ईश्वर प्रीति

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ईश्वर प्रीति का अर्थ या तो ईश्वर के प्रति प्रेम या ईश्वर द्वारा प्रेम हो सकता है। ईश्वर के प्रति प्रेम उपासना की अवधारणाओं और ईश्वर के प्रति समर्पण से जुड़ा है। [1]

ईश्वर द्वारा प्रेम[संपादित करें]

ईश्वर का प्रेम शुद्ध प्रेम है। यह दिव्य प्रेम है और इसीलिए ईश्वर के प्रेम का प्रताप बहुत भिन्न है। ईश्वर के प्रेम के पीछे कोई लक्ष्य नहीं है। ईश्वर हमसे प्रेम करते हैं क्योंकि भगवान प्रेम के सिवाय कुछ नहीं है। शुद्ध प्रेम – वह भगवान का स्वाभाविक गुण है।

यदि हमारे लिए ईश्वर ही सच्ची पसन्द है, तो वह हमसे अधिक दूर नहीं है। किन्तु आज, हमे ईश्वर के अतिरिक्त सब कुछ पसन्द है। तथापि परमेश्वर हमे प्रेम करते है और सर्वदा करेगें, वह कभी भी हमसे दूर नहीं हुए है।

क्या ईश्वर का प्रेम नियमबद्ध है? ईश्वर का प्रेम निःशर्त प्रेम है। उनका प्रेम किसी भी लगाव और ममता से परे है। यह बिना किसी अपेक्षा के है। बदले में कुछ पाने की अपेक्षा के बिना, बिना किसी शर्त के, बिना किसी अवरोध के, हर किसी पर ईश्वर का प्रेम अटूट बहता रहता है।

ईश्वर किसी को ज़रा सा भी दोषित नहीं देखते। वह किसी को अच्छे या बुरे, उच्च या निम्न, धनी या दरिद्र, उचित या अनुचित के रूप में नहीं देखते है। ईश्वर कभी भेदभाव नहीं रखते। ईश्वर के भीतर ‘मेरा या तेरा’ एसा कोई विभाजन नहीं है और यही कारण है कि उनका शुद्ध प्रेम है, क्योंकि शुद्ध प्रेम वहाँ ही मौजूद है जहाँ ‘तुम्हारा और मेरा’ का कोई एहसास नहीं है।

हम ईश्वर को देख या अनुभव नहीं कर सकते। इसलिए हमारी अवस्था में, परमेश्वर के प्रेम को समझना कठिन है। किन्तु ज्ञानी का प्रेम वह है जिसे हम देख और अनुभव कर सकते हैं; यह इस पृथ्वी पर मौजूद वास्तविक प्रेम है! ज्ञानी का प्रेम, शुद्ध प्रेम है और वही परमार्थ प्रेम का अलौकिक झरना होता है। वह प्रेम-निर्झर सारे संसार की अग्नि शान्त करता है। ज्ञानी को सांसारिक जीवन के दलदल में फंसे सभी जीवों की कैसे कर के मोक्ष की प्राप्ति हो, बस यही भाव रहता है।

आत्मज्ञान के बिना, कोई मोक्ष नहीं है; और यह ज्ञान पुस्तकों में मौजूद नहीं है, यह ज्ञानी के हृदय में मौजूद है। शुद्ध प्रेम उसी क्षण से प्रकट होना शुरू हो जाता है जब हमे ज्ञानी पुरुष से आत्मज्ञान ज्ञान प्राप्त होता है!

अनासक्त योग से सच्चा प्रेम उत्पन्न होता है। यदि इस विश्व में कोई भी सच्चे प्रेम के मार्ग पर चलना शुरू करता है, तो वह भगवान बन जाएगा। जहाँ सच्चा प्रेम है, वहाँ मोक्ष है।

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सन्दर्भ[संपादित करें]