायः सभी बातें आ जाती हैं। इन में ही वेदान्तदर्शन के ऊपर जो आक्षेप किए जा सकते हैं वे और वेदान्त को दूसरे दर्शनों में - वैशेषिक, पूर्वमीमांसा, पाशुपत दर्शनों में, जो उस समय प्रचलित थे - जो त्रुटियाँ दिखाई देती हैं वे आ जाती हैं।

समस्त ग्रंथ सूक्ष्म और दुरूह सूत्रों के रूप में होने के कारण इतना सरल नहीं है कि साधारण क्षमता वाले अर्थ और संगति समझ सकें। गुरु लोग इन सूत्रों के द्वारा अपने शिष्यों को उपनिषदों के विचार समझाया करते थे। कालांतर में उन का पूरा ज्ञान लुप्त हो गया और उन के ऊपर भाष्य लिखने की आवश्यकता पड़ी। सबसे प्राचीन भाष्य, जो इस समय प्रचलित और प्राप्य है, आचार्य शंकराचार्य का है। आचार्य शंकर के पश्चात्‌ और आचार्यों ने भी अपने अपने संप्रदाय के मतों की पुष्टि करने के लिए और अपने मतों के अनुरूप ब्रह्मसूत्र पर भाष्य लिखे। आचार्य रामानुजाचार्य, आचार्य मध्वाचार्य, आचार्य निम्बार्काचार्य और आचार्य वल्लभाचार्य के भाष्य प्रख्यात हैं। इन सब आचार्यों के मत, कुछ अंशों में समान होते हुए भी, बहुत कुछ भिन्न हैं।

स्वयं महर्षि बादरायण के विचार क्या हैं, यह निश्चित करना और किस आचार्य का भाष्य महर्षि बादरायण के विचारों का समर्थन करता है और उन के अनुकूल है, यह कहना बहुत कठिन है क्योंकि सूत्र बहुत दुरूह हैं। इस समस्या के साथ यह समस्या भी सम्बद्ध है कि जिन उपनिषद्वाक्यों का ब्रह्मसूत्र में समन्वय करने का प्रयत्न किया गया है उन के दार्शनिक विचार क्या हैं। महर्षि बादरायण ने उन को क्या समझा और भाष्यकारों ने उन को क्या समझा है ? वही भाष्य अधिकतर ठीक समझा जाना चाहिए जो उपनिषदों और ब्रह्मसूत्र दोनों के अनुरूप हो। इस दृष्टि से आचार्य शंकराचार्य का मत अधिक समीचीन जान पड़ता है। कुछ विद्वान्‌ रामानुजाचार्य के मत को अधिक सूत्रानुकूल बतलाते हैं।

उत्तरमीमांसा का सबसे विशेष दार्शनिक सिद्धान्त यह है कि जड़ जगत् का उपादान और निमित्त कारण चेतन ब्रह्म है जैसे मकड़ी अपने भीतर से ही जाल तानती है, वैसे ही ब्रह्म भी इस जगत्‌ को अपनी ही शक्ति द्वारा उत्पन्न करता है। यही नहीं, वही इस का पालक है और वही इस का संहार भी करता है। जीव और ब्रह्म का तादात्म्य है और अनेक प्रकार के साधनों और उपासनाओं द्वारा वह ब्रह्म के साथ तादात्म्य का अनुभव करके जगत्‌ के कर्मजंजाल से और बारंबार के जीवन और मरण से मुक्त हो जाता है। मुक्तावस्था में परम आनन्द का अनुभव करता है।

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